दलितों के साथ नहीं हो रहा इंसाफ

Jammu and Kashmir Bureau Updated Sat, 11 Nov 2017 01:22 AM IST
हीरानगर।
संविधान में हर नागरिक को बराबरी का हक दिया गया है, इसके बावजूद आज भी हमारे समाज में दलित वर्ग गैरबराबरी का शिकार है। उसे आज भी संविधान द्वारा प्रदत्त बुनियादी अधिकारों को हासिल करने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है, लेकिन सियासत करने वालों को इनकी आवाज सुनाई नहीं पड़ रही। हीरानगर में दलितों के 200 परिवार कोर्ट के आदेश के बाद भी आज तक अपना आशियाना हासिल नहीं कर पाए हैं। पिछले एक दशक में भी ज्यादा समय से भूमिहीन दलित परिवार अपने हक के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन प्रशासन के अधिकारियों के कानों तक उनकी आवाज ही नहीं पहुंच रही है। दलितों के लिए चिह्नित भूमि पर भूमाफिया कुंडली मारे बैठा है, जिससे वे दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं।
1965 में राज्य सरकार ने कठुआ जिले के 350 भूमिहीन दलित परिवारों को बसाने के लिए भूमि मुहैया करवाने की घोषणा की गई थी। 1977 में जिले के बुद्दी, मेेरथा, नगरी, सल्लन, हरियाचक्क, कोटपुन्नू, पथवाल आदि गांवों में भूमि चिह्नित करके 150 परिवारों को बसाया गया, लेकिन हीरानगर के 200 भूमिहीन दलित परिवारों को आज तक उनके आशियाने के लिए भूमि नहीं मिल पाई है। उनके मुताबिक राज्य सरकार ने उनके लिए जहां जमीन चिह्नित की है, उस पर भूमाफिया ने कब्जा कर लिया है और प्रशासन उन्हें हटवा नहीं रहा है।
सामाजिक इंसाफ मंच के संरक्षक आईडी खजूरिया ने बताया कि उनके संगठन ने इस मसले को वर्ष 2005 में प्रशासन के सामने रखा। इसके साथ ही दलित परिवारों को हक दिलाने के लिए कई बार धरना-प्रदर्शन भी किया। इसके बावजूद भी जब प्रशासन पर कोई असर नहीं हुआ तो वर्ष 2006 में 200 दलित परिवारों के आवासीय हक के लिए हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की। याचिका पर कोर्ट ने 2012 में सुनवाई करते हुए समाज कल्याण विभाग व जिला प्रशासन को लाभार्थ्यों को बसाने के निर्देश दिए। लेकिन, आज पांच साल बीत जाने के बाद भी 200 दलित परिवार अपने आशियाने के लिए तरस रहे हैं।

जिला प्रशासन और समाज कल्याण विभाग कोर्ट के आदेश का कर रहा उल्लंघन
बीएल कांडले ने बताया कि सामाजिक इंसाफ मंच ने दलित परिवारों को अधिकार दिलाने के लिए 2002 से 2005 तक करीब 150 से अधिक धरना-प्रदर्शन कर चुका है, लेकिन प्रशासन के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। प्रशासन समाज में गैरबराबरी का माहौल खुद पैदा कर रहा है। उन्होंने कहा कि जब भूमिहीन परिवारों को बसाने के लिए भूमि चिह्नित कर ली गई है, तो उन्हें बसाने में विलंब क्यों हो रहा है। उनका कहना था कि कोर्ट का आदेश यदि इन लोगों के विरुद्ध होता तो प्रशासन दलितों पर कार्रवाई करने में कोई परहेज नहीं करता, लेकिन दलितों के साथ भेदभाव हो रहा है। प्रशासन और समाज कल्याण विभाग कोर्ट के आदेश का उल्लंघन कर रहा है।

80 साल की उम्र में लकड़ी बेचकर परिवार का भरण-पोषण करना मजबूरी
80 वर्षीय चरणदास ने बताया कि समाज में गैरबराबरी का ही नतीजा है कि आज भी वह इस उम्र में जंगलों से लकड़ी लाकर, उसे बेचकर अपने परिवार गुजर बसर कर रहे हैं। उन्हाेंने कहा कि अपनी पूरी उम्र की मेहनत में वह केवल रोटी ही पूरी कर पाए हैं। सात सदस्यों का परिवार आज भी एक ही झोपडे़ में रह रहा है। हमारे नेता हमारी तकलीफ नहीं दूर करते हैं। सच कहें तो वे हमें समझ ही नहीं पाते हैं। यही वजह है कि हमारी गरीबी, हमारी तकलीफें, निरक्षरता दूर करने में आज तक किसी ने गंभीरता नहीं दिखाई है।

नहीं साथ छोड़ रही झोपड़ी और गरीबी
व्यास देव ने अपनी दास्तां सुनाते हुए कहा कि वह सन्याल गांव में एक झोपड़ी में रहते थे। झोपड़ी टूटने के बाद अपनी ससुराल चड़वाल चले गए। यहां पर आकर मजदूरी का काम शुरू किया, लेकिन घर बनाने के लिए भूमि नहीं होने से वे अब भी झुग्गी में ही रह रहे हैं। परिवार के भरण-पोषण के अलावा उन्हें झुग्गी का किराया भी भरना पड़ता है। हाथ की उंगली टूटने के कारण बेटा भी घर बैठ गया है, ऐसे में उनको अकेले ही जिम्मेदारी उठानी पड़ रही है। कमाई की हालत ऐसी ही है कि जिस दिन काम नहीं मिला, उस दिन बड़ी दिक्कत हो जाती है।

-बयान---
इन लोगों को बसाने के लिए तहसील प्रशासन को सक्रिय कर दिया गया है। उप मंडल के सभी तहसीलदारों से इस मसले से संबंधित जो जानकारी जुटाई गई है, उसे जिला प्रशासन को भेज दिया गया है। समाज कल्याण विभाग को भी इस मसले की जानकारी देने को कहा गया था, लेकिन अभी तक विभाग द्वारा कोई सहयोग नहीं किया गया।
-सुरेश शर्मा, एसडीएम हीरानगर

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