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Una News: ओबीसी आयोग में हुई नियुक्तियों पर सियासी घमासान
Wed, 29 Apr 2026 12:36 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
Updated Wed, 29 Apr 2026 12:36 AM IST
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बड़ूही (ऊना)। हिमाचल प्रदेश अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आयोग में हाल ही में हुई नियुक्तियों को लेकर प्रदेश की राजनीति में तीखा टकराव शुरू हो गया है। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू द्वारा आयोग में दो सदस्यों की नियुक्ति के बाद भाजपा ओबीसी मोर्चा खुलकर विरोध में उतर आया है और इस फैसले को ओबीसी वर्ग के अधिकारों पर सीधा हमला बताया है। मंगलवार को जारी संयुक्त प्रेस बयान में भाजपा ओबीसी मोर्चा के कार्यकारी सदस्य एवं जिला ऊना प्रभारी जयदेव खट्टा और जिला अध्यक्ष मनोहर लाल चौधरी ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए।
उन्होंने कहा कि आयोग जैसे संवेदनशील संस्थान में नियुक्तियां पारदर्शिता और योग्यता के आधार पर होनी चाहिए थीं लेकिन वर्तमान सरकार ने योग्यता को दरकिनार कर अपने चहेतों को लाभ पहुंचाने का काम किया है। उनका आरोप है कि यह फैसला न केवल पक्षपातपूर्ण है बल्कि इससे ओबीसी समाज का विश्वास भी कमजोर हुआ है। मोर्चा नेताओं ने सवाल उठाया कि जब प्रदेश में ओबीसी वर्ग की बड़ी आबादी है तो आयोग में उन्हीं वर्गों के योग्य और अनुभवी प्रतिनिधियों को प्राथमिकता क्यों नहीं दी गई। उन्होंने कहा कि सरकार की यह कार्यप्रणाली रेवड़ी कल्चर को बढ़ावा देती है जो लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। जयदेव खट्टा ने कहा कि यह पहली बार नहीं है जब ओबीसी वर्ग की अनदेखी हुई हो, बल्कि कांग्रेस सरकारों का इतिहास ही इस वर्ग की उपेक्षा से भरा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार भी उसी नीति पर चल रही है। ओबीसी समाज को केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है और निर्णय लेने के समय उन्हें दरकिनार कर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि ओबीसी वर्ग के हक पर किसी भी प्रकार का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने मांग की है कि इन नियुक्तियों को तुरंत प्रभाव से रद्द किया जाए और नए सिरे से पारदर्शी प्रक्रिया अपनाते हुए ओबीसी वर्ग के योग्य, अनुभवी चेहरों को आयोग में शामिल किया जाए। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि सरकार ने इस मामले में शीघ्र सुधारात्मक कदम नहीं उठाए, तो प्रदेशभर में चरणबद्ध और उग्र आंदोलन शुरू किया जाएगा। इस मौके पर ओबीसी मोर्चा के पदाधिकारी एडवोकेट रितेश पटियाल, पवन सैनी, तरसेम लाल, वीरेंद्र चौधरी, प्रवीण कुमार और कमलेश कुमार सहित कई कार्यकर्ता मौजूद रहे। उन्होंने एक स्वर में सरकार के फैसले का विरोध किया और आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लेने की बात कही।
इस पूरे घटनाक्रम ने हिमाचल की राजनीति का पारा बढ़ा दिया है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है, खासकर यदि सरकार की ओर से कोई स्पष्ट जवाब या कार्रवाई नहीं आती। फिलहाल, प्रदेश में ओबीसी आयोग की नियुक्तियां एक बड़े सियासी विवाद का केंद्र बन चुकी हैं।
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उन्होंने कहा कि आयोग जैसे संवेदनशील संस्थान में नियुक्तियां पारदर्शिता और योग्यता के आधार पर होनी चाहिए थीं लेकिन वर्तमान सरकार ने योग्यता को दरकिनार कर अपने चहेतों को लाभ पहुंचाने का काम किया है। उनका आरोप है कि यह फैसला न केवल पक्षपातपूर्ण है बल्कि इससे ओबीसी समाज का विश्वास भी कमजोर हुआ है। मोर्चा नेताओं ने सवाल उठाया कि जब प्रदेश में ओबीसी वर्ग की बड़ी आबादी है तो आयोग में उन्हीं वर्गों के योग्य और अनुभवी प्रतिनिधियों को प्राथमिकता क्यों नहीं दी गई। उन्होंने कहा कि सरकार की यह कार्यप्रणाली रेवड़ी कल्चर को बढ़ावा देती है जो लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। जयदेव खट्टा ने कहा कि यह पहली बार नहीं है जब ओबीसी वर्ग की अनदेखी हुई हो, बल्कि कांग्रेस सरकारों का इतिहास ही इस वर्ग की उपेक्षा से भरा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार भी उसी नीति पर चल रही है। ओबीसी समाज को केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है और निर्णय लेने के समय उन्हें दरकिनार कर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि ओबीसी वर्ग के हक पर किसी भी प्रकार का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने मांग की है कि इन नियुक्तियों को तुरंत प्रभाव से रद्द किया जाए और नए सिरे से पारदर्शी प्रक्रिया अपनाते हुए ओबीसी वर्ग के योग्य, अनुभवी चेहरों को आयोग में शामिल किया जाए। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि सरकार ने इस मामले में शीघ्र सुधारात्मक कदम नहीं उठाए, तो प्रदेशभर में चरणबद्ध और उग्र आंदोलन शुरू किया जाएगा। इस मौके पर ओबीसी मोर्चा के पदाधिकारी एडवोकेट रितेश पटियाल, पवन सैनी, तरसेम लाल, वीरेंद्र चौधरी, प्रवीण कुमार और कमलेश कुमार सहित कई कार्यकर्ता मौजूद रहे। उन्होंने एक स्वर में सरकार के फैसले का विरोध किया और आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लेने की बात कही।
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इस पूरे घटनाक्रम ने हिमाचल की राजनीति का पारा बढ़ा दिया है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है, खासकर यदि सरकार की ओर से कोई स्पष्ट जवाब या कार्रवाई नहीं आती। फिलहाल, प्रदेश में ओबीसी आयोग की नियुक्तियां एक बड़े सियासी विवाद का केंद्र बन चुकी हैं।
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