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Una News: शिवनगर टकारला की ऊषा ने दूध उत्पादन को बनाया स्वरोजगार का साधन
Sun, 27 Sep 2026 12:52 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
Updated Sun, 27 Sep 2026 12:52 AM IST
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नारी (ऊना)। ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाली महिलाएं अब घर बैठे भी आत्मनिर्भर बन रही हैं। गांव शिवनगर, टकारला की ऊषा घर बैठे ही पशुपालन और दूध उत्पादन से प्रतिमाह 35 से 40 हजार रुपये की आय कमा रही हैं। ऊषा ने 10 गाय पाली हैं। इनसे वह प्रतिदिन 80 लीटर दूध बेच रही हैं। दूध से होने वाली आमदनी से वह अपने घर का खर्च निकाल रही हैं और जीवन यापन के स्तर में भी सुधार आया है। दूध उत्पादन में पेश आ रही महंगाई की चुनौती के बावजूद ऊषा अपने कार्य को पूरी मेहनत और दृढ संकल्प के साथ आगे बढ़ा रही हैं।
ऊषा देवी ने बताया कि वह प्रतिदिन दूध को मिल्कफेड के माध्यम से बेच रही हैं। हालांकि अब मिल्कफेड की ओर से दूध खरीदने की लिमिट तय की जा रही है, इसमें प्रतिदिन केवल 20 लीटर दूध ही खरीदा जाएगा और महीने में दो दिन छुट्टी रहेगी। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा होता है तो वह बचे हुए दूध से पनीर, खोया इत्यादि बनाकर बेचने की योजना बना रही हैं। उनका कहना है कि दुधारू पशुपालन भी बड़ी तकनीक का काम है। पशु बीमार हो जाते हैं तो उनकी तासीर समझनी पड़ती है कि पशु को कौन सी देसी चीज दी जाए ताकि वह बिना डॉक्टर से ही ठीक हो जाए। इसके अलावा खाने का चारा साफ-सुथरा और उनके नीचे साफ-सफाई का होना बहुत जरूरी है। उन्होंने बताया कि इस कार्य में उनके पति का पूरा सहयोग मिल रहा है। ऊषा ने कहा आज के महंगाई के दौर में दुधारू पशु रखना काफी मुश्किल हो गया है। पशुओं का चारा यानी तूड़ी इस समय 1200 रुपये प्रति क्विंटल मिल रही है और उनकी खुराक जिसमें फीड, खल आदि के दाम भी डेढ़ गुना अधिक हो गए हैं जबकि दूध के रेट वही चल रहा है। उन्होंने कहा कि महंगाई ने कार्य को चुनौतीपूर्ण बना दिया है लेकिन घर में खाली बैठने के बजाय महिलाएं दूध उत्पादन से अपने घर का खर्च निकाल सकती हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि यदि सरकार की ओर से दूध के दामों में बढ़ोतरी की जाती है तो और अच्छी आमदनी हो सकती है।
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ऊषा देवी ने बताया कि वह प्रतिदिन दूध को मिल्कफेड के माध्यम से बेच रही हैं। हालांकि अब मिल्कफेड की ओर से दूध खरीदने की लिमिट तय की जा रही है, इसमें प्रतिदिन केवल 20 लीटर दूध ही खरीदा जाएगा और महीने में दो दिन छुट्टी रहेगी। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा होता है तो वह बचे हुए दूध से पनीर, खोया इत्यादि बनाकर बेचने की योजना बना रही हैं। उनका कहना है कि दुधारू पशुपालन भी बड़ी तकनीक का काम है। पशु बीमार हो जाते हैं तो उनकी तासीर समझनी पड़ती है कि पशु को कौन सी देसी चीज दी जाए ताकि वह बिना डॉक्टर से ही ठीक हो जाए। इसके अलावा खाने का चारा साफ-सुथरा और उनके नीचे साफ-सफाई का होना बहुत जरूरी है। उन्होंने बताया कि इस कार्य में उनके पति का पूरा सहयोग मिल रहा है। ऊषा ने कहा आज के महंगाई के दौर में दुधारू पशु रखना काफी मुश्किल हो गया है। पशुओं का चारा यानी तूड़ी इस समय 1200 रुपये प्रति क्विंटल मिल रही है और उनकी खुराक जिसमें फीड, खल आदि के दाम भी डेढ़ गुना अधिक हो गए हैं जबकि दूध के रेट वही चल रहा है। उन्होंने कहा कि महंगाई ने कार्य को चुनौतीपूर्ण बना दिया है लेकिन घर में खाली बैठने के बजाय महिलाएं दूध उत्पादन से अपने घर का खर्च निकाल सकती हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि यदि सरकार की ओर से दूध के दामों में बढ़ोतरी की जाती है तो और अच्छी आमदनी हो सकती है।
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