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18 साल की बेटी, घर की जिम्मेदारी व पहाड़ों का जुनून: शिवानी ने यूरोप की सबसे ऊंची चोटी पर फहराया तिरंगा; कैसे?
Mon, 07 Sep 2026 05:23 AM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Mon, 07 Sep 2026 05:23 AM IST
सार
शिवानी ने परिवार और 18 वर्षीय बेटी की जिम्मेदारियों के बीच पर्वतारोहण के अपने जुनून को कायम रखा। कश्मीर, लद्दाख और फ्रेंडशिप पीक की ऊंचाइयों से सीखते हुए उन्होंने पहले अफ्रीका के किलिमंजारो और अब यूरोप की सबसे ऊंची चोटी रूस के माउंट एलब्रुस को फतह किया है।
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शिवानी मेहरोत्रा
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
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विस्तार
15 अगस्त, 2026। सुबह का वक्त। यूरोप की सबसे ऊंची चोटी, रूस का माउंट एलब्रुस। तापमान करीब माइनस 15-20 डिग्री सेल्सियस। तेज बर्फीली हवाएं चल रही थीं और चारों तरफ दूर-दूर तक सिर्फ बर्फ ही दिखाई दे रही थी। उसके बीच जब एक भारतीय महिला ने अपने हाथों से तिरंगा फहराया, तो वह पल सिर्फ एक पर्वत फतह करने का नहीं, बल्कि अपने भीतर के डर और उम्र की सीमाओं को पीछे छोड़ने का था। यह महिला थीं 43 वर्षीय शिवानी मेहरोत्रा। शिवानी के लिए यह चढ़ाई अचानक लिया गया फैसला नहीं था। परिवार की जिम्मेदारियों, 18 साल की बेटी और रोजमर्रा की व्यस्त जिंदगी के बीच उन्होंने अपने एक पुराने सपने को जिंदा रखा था और वह था पहाड़ों की ऊंचाइयों तक पहुंचने का सपना। रास्ता आसान नहीं था। हर कदम के साथ शरीर जवाब देने लगता, सांसें तेज हो जातीं और बर्फीली हवाएं हौसले की परीक्षा लेतीं। लेकिन शिवानी हर कदम पर खुद को और मजबूत करती गईं। इसलिए, उस सुबह जब तिरंगा एलब्रुस की चोटी पर लहराया, तो उसके साथ शिवानी की वर्षों की मेहनत, परिवार का भरोसा और उन तमाम महिलाओं के सपने भी लहरा रहे थे, जिन्हें अक्सर अपनी जिम्मेदारियों के बीच अपने सपनों को पीछे छोड़ना पड़ता है।
सपनों की उड़ान
43 वर्षीय शिवानी मेहरोत्रा उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले की रहने वाली हैं। 24 साल की उम्र में उनकी शादी हुई और कुछ समय बाद वह अपने परिवार के साथ मुंबई जाकर बस गईं। पेशे से योग शिक्षिका शिवानी फिटनेस को लेकर भी काफी सजग हैं। उनकी 18 साल की बेटी है। पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच भी शिवानी ने पर्वतारोहण के अपने जुनून को कभी खत्म नहीं होने दिया। उन्होंने परिवार और अपने सपने के बीच ऐसा संतुलन बनाया कि जिम्मेदारियां भी निभती रहीं और पहाड़ों पर चढ़ने का सपना भी आगे बढ़ता रहा। इसके लिए उन्होंने लगातार खुद को तैयार किया। इस पूरे सफर में उनके माता-पिता, पति, बेटी और दोस्तों ने उनका हौसला बढ़ाया। शिवानी की कहानी को खास बनाती है उनकी आत्मनिर्भरता। उन्होंने अपने पर्वतारोहण अभियानों का बड़ा हिस्सा किसी बाहरी मदद के बजाय अपनी मेहनत की कमाई और बचत से पूरा किया।
