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30 साल पहले मिली आजीवन कारावास की सजा, हाईकोर्ट ने किया बरी
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Tue, 01 Aug 2017 02:26 PM IST
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राजस्थान हाईकोर्ट ने हत्या के आरोप में तीस साल पहले मिली आजीवन कारावास की सजा को रद्द करते हुए आरोपी को दोषमुक्त कर दिया है। अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि अभियोजन पक्ष की ओर से ऐसे साक्ष्य पेश नहीं किए गए हैं, जिन पर विश्वास किया जा सके। यहां तक की अभियोजन पक्ष मृतक की मौत की तारीख भी नहीं बता सका।
न्यायाधीश केएस अहलुवालिया और न्यायाधीश जीआर मूलचंदानी की खंडपीठ ने यह आदेश भीमा की ओर से दायर तीस साल पुरानी आपराधिक अपील का निस्तारण करते हुए दिए। याचिका में अधिवक्ता मोहिल बलवदा ने बताया कि चेतीराम ने 31 मार्च 1986 को भतरपुर के कोतवाली थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उसका लडका खेमसिंह चपरासी भीमा के साथ रहता है। पिछले दस दिन से खेमसिंह गायब है।
पुलिस को मिली लाश खेमसिंह की है, जिसका भीमसिंह ने कत्ल किया है। पुलिस की ओर से आरोप पत्र पेश करने के बाद अदालत ने नवंबर 1987 को भीमा को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। जिसे चुनौती देते हुए बचाव पक्ष की ओर से कहा गया कि मृतक अपीलार्थी के साथ रहने के बजाए परिवार सहित अलग रहता था। इसके अलावा अभियोजन पक्ष ऐसी कोई साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जिससे साबित हो कि मृतक और अपीलार्थी आखिरी बार एक साथ देखे गए हो। ऐसे में निचली अदालत के आदेश को रद्द कर अपीलार्थी को दोषमुक्त किया जाए। जिस पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए अपीलार्थी को हत्या के आरोप से दोषमुक्त कर दिया है।
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न्यायाधीश केएस अहलुवालिया और न्यायाधीश जीआर मूलचंदानी की खंडपीठ ने यह आदेश भीमा की ओर से दायर तीस साल पुरानी आपराधिक अपील का निस्तारण करते हुए दिए। याचिका में अधिवक्ता मोहिल बलवदा ने बताया कि चेतीराम ने 31 मार्च 1986 को भतरपुर के कोतवाली थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उसका लडका खेमसिंह चपरासी भीमा के साथ रहता है। पिछले दस दिन से खेमसिंह गायब है।
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पुलिस को मिली लाश खेमसिंह की है, जिसका भीमसिंह ने कत्ल किया है। पुलिस की ओर से आरोप पत्र पेश करने के बाद अदालत ने नवंबर 1987 को भीमा को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। जिसे चुनौती देते हुए बचाव पक्ष की ओर से कहा गया कि मृतक अपीलार्थी के साथ रहने के बजाए परिवार सहित अलग रहता था। इसके अलावा अभियोजन पक्ष ऐसी कोई साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जिससे साबित हो कि मृतक और अपीलार्थी आखिरी बार एक साथ देखे गए हो। ऐसे में निचली अदालत के आदेश को रद्द कर अपीलार्थी को दोषमुक्त किया जाए। जिस पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए अपीलार्थी को हत्या के आरोप से दोषमुक्त कर दिया है।
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