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तेला कीट का हमला
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आम तौर पर फरवरी में रहने वाले 19 से 23 डिग्री के बीच तापमान में जहां इस वर्ष उछाल दर्ज किया गया है, वहीं यह किसानों के लिए अब बड़ी मुसीबत बन गया है। कठुआ जिले में सामान्य से तीन से चार डिग्री अधिक चल रहे तापमान के चलते तेला कीट ने गेहूं और सरसों को अपनी चपेट में ले लिया है। अब तक जिले में लगभग 40 हजार हेक्टेयर से अधिक पर होने वाली खेती में से 15 से 20 फीसदी खड़ी फसल पर तेला कीट का हमला रिपोर्ट हो चुका है।
किसान इसलिए भी पसोपेस में हैं क्योंकि इस समय दवा का छिड़काव भी लाभदायक नहीं होगा। ऐसे में अब उन्हें बारिश की ही उम्मीद है लेकिन मौसम का मिजाज किसानों के हक में नजर नहीं आ रहा है। शनिवार को बादलों की गड़गड़ाहट के बीच कठुआ के मैदानी इलाकों में हल्की बूंदाबांदी मुसीबत को और बढ़ा गई है। सुबह 11 बजकर तीस मिनट पर ही तापमान 24.5 डिग्री सेल्स्यिस को पार कर गया। ऐसे में हवा में नमीं की मात्रा बढ़ना तेला कीट के हमले के बढ़ने का बड़ा कारण बनने जा रहा है।
मौसम के पूर्वानुमान के अनुसार रविवार को भी सिर्फ पहाड़ी इलाकों में ही बारिश की संभावना है। ऐसे में अभी राहत मिलती नजर नहीं आ रही है। कृषि विज्ञान केंद्र कठुआ के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. विशाल महाजन ने बताया कि तापमान में लगातार दर्ज हुई बढ़त असामान्य है। आम तौर पर फरवरी में दर्ज किए जाने वाले तापमान से इस बार पांच से सात डिग्री तक तापमान पिछले कुछ दिनों में दर्ज किया जा रहा है जो गेहूं और सरसों के लिए सही नहीं है।
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बताया कि कंडी और कुछ अंदड़ के इलाकों में तेला कीट ने गेहूं समेत सरसों को भी भारी नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया है। बताया कि तेला कीट लगने से जहां फसल पर काले रंग दिखाई देने लगता है वहीं फोटोसिंथेसिस प्रक्रिया न मिलने से इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है। तेला का मुख्य कारण अधिक तापमान और कम आर्द्रता है। देरी से लगाई गई फसलों में जिन किसानों ने सुझावों का पालन नहीं किया है उन्हें अधिक नुकसान झेलना पड़ सकता है। क्योंकि यह समय गेहूं में दाना बनने का है ऐसे में बारिश न होने से दाना कमजोर बनेगा और उपज पर असर पड़ेगा। बताया कि पिछले एक माह से अधिक से बारिश नहीं हुई है ऐसे में बारिश ही किसानों को इस मुसीबत से राहत दे सकती है।
क्या है रोग और उसके लक्षण
तेला रोग के जिम्मेदार छोटे-छोटे कीट होते हैं जिन्हें ऐफिड व थ्रीपंस नाम दिया गया है। कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि तेला के कीट काले रंग के होते हैं । ये कीट गेहूं की फसल के बालियों पर तथा पत्तों पर होते हैं। ये जिस फसल में इनका प्रभाव होता है उस फसल के पत्ते काले रंग के होने शुरू हो जाते हैं।
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किसान इसलिए भी पसोपेस में हैं क्योंकि इस समय दवा का छिड़काव भी लाभदायक नहीं होगा। ऐसे में अब उन्हें बारिश की ही उम्मीद है लेकिन मौसम का मिजाज किसानों के हक में नजर नहीं आ रहा है। शनिवार को बादलों की गड़गड़ाहट के बीच कठुआ के मैदानी इलाकों में हल्की बूंदाबांदी मुसीबत को और बढ़ा गई है। सुबह 11 बजकर तीस मिनट पर ही तापमान 24.5 डिग्री सेल्स्यिस को पार कर गया। ऐसे में हवा में नमीं की मात्रा बढ़ना तेला कीट के हमले के बढ़ने का बड़ा कारण बनने जा रहा है।
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मौसम के पूर्वानुमान के अनुसार रविवार को भी सिर्फ पहाड़ी इलाकों में ही बारिश की संभावना है। ऐसे में अभी राहत मिलती नजर नहीं आ रही है। कृषि विज्ञान केंद्र कठुआ के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. विशाल महाजन ने बताया कि तापमान में लगातार दर्ज हुई बढ़त असामान्य है। आम तौर पर फरवरी में दर्ज किए जाने वाले तापमान से इस बार पांच से सात डिग्री तक तापमान पिछले कुछ दिनों में दर्ज किया जा रहा है जो गेहूं और सरसों के लिए सही नहीं है।
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बताया कि कंडी और कुछ अंदड़ के इलाकों में तेला कीट ने गेहूं समेत सरसों को भी भारी नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया है। बताया कि तेला कीट लगने से जहां फसल पर काले रंग दिखाई देने लगता है वहीं फोटोसिंथेसिस प्रक्रिया न मिलने से इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है। तेला का मुख्य कारण अधिक तापमान और कम आर्द्रता है। देरी से लगाई गई फसलों में जिन किसानों ने सुझावों का पालन नहीं किया है उन्हें अधिक नुकसान झेलना पड़ सकता है। क्योंकि यह समय गेहूं में दाना बनने का है ऐसे में बारिश न होने से दाना कमजोर बनेगा और उपज पर असर पड़ेगा। बताया कि पिछले एक माह से अधिक से बारिश नहीं हुई है ऐसे में बारिश ही किसानों को इस मुसीबत से राहत दे सकती है।
क्या है रोग और उसके लक्षण
तेला रोग के जिम्मेदार छोटे-छोटे कीट होते हैं जिन्हें ऐफिड व थ्रीपंस नाम दिया गया है। कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि तेला के कीट काले रंग के होते हैं । ये कीट गेहूं की फसल के बालियों पर तथा पत्तों पर होते हैं। ये जिस फसल में इनका प्रभाव होता है उस फसल के पत्ते काले रंग के होने शुरू हो जाते हैं।