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ऐसे शुरू हुआ सफर
शिवानी का पर्वतारोहण का सफर 2019 में शुरू हुआ। उस समय उन्होंने एक दोस्त के साथ माउंट एवरेस्ट बेस कैंप जाने की योजना बनाई थी। यही यात्रा उनके लिए पहाड़ों से जुड़ने की शुरुआत बन गई। इसके बाद उन्होंने कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश में कई ट्रेक किए। धीरे-धीरे उनका सफर सामान्य ट्रेकिंग से आगे बढ़ा और उन्होंने ऊंची चोटियों पर चढ़ाई शुरू कर दी। इसी जुनून के चलते उन्होंने फ्रेंडशिप पीक और फिर 2026 की शुरुआत में अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी किलिमंजारो के शिखर पर पहुंचकर एक और उपलब्धि अपने नाम की। इसके अलावा, कैलाश से जुड़े पांच प्रमुख ट्रेक में से चार को भी वह पूरा कर चुकी हैं।
(फोटो साभार: इंस्टाग्राम @the.mountain.diva)
फतह की तैयारी
एलब्रुस की चढ़ाई कोई एक दिन की उपलब्धि नहीं थी। इसके पीछे कई दिनों का अभियान और महीनों की तैयारी थी। 10-दिन के एलब्रुस अभियान के लिए शिवानी ने दुबई होते हुए रूस के मिनरलनी वोडी तक का सफर तय किया। शिखर की ओर बढ़ने से पहले शिवानी और उनकी टीम ने 3,000, 4,000 और 4,700 मीटर तक चढ़ाई की। इसका मकसद शरीर को ऊंचाई पर कम ऑक्सीजन और पतली हवा का आदी बनाना था। टीम ने किसी आपात स्थिति से निपटने के लिए जरूरी आत्म-बचाव तकनीकों का भी अभ्यास किया। पहाड़ पर मौसम कभी भी बदल सकता था, इसलिए टीम ने एक अतिरिक्त दिन भी रिजर्व रखा था। खराब मौसम के कारण अगर शिखर पर जाने की योजना टालनी पड़े, तो उस दिन का इस्तेमाल किया जा सके।
ये भी पढ़ें: बड़ा सवाल: सीडीएससीओ की जांच में 199 दवा के नमूने गुणवत्ता पर खरे नहीं उतरे, एक नकली मिला; कितनी दवाएं असरहीन?
अंधेरे में दिखी शिखर की रोशनी
15 अगस्त की रात शिवानी और उनकी टीम ने माउंट एलब्रुस के शिखर की ओर अपनी आखिरी चढ़ाई शुरू की। चारों तरफ घना अंधेरा था। तापमान बेहद कम था और ऊंचाई बढ़ने के साथ ऑक्सीजन भी कम होती जा रही थी। हर कदम के साथ मुश्किलें बढ़ रही थीं, लेकिन शिवानी ने हिम्मत नहीं छोड़ी। करीब साढ़े चार घंटे की कठिन चढ़ाई के बाद आखिर वह 5,642 मीटर ऊंचे एलब्रुस के शिखर पर पहुंच गईं। यह पल उनके लिए इसलिए और खास था, क्योंकि तारीख 15 अगस्त थी। जब भारत में लोग स्वतंत्रता दिवस मना रहे थे, उसी समय रूस के काकेशस क्षेत्र में शिवानी ने एलब्रुस की चोटी पर तिरंगा फहराया ।
युवाओं को सीख
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सपनों की उड़ान
43 वर्षीय शिवानी मेहरोत्रा उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले की रहने वाली हैं। 24 साल की उम्र में उनकी शादी हुई और कुछ समय बाद वह अपने परिवार के साथ मुंबई जाकर बस गईं। पेशे से योग शिक्षिका शिवानी फिटनेस को लेकर भी काफी सजग हैं। उनकी 18 साल की बेटी है। पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच भी शिवानी ने पर्वतारोहण के अपने जुनून को कभी खत्म नहीं होने दिया। उन्होंने परिवार और अपने सपने के बीच ऐसा संतुलन बनाया कि जिम्मेदारियां भी निभती रहीं और पहाड़ों पर चढ़ने का सपना भी आगे बढ़ता रहा। इसके लिए उन्होंने लगातार खुद को तैयार किया। इस पूरे सफर में उनके माता-पिता, पति, बेटी और दोस्तों ने उनका हौसला बढ़ाया। शिवानी की कहानी को खास बनाती है उनकी आत्मनिर्भरता। उन्होंने अपने पर्वतारोहण अभियानों का बड़ा हिस्सा किसी बाहरी मदद के बजाय अपनी मेहनत की कमाई और बचत से पूरा किया।
