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प्रवचन से मोह और लोभ का होता है नाश
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भगवत कथा का श्रवण करते श्रद्धालु। संवाद
- फोटो : KATHUA
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कठुआ। शहर के वार्ड 2 स्थित पंडोरी धाम आश्रम में जारी श्रीमद्भागवत कथा संपन्न हो गई। कथा के अंतिम दिन कथा व्यास पंडित खेमराज शास्त्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को सात दिन की श्रीमद्भागवत कथा के कारण परीक्षित का राज तथा परिवार से मोह समाप्त होने का वर्णन करते हुए कहा कि श्रीमद्भागवत पुराण एक ऐसा ग्रंथ है। जिसके श्रवण मात्र से मानव के मन से मोह-माया और लोभ का अंत होता है और वह भगवान के परमधाम का अधिकारी बन जाता है।
उन्होंने कहा कि तक्षक सर्प ने परीक्षित को कथा के दौरान ही डसा। उसी समय राजा की मृत्यु हो गई। परंतु कथा सुनने से परीक्षित का ध्यान संसार से हटकर स्वर्ग के सुख में लीन था। राजा के पद पर रहते हुए परीक्षित जी ने बड़े-बड़े धर्म यज्ञ किए थे। जिस कारण से उनके पुण्यों का ठेर लगा था। परमात्मा का यह विधान है कि जो अंत समय में जिसमें भाव यानि आस्था रखकर स्मरण करता है, वह उसी को प्राप्त होता है। इसी विधानानुसार राजा परीक्षित का जीव स्थूल शरीर त्यागकर जो कि सर्प विष से मर गया था। अपने सूक्ष्म शरीर युक्त शुकदेव ऋषि के साथ विमान में बैठकर स्वर्ग में चला गया।
उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत पुराण के श्रवण से हमारे जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश होता है और ज्ञान चक्षु खुल जाते हैं। जो कि हमें सांसारिक मोह-माया से मुक्त करने में सहयोग करते हैं। लिहाजा हमें भगवत कथा का श्रवण पूरी निष्ठा और ध्यान से करना चाहिए। ताकि हमारे जीवन में इस धाम की कठिनाईयों का नाश हो और परमधाम में भगवान श्रीहरि के चरणों में स्थान मिल सकें। अंत में कथा में उपस्थित सभी हरि भक्तों ने सामूहिक आरती में भाग लिया और प्रसाद वितरण किया।
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उन्होंने कहा कि तक्षक सर्प ने परीक्षित को कथा के दौरान ही डसा। उसी समय राजा की मृत्यु हो गई। परंतु कथा सुनने से परीक्षित का ध्यान संसार से हटकर स्वर्ग के सुख में लीन था। राजा के पद पर रहते हुए परीक्षित जी ने बड़े-बड़े धर्म यज्ञ किए थे। जिस कारण से उनके पुण्यों का ठेर लगा था। परमात्मा का यह विधान है कि जो अंत समय में जिसमें भाव यानि आस्था रखकर स्मरण करता है, वह उसी को प्राप्त होता है। इसी विधानानुसार राजा परीक्षित का जीव स्थूल शरीर त्यागकर जो कि सर्प विष से मर गया था। अपने सूक्ष्म शरीर युक्त शुकदेव ऋषि के साथ विमान में बैठकर स्वर्ग में चला गया।
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उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत पुराण के श्रवण से हमारे जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश होता है और ज्ञान चक्षु खुल जाते हैं। जो कि हमें सांसारिक मोह-माया से मुक्त करने में सहयोग करते हैं। लिहाजा हमें भगवत कथा का श्रवण पूरी निष्ठा और ध्यान से करना चाहिए। ताकि हमारे जीवन में इस धाम की कठिनाईयों का नाश हो और परमधाम में भगवान श्रीहरि के चरणों में स्थान मिल सकें। अंत में कथा में उपस्थित सभी हरि भक्तों ने सामूहिक आरती में भाग लिया और प्रसाद वितरण किया।
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