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Kathua News: श्रद्धालुओं को सत्संग का महत्व समझाया
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कठुआ। शहर के ब्राह्मण सभागार में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन जारी है। भगवान परशुराम जयंती समारोह के चलते होने वाले इस आयोजन के तीसरे दिन कथावाचक संत सुभाष शास्त्री ने कहा कि कुसंग एक ऐसा जहर है, जिसके प्रभाव से मनुष्य का सब कुछ बिगड़ जाता है, जबकि सत्संग से मन में सजगता उपजती है।
शास्त्री जी ने कहा कि जो भीतर से सजग है, वह संसारी होते हुए भी संन्यासी है और जो भीतर से सजग नहीं है, वह संन्यासी होते हुए भी संसारी है। असल में जागरण का नाम संन्यास है। जैसे चुंबक लोहे को खींचता है, वैसे ही संन्यास सत्य को खींचता है। संन्यास का अर्थ यह कदापि नहीं कि व्यक्ति अपना घरद्वार छोड़ दे। असल में जो इस संसार में गृहस्थ जीवन का पालन सत्यता पर चलते हुए करता है, वह धर्म की दृष्टि में परम संन्यासी है। उन्होंने कहा कि कुसंग से हमेशा भयभीत रहें और केवल सत्य का संग करें, क्योंकि इसी में आपका कल्याण है।
अंत में कथावाचक ने समझाया कि गहना जब भी, जैसा भी बना, सोने ने उसका संग कभी नहीं छोड़ा, इसी प्रकार हमें जब भी, जैसा भी शरीर मिला, सत्य ने हमारा संग नहीं छोड़ना। इस मानव तन में, सतगुरु के सत्संग में जीव को यदि अपने अजन्मे, अविनाशी, सत्य स्वरूप का बोध हो जाए तो वह सदा के लिए जन्म-मरण के भय से मुक्त हो सकता है, इसलिए हमें सदा सत्संग करना चाहिए। इसी से हमारा कल्याण होगा।
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शास्त्री जी ने कहा कि जो भीतर से सजग है, वह संसारी होते हुए भी संन्यासी है और जो भीतर से सजग नहीं है, वह संन्यासी होते हुए भी संसारी है। असल में जागरण का नाम संन्यास है। जैसे चुंबक लोहे को खींचता है, वैसे ही संन्यास सत्य को खींचता है। संन्यास का अर्थ यह कदापि नहीं कि व्यक्ति अपना घरद्वार छोड़ दे। असल में जो इस संसार में गृहस्थ जीवन का पालन सत्यता पर चलते हुए करता है, वह धर्म की दृष्टि में परम संन्यासी है। उन्होंने कहा कि कुसंग से हमेशा भयभीत रहें और केवल सत्य का संग करें, क्योंकि इसी में आपका कल्याण है।
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अंत में कथावाचक ने समझाया कि गहना जब भी, जैसा भी बना, सोने ने उसका संग कभी नहीं छोड़ा, इसी प्रकार हमें जब भी, जैसा भी शरीर मिला, सत्य ने हमारा संग नहीं छोड़ना। इस मानव तन में, सतगुरु के सत्संग में जीव को यदि अपने अजन्मे, अविनाशी, सत्य स्वरूप का बोध हो जाए तो वह सदा के लिए जन्म-मरण के भय से मुक्त हो सकता है, इसलिए हमें सदा सत्संग करना चाहिए। इसी से हमारा कल्याण होगा।
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