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ऐसे शुरू हुआ सफर
शिवानी का पर्वतारोहण का सफर 2019 में शुरू हुआ। उस समय उन्होंने एक दोस्त के साथ माउंट एवरेस्ट बेस कैंप जाने की योजना बनाई थी। यही यात्रा उनके लिए पहाड़ों से जुड़ने की शुरुआत बन गई। इसके बाद उन्होंने कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश में कई ट्रेक किए। धीरे-धीरे उनका सफर सामान्य ट्रेकिंग से आगे बढ़ा और उन्होंने ऊंची चोटियों पर चढ़ाई शुरू कर दी। इसी जुनून के चलते उन्होंने फ्रेंडशिप पीक और फिर 2026 की शुरुआत में अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी किलिमंजारो के शिखर पर पहुंचकर एक और उपलब्धि अपने नाम की। इसके अलावा, कैलाश से जुड़े पांच प्रमुख ट्रेक में से चार को भी वह पूरा कर चुकी हैं।
(फोटो साभार: इंस्टाग्राम @the.mountain.diva)
फतह की तैयारी
एलब्रुस की चढ़ाई कोई एक दिन की उपलब्धि नहीं थी। इसके पीछे कई दिनों का अभियान और महीनों की तैयारी थी। 10-दिन के एलब्रुस अभियान के लिए शिवानी ने दुबई होते हुए रूस के मिनरलनी वोडी तक का सफर तय किया। शिखर की ओर बढ़ने से पहले शिवानी और उनकी टीम ने 3,000, 4,000 और 4,700 मीटर तक चढ़ाई की। इसका मकसद शरीर को ऊंचाई पर कम ऑक्सीजन और पतली हवा का आदी बनाना था। टीम ने किसी आपात स्थिति से निपटने के लिए जरूरी आत्म-बचाव तकनीकों का भी अभ्यास किया। पहाड़ पर मौसम कभी भी बदल सकता था, इसलिए टीम ने एक अतिरिक्त दिन भी रिजर्व रखा था। खराब मौसम के कारण अगर शिखर पर जाने की योजना टालनी पड़े, तो उस दिन का इस्तेमाल किया जा सके।
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अंधेरे में दिखी शिखर की रोशनी
15 अगस्त की रात शिवानी और उनकी टीम ने माउंट एलब्रुस के शिखर की ओर अपनी आखिरी चढ़ाई शुरू की। चारों तरफ घना अंधेरा था। तापमान बेहद कम था और ऊंचाई बढ़ने के साथ ऑक्सीजन भी कम होती जा रही थी। हर कदम के साथ मुश्किलें बढ़ रही थीं, लेकिन शिवानी ने हिम्मत नहीं छोड़ी। करीब साढ़े चार घंटे की कठिन चढ़ाई के बाद आखिर वह 5,642 मीटर ऊंचे एलब्रुस के शिखर पर पहुंच गईं। यह पल उनके लिए इसलिए और खास था, क्योंकि तारीख 15 अगस्त थी। जब भारत में लोग स्वतंत्रता दिवस मना रहे थे, उसी समय रूस के काकेशस क्षेत्र में शिवानी ने एलब्रुस की चोटी पर तिरंगा फहराया ।
युवाओं को सीख
- उम्र या परिस्थितियों को बहाना न बनाएं, क्योंकि अगर लक्ष्य स्पष्ट है, तो रास्ता जरूर निकलेगा।
- अनुशासन, जुनून से भी ज्यादा जरूरी है।
- केवल सपना देखना काफी नहीं, उसके लिए रोज मेहनत करनी पड़ती है।