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Kathua News: पारा चढ़ने के साथ ही लौट रहे विदेशी परिंदे, भा रही कठुआ की धरती
Wed, 06 May 2026 02:40 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
Updated Wed, 06 May 2026 02:40 AM IST
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इजिप्शियन वल्चर
- 230 से ज्यादा प्रजातियों के पक्षी रंजीत सागर झील में माइग्रेशन के दौरान देखे गए
खास खबर
साहिल खजूरिया
कठुआ। कठुआ की धरती पिछले एक महीने से विदेशी परिंदों की चहचहाहट से गुलजार है। पारा चढ़ते ही यह परिंदे लौट रहे हैं। रंजीत सागर जलाशय इन दिनों हजारों किलोमीटर लंबी प्रवास यात्रा का अहम पड़ाव बना हुआ है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह जलाशय प्रवासी पक्षियों के लिए एक सुरक्षित स्टॉपओवर साइट है। यहां उन्हें जल, आर्द्रभूमि और प्राकृतिक भोजन स्रोत उपलब्ध होते हैं। यही कारण है कि यहां अब तक 230 से अधिक पक्षियों की प्रजातियां दर्ज की जा चुकी हैं। रंजीत सागर डैम में रिवर्स माइग्रेशन के दौरान देखे गए प्रमुख पक्षियों में (मैकक्वीन बस्टर्ड), (ब्लैक-टेल्ड गॉडविट), (पाइड एवोसेट), (गोल्डन प्लोवर), (रेड-थ्रोटेड पिपिट), (स्वान गूज), (साइबेरियन पिपिट), (बाइमैक्युलेटेड लार्क) और (नॉर्दर्न लैपविंग) शामिल हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि ये सभी पक्षी सर्दियों में भारत आते हैं। अब तापमान बढ़ने के साथ अपने प्रजनन स्थलों जैसे साइबेरिया, मंगोलिया, कजाकिस्तान, मध्य एशिया और यूरोप की ओर लौट रहे हैं। हजारों किलोमीटर लंबी इस यात्रा के दौरान रंजीत सागर बांध जैसे जलाशय इनके लिए महत्वपूर्ण पड़ाव का काम करते हैं। यहां की आर्द्रभूमि, जल की उपलब्धता और प्राकृतिक भोजन स्रोत इन पक्षियों को विश्राम और ऊर्जा प्रदान करते हैं। इस कारण वे आगे की यात्रा पूरी कर पाते हैं। दुर्लभ पक्षी का यहां देखा जाना क्षेत्र के अंतरराष्ट्रीय महत्व को दर्शाता है।
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कोट
यदि इस क्षेत्र का संरक्षण नहीं किया गया तो भविष्य में इन पक्षियों की संख्या प्रभावित हो सकती है। इसलिए आवश्यक है कि अवैध शिकार पर नियंत्रण, प्रदूषण में कमी और स्थानीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाने जैसे कदम उठाए जाएं। साथ ही इसे एक अच्छी बर्ड वाचिंग साइट के रूप में संरक्षित किया जाए।
- हेमंत कुमार, पक्षी प्रेमी
................
