इमरान खान भले ही प्रधानमंत्री बन गए हों और नवजोत सिंह सिद्धू मंत्री पद पर आसीन हों, लेकिन कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकतर क्रिकेटरों को राजनीति की पिच रास नहीं आई। यहां राजनीतिक ‘बाउंसर’ और ‘बीमर’ के सामने अक्सर उनकी ‘बल्लेबाजी’ नहीं चल पाई है। पूर्व भारतीय सलामी बल्लेबाज गौतम गंभीर का नाम क्रिकेटर से राजनीतिज्ञ बनने वाले खिलाड़ियों की सूची में जुड़ा सबसे नया नाम है। गंभीर भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर पूर्वी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से अपना भाग्य आजमा रहे हैं। उनके सलामी जोड़ीदार वीरेंद्र सहवाग के भी चुनाव लड़ने की अफवाह थी, लेकिन लगातार दूसरे चुनावों में यह खबर अफवाह ही साबित हुई।
सियासी ‘बाउंसर’ के आगे टिक नहीं पाए हैं ज्यादातर क्रिकेटर, धरी रह गई 'बल्लेबाजी'
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गंभीर से पहले भी कई भारतीय क्रिकेटरों ने राजनीति का रूख किया है। कुछ सांसद और विधायक भी बने लेकिन जहां अन्य खेलों के खिलाड़ियों को केंद्र में मंत्री पद सुशोभित करने का मौका मिला, वहीं क्रिकेटर इस मामले में अब तक भाग्यशाली नहीं रहे हैं। ज्यादातर क्रिकेटरों की राजनीतिक पारी तो चुनावी पिच से आगे ही नहीं बढ़ पायी। इनमें पूर्व भारतीय कप्तान मंसूर अली खां पटौदी भी शामिल हैं, जो सक्रिय राजनीति में आने वाले स्वतंत्र भारत के पहले क्रिकेटर थे। पटौदी ने विधानसभा और लोकसभा चुनावों में किस्मत आजमायी थी लेकिन दोनों में उन्हें हार मिली थी।
वैसे राजनीति में कदम रखने वाले पहले भारतीय क्रिकेटर पालवंकर बालू थे। कुल 33 प्रथम श्रेणी मैच खेलने वाले बालू देश के पहले दलित क्रिकेटर भी थे। उन्होंने 1933-34 में बंबई नगर निकाय का चुनाव लड़ा था। इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी पुस्तक ‘ए कार्नर ऑफ़ ए फॉरेन फील्ड’ में लिखा है कि 1937 में बांबे प्रेसीडेंसी के चुनाव में सरदार बल्लभ भाई पटेल के कहने पर बालू ने डॉ. भीमराव अंबेडकर के खिलाफ चुनाव लड़ा था लेकिन हार गये थे।
वह पटौदी ही थे जिन्होंने क्रिकेटरों के लिये राजनीति के द्वार खोले लेकिन उनकी हार ने क्रिकेटरों को राजनीतिक करियर को लेकर सतर्क भी किया। हालांकि चेतन चौहान जैसे कई क्रिकेटर लोकसभा का चुनाव जीतकर सांसद बनने में कामयाब रहे। चेतन चौहान ने भाजपा के टिकट से 1991 में अमरोहा में चुनाव लड़ा और वे वहां से सांसद चुने गए थे। हालांकि ये भी सच है कि आगे इस क्षेत्र में वो बुलंदियों तक नहीं पहुंच पाए।
इनके अलावा कीर्ति आजाद, नवजोत सिंह सिद्धू और मोहम्मद अजहरूद्दीन भी उन खिलाड़ियों में से एक हैं जिन्होंने राजनीति में भी मैदान जैसा ही बेहतर प्रदर्शन किया।वहीं भारत रत्न सचिन तेंदुलकर राज्यसभा के मनोनीत सदस्य के रूप में संसद तक पहुंचे थे।