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आमदनी से अधिक है जम्मू-कश्मीर राज्य का खर्चा

Mon, 16 Dec 2013 11:52 AM IST
अमर उजाला, राजौरी
अमर उजाला, राजौरी Updated Mon, 16 Dec 2013 11:52 AM IST
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Govt employment be least choice, says Omar

जम्मू-कश्मीर राज्य का खर्चा आमदनी से कहीं अधिक है। इसलिए राज्य सरकार के लिए पढ़े-लिखे सभी युवाओं को सरकारी नौकरी देना संभव नहीं। शिक्षित युवाओं को चाहिए कि वह सरकारी नौकरी पर पूरी तरह निर्भर न रहें और निजी क्षेत्र को प्राथमिकता दें।

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रविवार को राजौरी में बाबा गुलाम शाह बादशाह विश्वविद्यालय के 10वें स्थापना दिवस पर छात्र-छात्राओं और अन्य उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने यह बातें कहीं।
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उच्च शिक्षण संस्थानों खास तौर पर विश्वविद्यालयों को उद्योग, विज्ञान और तकनीक क्षेत्र के बड़े घरानों के साथ मिलकर शिक्षा को रोजगार परक बनाना चाहिए।

विश्वविद्यालयों को चाहिए कि उद्योग जगत की जरूरतों के हिसाब से अपने पाठ्यक्रम में आवश्यक बदलाव करें ताकि वहां से शिक्षा हासिल करने वाले युवाओं को निजी क्षेत्र में रोजगार के अधिक अवसर मिल सकें।
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इस दौरान मुख्यमंत्री ने रियासत के शिक्षित बेरोजगार युवाओं से केंद्र और रियासत सरकार की ओर से मिलकर चलाईं जा रहीं हिमायत और उड़ान योजनाओं का लाभ उठाने की भी अपील की।

उनका कहना था कि युवाओं को समझना चाहिए कि पूरे देश भर में सिर्फ जम्मू-कश्मीर रियासत की एकमात्र राज्य है जहां के युवाओं को निजी क्षेत्र में रोजगार के बेहतर अवसर मुहैया कराने को लेकर इस तरह की योजनाएं चलाई जा रहीं हैं।
    
उमर ने कहा कि जम्मू-कश्मीर राज्य की अर्थव्यवस्था इतनी बेहतर नहीं है। युवाओं को चाहिए कि वह अपने बेहतर भविष्य के लिए सरकारी नौकरियों की तरफ न भागें। युवा अपना खुद का रोजगार स्थापित करें।

प्राइवेट सेक्टर को प्राथमिकता दें। आज के इस विज्ञान और प्रौद्योगिकी के युग में युवाओं के पास सरकारी नौकरी के अलावा भी कई विकल्प हैं।

उन्होंने कहा कि हमारे राज्य की वार्षिक आमदनी केवल 650 हजार करोड़ रुपये है, जबकि वार्षिक खर्चा 17 हजार करोड़ रुपये से भी अधिक है। आंकड़ों पर गौर किया जाए तो समझ में आता है कि किस तरह रियासत का गुजारा हो पा रहा है।


कई बाहरी राज्यों की मिसाल देते हुए उमर ने कहा कि वहां के युवाओं के लिए सरकारी नौकरी सबसे आखिरी विकल्प होता है। जम्मू-कश्मीर राज्य के युवा सरकारी नौकरी पाने के मकसद से ही पढ़ाई करते हैं और जब नौकरी नहीं मिलती तो निराश होकर सरकार पर बेरोजगारी का आरोप लगाते हैं।

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