मैकक्वीन बस्टर्ड
यह एक संकटग्रस्त मरुस्थलीय पक्षी है। यह खुले क्षेत्रों पर निर्भर करता है और अत्यंत कम दिखाई देता है। कठुआ में बीते साल के अंत में एक मैक्वीन बस्टर्ड बिलावर क्षेत्र में मृत पाया गया। पहली बार जीवित मैक्वीन बस्टर्ड को पक्षी प्रेमियों ने रंजीत सागर झील में देखा।
ब्लैक-टेल्ड गॉडविट
ब्लैक-टेल्ड गॉडविट एक लंबी दूरी तक प्रवास करने वाला सुंदर जलपक्षी है। इसकी लंबी टांगें और पतली चोंच इसे दलदली क्षेत्रों और उथले जल में भोजन खोजने के लिए अनुकूल बनाती हैं। यूरोप और एशिया के उत्तरी भागों में प्रजनन करने के बाद यह सर्दियों में भारत की ओर प्रवास करता है।
पाइड एवोसेट
पाइड एवोसेट एक बेहद आकर्षक और अनोखा जलपक्षी है। यह अपनी लंबी टांगों और विशिष्ट मुड़ी हुई चोंच के कारण आसानी से पहचाना जाता है। इसकी चोंच इसे पानी में साइड-स्वीपिंग शैली से भोजन खोजने में मदद करती है। यह अन्य पक्षियों से बिल्कुल अलग है। यूरोप और एशिया के कई हिस्सों में प्रजनन करने के बाद भारत में आता है।
गोल्डन प्लोवर
गोल्डन प्लोवर आर्कटिक क्षेत्रों विशेषकर यूरोप और उत्तरी एशिया में प्रजनन करता है। सर्दियों में हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर भारत तक पहुंचता है। इसके सुनहरे-भूरे रंग के पंख इसे बेहद आकर्षक बनाते हैं। उड़ान के दौरान इनकी चमक दूर से ही दिखाई देती है।
रेड-थ्रोटेड पिपिट
रेड-थ्रोटेड पिपिट एक छोटा लेकिन बेहद आकर्षक प्रवासी पक्षी है। प्रजनन काल में इसके गले का लाल रंग इसे अन्य पिपिट प्रजातियों से अलग बनाता है। सामान्य समय में यह घास और झाड़ियों में छिपा रहता है। यह पक्षी साइबेरिया और उत्तरी यूरोप के ठंडे क्षेत्रों में प्रजनन करता है। सर्दियों में भारत में प्रवास करता है।
स्वान गूज
यह एक दुर्लभ जंगली हंस है। इसकी संख्या तेजी से घट रही है।
साइबेरियन पिपिट
साइबेरियन पिपिट साइबेरिया के ठंडे क्षेत्रों में प्रजनन करता है। सर्दियों के दौरान भारत आता है। इसकी पहचान पतली देह, हल्के भूरे रंग और घास में छिपकर रहने की आदत से होती है।
बाइमैक्युलेटेड लार्क
बाइमैक्युलेटेड लार्क की खास पहचान इसके सिर पर मौजूद दो गहरे धब्बे हैं। यह पक्षी मधुर और लंबी दूरी तक सुनाई देने वाली आवाज के लिए प्रसिद्ध है। यही खासियत इसे अन्य लार्क प्रजातियों से अलग बनाती है। बाइमैक्युलेटेड लार्क मध्य एशिया और कजाकिस्तान में प्रजनन करता है। सर्दियों में भारत में प्रवास करता है।
नॉर्दर्न लैपविंग
नॉर्दर्न लैपविंग अपनी कलगी, चमकदार हरे-काले पंखों और सुंदर उड़ान शैली के लिए प्रसिद्ध है। इसकी पहचान सिर पर मौजूद लंबी कलगी और उड़ान के दौरान चमकते पंखों से होती है। यह पक्षी यूरोप और एशिया के ठंडे क्षेत्रों में प्रजनन करता है। सर्दियों में भारत के गर्म इलाकों की तरफ प्रवास करता है।
