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Kathua News: दहेज उत्पीड़न मामले में चार आरोपी बरी
Tue, 03 Mar 2026 02:28 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
Updated Tue, 03 Mar 2026 02:28 AM IST
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अदालत से
अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आरोप साबित करने में विफल रहा : अदालत
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। न्यायिक मजिस्ट्रेट बनी शिवानी अत्री ने दहेज उत्पीड़न मामले में चार आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में बरी करने का फैसला सुनाया है। आदेश के अनुसार अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आरोप साबित करने में विफल रहा।
अदालत ने कहा कि धारा 498-ए आरपीसी के तहत अपराध साबित करने के लिए यह आवश्यक है कि महिला के साथ ऐसी क्रूरता की गई हो जिसका उद्देश्य अवैध रूप से संपत्ति या धन की मांग को पूरा करवाना हो। अभियोजन पक्ष आरोब साबित करने में नाकाम रहा लिहाजा सभी चार आरोपियों को बरी किया जाता है। कोर्ट में दायर चालान के अनुसार मामला 20 मई 2018 का है जिसमें पीड़ित महिला राफिया बेगम मां के साथ एसएसपी कठुआ के समक्ष लिखित शिकायत दर्ज की थी। इसमें पीड़ित ने ससुराल पक्ष पर आरोप लगाया कि वे उस पर अतिरिक्त दहेज और 5 लाख नकद लाने के लिए दबाव डाल रहे हैं।
महिला ने पुलिस को बताया कि उसकी शादी 29 दिसंबर 2016 को मुस्लिम रीति-रिवाजों से मोहम्मद शफीक निवासी चालोग बनी से हुई थी। विवाह के कुछ महीनों बाद उसके ससुराल वालों ने उसे दहेज के लिए प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। इसके बाद पुलिस ने बनी थाना में आरपीसी की धारा 498-ए के तहत आरोपी बशीर अहमद, परवीना अख्तर, शमशदीन और शमशाद बेगम के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया और 19 सितंबर 2019 को कोर्ट में चालान प्रस्तुत किया। कोर्ट में सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से पांच गवाह प्रस्तुत किए गए। इसमें मुख्य गवाह और शिकायतकर्ता ने अदालत में आरोप दोहराए लेकिन जिरह के दौरान कई महत्वपूर्ण बातें स्वीकार कर माना कि उनके समुदाय में दहेज की कोई प्रथा नहीं है। न तो दहेज की मांग की गई और न ही दहेज दिया या लिया गया।
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पीड़िता ने माना कि मुख्य विवाद इस बात को लेकर था कि पति को घर जमाई बनकर रहना था और इस संदर्भ में संपत्ति उसके नाम करने की बात कही गई थी। पीड़ित महिला ने यह भी स्वीकार किया कि तलाक उसने मर्जी से साइन किया था।
पीड़ित की मां ने भी स्वीकार किया कि विवाह के शुरुआती चार महीनों तक संबंध सामान्य रहे। उन्होंने कहा कि यदि आरोपियों ने दायर अन्य मुकदमे वापस ले लिए तो वह भी अपना केस वापस लेने को तैयार हैं। अभियोजन के एक अहम गवाह अब्दुल कयूम को अदालत ने पुलिस को दिए बयान को गलत बताया। उन्होंने कहा कि पुलिस ने खाली कागज पर उसका अंगूठा लगवाया था। इसके बाद कोर्ट ने गवाहों के गवाही और रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेजों का अवलोकन करने पर पाया कि दहेज के नाम पर पीडि़त का कोई उत्पीड़न नहीं हुआ है। मामले की असली वजह पति को घर जमाई बनकर रहना था। इसके बाद कोर्ट ने आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का फैसला सुनाया।
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अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आरोप साबित करने में विफल रहा : अदालत
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। न्यायिक मजिस्ट्रेट बनी शिवानी अत्री ने दहेज उत्पीड़न मामले में चार आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में बरी करने का फैसला सुनाया है। आदेश के अनुसार अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आरोप साबित करने में विफल रहा।
अदालत ने कहा कि धारा 498-ए आरपीसी के तहत अपराध साबित करने के लिए यह आवश्यक है कि महिला के साथ ऐसी क्रूरता की गई हो जिसका उद्देश्य अवैध रूप से संपत्ति या धन की मांग को पूरा करवाना हो। अभियोजन पक्ष आरोब साबित करने में नाकाम रहा लिहाजा सभी चार आरोपियों को बरी किया जाता है। कोर्ट में दायर चालान के अनुसार मामला 20 मई 2018 का है जिसमें पीड़ित महिला राफिया बेगम मां के साथ एसएसपी कठुआ के समक्ष लिखित शिकायत दर्ज की थी। इसमें पीड़ित ने ससुराल पक्ष पर आरोप लगाया कि वे उस पर अतिरिक्त दहेज और 5 लाख नकद लाने के लिए दबाव डाल रहे हैं।
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महिला ने पुलिस को बताया कि उसकी शादी 29 दिसंबर 2016 को मुस्लिम रीति-रिवाजों से मोहम्मद शफीक निवासी चालोग बनी से हुई थी। विवाह के कुछ महीनों बाद उसके ससुराल वालों ने उसे दहेज के लिए प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। इसके बाद पुलिस ने बनी थाना में आरपीसी की धारा 498-ए के तहत आरोपी बशीर अहमद, परवीना अख्तर, शमशदीन और शमशाद बेगम के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया और 19 सितंबर 2019 को कोर्ट में चालान प्रस्तुत किया। कोर्ट में सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से पांच गवाह प्रस्तुत किए गए। इसमें मुख्य गवाह और शिकायतकर्ता ने अदालत में आरोप दोहराए लेकिन जिरह के दौरान कई महत्वपूर्ण बातें स्वीकार कर माना कि उनके समुदाय में दहेज की कोई प्रथा नहीं है। न तो दहेज की मांग की गई और न ही दहेज दिया या लिया गया।
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पीड़िता ने माना कि मुख्य विवाद इस बात को लेकर था कि पति को घर जमाई बनकर रहना था और इस संदर्भ में संपत्ति उसके नाम करने की बात कही गई थी। पीड़ित महिला ने यह भी स्वीकार किया कि तलाक उसने मर्जी से साइन किया था।
पीड़ित की मां ने भी स्वीकार किया कि विवाह के शुरुआती चार महीनों तक संबंध सामान्य रहे। उन्होंने कहा कि यदि आरोपियों ने दायर अन्य मुकदमे वापस ले लिए तो वह भी अपना केस वापस लेने को तैयार हैं। अभियोजन के एक अहम गवाह अब्दुल कयूम को अदालत ने पुलिस को दिए बयान को गलत बताया। उन्होंने कहा कि पुलिस ने खाली कागज पर उसका अंगूठा लगवाया था। इसके बाद कोर्ट ने गवाहों के गवाही और रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेजों का अवलोकन करने पर पाया कि दहेज के नाम पर पीडि़त का कोई उत्पीड़न नहीं हुआ है। मामले की असली वजह पति को घर जमाई बनकर रहना था। इसके बाद कोर्ट ने आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का फैसला सुनाया।