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लव और वॉर में सब जायज, लेकिन वकालत में नहीं- जस्टिस मिश्रा

Sat, 15 Jul 2017 05:55 PM IST
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर Updated Sat, 15 Jul 2017 05:55 PM IST
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everything is allowed lov and war, but not advocated - Justice Mishra
अरुण मिश्रा
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अरुण मिश्रा ने कहा है कि लव और वॉर में सब जायज है, लेकिन यह बात वकालत में लागू नहीं हो सकती। खासतौर पर युवा वकीलों को येन-केन केस जीतने के बजाए प्रोफेशनल एथिक्स पर ध्यान देना चाहिए।
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न्यायाधीश मिश्रा बार कौंसिल ऑफ राजस्थान की ओर से आज ओटीएस में एमबीएल भार्गव स्मृति व्याख्यान में संबोधित कर रहे थे। वकीलों के एथिक्स और पक्षकारों के अधिकार पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि बैंच हटिंग करना आम हो गया है, लेकिन वकील अपने रिश्तेदार की अदालत में ही पैरवी नहीं करे या उस पूरी कोर्ट में, यह विचार का विषय हो सकता है। आज बार कौंसिल में शिकायत होने पर दोषी वकील का वोट नहीं मिलने के डर के कारण उस पर कार्रवाई नहीं की जा रही है। बार कौंसिल ऑफ इंडिया एक बार प्रस्ताव पारित कर, कुछ दिन बाद दबाव में आकर उसे वापस ले लेती है। उन्होंने कहा कि बड़े लोग छोटों को रुला रहे हैं, इसे रोकने के लिए वकीलों को आगे आना चाहिए।
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युद्ध के लिए गोली चलाने की नहीं जरूरत

everything is allowed lov and war, but not advocated - Justice Mishra
न्यायाधीश प्रदीप नान्द्रजोग और अरुण मिश्रा
जस्टिस मिश्रा ने कहा कि आज युद्ध के लिए गोली चलाने की जरूरत नहीं है। देश की अर्थव्यवस्था पर हमला करके भी युद्ध किया जा सकता है। ऐसे में वकील इससे अलग कैसे हो सकता है। गलत फैसले तभी आते हैं, जब हम अपनी ड्यूटी सही ढंग से नहीं निभाते। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद केवल शासन बदला है। आजादी के बाद क्या समानता के अधिकार का हनन नहीं हो रहा या शोषण नहीं हो रहा? यह अफसोसजनक है कि लोगों को छोटे-छोटे मामलों के लिए उच्चतम न्यायालय तक आना पड़ रहा है।

भाषण के दौरान वहां मौजूद एक व्यक्ति ने जस्टिस कर्णन को लेकर न्यायाधीश मिश्रा के विचार जानने चाहे। इस पर न्यायाधीश मिश्रा ने पहले तो सवाल को टाल दिया, लेकिन बाद में उन्होंने इशारे में कहा कि ऊंचे पदों पर बैठे लोगों की जिम्मेदारी है कि वे उच्च मानक स्थापित करें। इसके लिए कई बार विष भी पीना पड़ता है। व्याख्यान में राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नान्द्रजोग और वरिष्ठ अधिवक्ता एनएम राका ने भी अपने विचार रखे।
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