चैता बत्तख
(गर्गेनी)
यह एक छोटा प्रवासी पक्षी है। इसे हिंदी में मुख्य रूप से चैता या भुवई के नाम से जाना जाता है। यह बत्तख सर्दियों के मौसम में यूरोप और साइबेरिया के ठंडे इलाकों से लंबी यात्रा तय कर भारतीय वेटलैंड्स, झीलों और तालाबों में आता है। इसकी पहचान नर के सिर पर आंखों के ऊपर बनी एक लंबी और चौड़ी सफेद धारी है। मादा भूरे रंग की और साधारण दिखती है। यह मार्च-अप्रैल (चैत्र मास) के आसपास वापस लौटने लगती है। इस कारण इसे स्थानीय रूप से चैता कहा जाता है।
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साहिल खजूरिया
कठुआ। कठुआ की धरती पिछले एक महीने से विदेशी परिंदों की चहचहाहट से गुलजार है। पारा चढ़ते ही यह परिंदे लौट रहे हैं। रंजीत सागर जलाशय इन दिनों हजारों किलोमीटर लंबी प्रवास यात्रा का अहम पड़ाव बना हुआ है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह जलाशय प्रवासी पक्षियों के लिए एक सुरक्षित स्टॉपओवर साइट है। यहां उन्हें जल, आर्द्रभूमि और प्राकृतिक भोजन स्रोत उपलब्ध होते हैं। यही कारण है कि यहां अब तक 230 से अधिक पक्षियों की प्रजातियां दर्ज की जा चुकी हैं। रंजीत सागर डैम में रिवर्स माइग्रेशन के दौरान देखे गए प्रमुख पक्षियों में (मैकक्वीन बस्टर्ड), (ब्लैक-टेल्ड गॉडविट), (पाइड एवोसेट), (गोल्डन प्लोवर), (रेड-थ्रोटेड पिपिट), (स्वान गूज), (साइबेरियन पिपिट), (बाइमैक्युलेटेड लार्क) और (नॉर्दर्न लैपविंग) शामिल हैं।
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विशेषज्ञ बताते हैं कि ये सभी पक्षी सर्दियों में भारत आते हैं। अब तापमान बढ़ने के साथ अपने प्रजनन स्थलों जैसे साइबेरिया, मंगोलिया, कजाकिस्तान, मध्य एशिया और यूरोप की ओर लौट रहे हैं। हजारों किलोमीटर लंबी इस यात्रा के दौरान रंजीत सागर बांध जैसे जलाशय इनके लिए महत्वपूर्ण पड़ाव का काम करते हैं। यहां की आर्द्रभूमि, जल की उपलब्धता और प्राकृतिक भोजन स्रोत इन पक्षियों को विश्राम और ऊर्जा प्रदान करते हैं। इस कारण वे आगे की यात्रा पूरी कर पाते हैं। दुर्लभ पक्षी का यहां देखा जाना क्षेत्र के अंतरराष्ट्रीय महत्व को दर्शाता है।
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कोट
यदि इस क्षेत्र का संरक्षण नहीं किया गया तो भविष्य में इन पक्षियों की संख्या प्रभावित हो सकती है। इसलिए आवश्यक है कि अवैध शिकार पर नियंत्रण, प्रदूषण में कमी और स्थानीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाने जैसे कदम उठाए जाएं। साथ ही इसे एक अच्छी बर्ड वाचिंग साइट के रूप में संरक्षित किया जाए।
- हेमंत कुमार, पक्षी प्रेमी
................
मैकक्वीन बस्टर्ड
यह एक संकटग्रस्त मरुस्थलीय पक्षी है। यह खुले क्षेत्रों पर निर्भर करता है और अत्यंत कम दिखाई देता है। कठुआ में बीते साल के अंत में एक मैक्वीन बस्टर्ड बिलावर क्षेत्र में मृत पाया गया। पहली बार जीवित मैक्वीन बस्टर्ड को पक्षी प्रेमियों ने रंजीत सागर झील में देखा।
ब्लैक-टेल्ड गॉडविट
ब्लैक-टेल्ड गॉडविट एक लंबी दूरी तक प्रवास करने वाला सुंदर जलपक्षी है। इसकी लंबी टांगें और पतली चोंच इसे दलदली क्षेत्रों और उथले जल में भोजन खोजने के लिए अनुकूल बनाती हैं। यूरोप और एशिया के उत्तरी भागों में प्रजनन करने के बाद यह सर्दियों में भारत की ओर प्रवास करता है।
पाइड एवोसेट
पाइड एवोसेट एक बेहद आकर्षक और अनोखा जलपक्षी है। यह अपनी लंबी टांगों और विशिष्ट मुड़ी हुई चोंच के कारण आसानी से पहचाना जाता है। इसकी चोंच इसे पानी में साइड-स्वीपिंग शैली से भोजन खोजने में मदद करती है। यह अन्य पक्षियों से बिल्कुल अलग है। यूरोप और एशिया के कई हिस्सों में प्रजनन करने के बाद भारत में आता है।
गोल्डन प्लोवर
गोल्डन प्लोवर आर्कटिक क्षेत्रों विशेषकर यूरोप और उत्तरी एशिया में प्रजनन करता है। सर्दियों में हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर भारत तक पहुंचता है। इसके सुनहरे-भूरे रंग के पंख इसे बेहद आकर्षक बनाते हैं। उड़ान के दौरान इनकी चमक दूर से ही दिखाई देती है।
रेड-थ्रोटेड पिपिट
रेड-थ्रोटेड पिपिट एक छोटा लेकिन बेहद आकर्षक प्रवासी पक्षी है। प्रजनन काल में इसके गले का लाल रंग इसे अन्य पिपिट प्रजातियों से अलग बनाता है। सामान्य समय में यह घास और झाड़ियों में छिपा रहता है। यह पक्षी साइबेरिया और उत्तरी यूरोप के ठंडे क्षेत्रों में प्रजनन करता है। सर्दियों में भारत में प्रवास करता है।
स्वान गूज
यह एक दुर्लभ जंगली हंस है। इसकी संख्या तेजी से घट रही है।
साइबेरियन पिपिट
साइबेरियन पिपिट साइबेरिया के ठंडे क्षेत्रों में प्रजनन करता है। सर्दियों के दौरान भारत आता है। इसकी पहचान पतली देह, हल्के भूरे रंग और घास में छिपकर रहने की आदत से होती है।
बाइमैक्युलेटेड लार्क
बाइमैक्युलेटेड लार्क की खास पहचान इसके सिर पर मौजूद दो गहरे धब्बे हैं। यह पक्षी मधुर और लंबी दूरी तक सुनाई देने वाली आवाज के लिए प्रसिद्ध है। यही खासियत इसे अन्य लार्क प्रजातियों से अलग बनाती है। बाइमैक्युलेटेड लार्क मध्य एशिया और कजाकिस्तान में प्रजनन करता है। सर्दियों में भारत में प्रवास करता है।
नॉर्दर्न लैपविंग
नॉर्दर्न लैपविंग अपनी कलगी, चमकदार हरे-काले पंखों और सुंदर उड़ान शैली के लिए प्रसिद्ध है। इसकी पहचान सिर पर मौजूद लंबी कलगी और उड़ान के दौरान चमकते पंखों से होती है। यह पक्षी यूरोप और एशिया के ठंडे क्षेत्रों में प्रजनन करता है। सर्दियों में भारत के गर्म इलाकों की तरफ प्रवास करता है।
चैता बत्तख
(गर्गेनी)
यह एक छोटा प्रवासी पक्षी है। इसे हिंदी में मुख्य रूप से चैता या भुवई के नाम से जाना जाता है। यह बत्तख सर्दियों के मौसम में यूरोप और साइबेरिया के ठंडे इलाकों से लंबी यात्रा तय कर भारतीय वेटलैंड्स, झीलों और तालाबों में आता है। इसकी पहचान नर के सिर पर आंखों के ऊपर बनी एक लंबी और चौड़ी सफेद धारी है। मादा भूरे रंग की और साधारण दिखती है। यह मार्च-अप्रैल (चैत्र मास) के आसपास वापस लौटने लगती है। इस कारण इसे स्थानीय रूप से चैता कहा जाता है।

इजिप्शियन वल्चर

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