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Una News: सिंचाई सुविधा में सुधार, अगेती खेती से फसलें हो रहीं तैयार
Sun, 19 May 2024 06:26 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
Updated Sun, 19 May 2024 06:26 AM IST
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हरोली क्षेत्र के पंडोगा गांव में उगाई गई मक्की की अगेती फसल। स्रोत संवाद
जिले में 2000 हेक्टेयर भूमि में हुई है मक्की की अगेती फसल की बिजाई
हरोली, गगरेट, ऊना और अंब क्षेत्रों में खुले खेतीबाड़ी के नए दरवाजे
संवाद न्यूज एजेंसी
ऊना। सिंचाई सुविधा बेहतर होने से जिला में अगेती फसलों को तैयार करने की ओर रुझान बढ़ा है। पहले जहां मक्की की बिजाई बरसात के दस्तक के साथ होती थी, तो वहीं अब लोग गेहूं की कटाई के साथ ही मक्की की बिजाई करने लगे हैं। इसके अलावा कई स्थानों पर गोभी, भिंडी, शिमला मिर्च और बैंगन जैसी हरी सब्जियां भी तैयार हो चुकी हैं, जिन्हें मंडियों तक पहुंचाया जाने लगा है, जबकि पहले गर्मी के मौसम में हरी सब्जियों के लिए प्रदेश के अन्य जिलों व अन्य राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता था।
जानकारी के अनुसार वर्तमान में हरोली, गगरेट, ऊना और अंब क्षेत्रों में सिंचाई सुविधा पहले से कई गुना बेहतर हुई है। कई स्थानों पर सरकारी नलकूप को अन्य हिस्सों में किसानों ने अपने स्तर पर ट्यूबवेल लगवाए हैं। बिजली की मोटर और जहां विद्युत सुविधा नहीं है, वहां डीजल इंजन के जरिए सिंचाई होती है। वर्तमान में जिला में करीब 2000 हेक्टेयर जमीन पर अगेती मक्की तैयार हो रही है। इस फसल को अधिकतर किसान बिना सुखाए मंडियों तक पहुंचाते हैं। इस फसल को सूखी फसल के मुकाबले दाम तो कम मिलते हैं, लेकिन सूखी के मुकाबले गीली मक्की का वजन भी अधिक होता है, जिससे फसल से हासिल होने वाले लाभ का अंतर अधिक नहीं होता।
पोल्ट्री व खाद्य पदार्थों के लिए होती है इस्तेमाल
ध्यान रहे कि गीली मक्की की पोल्ट्री उद्योग में काफी मांग है। मुर्गियों के खाने के लिए गिली मक्की की बड़े स्तर पर खरीद होती है। इसके अलावा खाद्य पदार्थों में भी गीली मक्की का काफी मात्रा में इस्तेमाल होता है। जिला के किसान पंजाब के होशियारपुर में जाकर मक्की की बिक्री करते हैं। इसका कारण यह है कि जिला में बड़े स्तर पर मक्की की खरीद करने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। बता दें कि मक्की की अगेती फसल अगस्त माह तक तैयार होती है। उस समय बरसात का मौसम चरम पर होता है और किसान फसल को बिना सुखाए बेचना ही बेहतर मानते हैंं, जबकि मक्की की पारंपरिक खेती सर्दी के शुरुआती महीनों में तैयार होती है और किसान उसे सुखाने के बाद मंडियों में बेचते हैं।
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कोट्स
जिले में बेहतर सिंचाई सुविधाओं का लाभ किसानों को मिल रहा है। किसानों को फसल तैयार करने से लेकर उन्हें कहां बेचना है, इस बारे में बारीकी से समझ है, जिसका लाभ भी उन्हें मिलता है। इस बार भी बड़े स्तर पर मक्की की अगेती फसल तैयार हो रही है। हालांकि भीषण गर्मी में यह फसल तैयार करना बड़ी चुनौती रहती है।
कुलभूषण धीमान, उपनिदेशक, जिला कृषि विभाग
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हरोली, गगरेट, ऊना और अंब क्षेत्रों में खुले खेतीबाड़ी के नए दरवाजे
संवाद न्यूज एजेंसी
ऊना। सिंचाई सुविधा बेहतर होने से जिला में अगेती फसलों को तैयार करने की ओर रुझान बढ़ा है। पहले जहां मक्की की बिजाई बरसात के दस्तक के साथ होती थी, तो वहीं अब लोग गेहूं की कटाई के साथ ही मक्की की बिजाई करने लगे हैं। इसके अलावा कई स्थानों पर गोभी, भिंडी, शिमला मिर्च और बैंगन जैसी हरी सब्जियां भी तैयार हो चुकी हैं, जिन्हें मंडियों तक पहुंचाया जाने लगा है, जबकि पहले गर्मी के मौसम में हरी सब्जियों के लिए प्रदेश के अन्य जिलों व अन्य राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता था।
जानकारी के अनुसार वर्तमान में हरोली, गगरेट, ऊना और अंब क्षेत्रों में सिंचाई सुविधा पहले से कई गुना बेहतर हुई है। कई स्थानों पर सरकारी नलकूप को अन्य हिस्सों में किसानों ने अपने स्तर पर ट्यूबवेल लगवाए हैं। बिजली की मोटर और जहां विद्युत सुविधा नहीं है, वहां डीजल इंजन के जरिए सिंचाई होती है। वर्तमान में जिला में करीब 2000 हेक्टेयर जमीन पर अगेती मक्की तैयार हो रही है। इस फसल को अधिकतर किसान बिना सुखाए मंडियों तक पहुंचाते हैं। इस फसल को सूखी फसल के मुकाबले दाम तो कम मिलते हैं, लेकिन सूखी के मुकाबले गीली मक्की का वजन भी अधिक होता है, जिससे फसल से हासिल होने वाले लाभ का अंतर अधिक नहीं होता।
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पोल्ट्री व खाद्य पदार्थों के लिए होती है इस्तेमाल
ध्यान रहे कि गीली मक्की की पोल्ट्री उद्योग में काफी मांग है। मुर्गियों के खाने के लिए गिली मक्की की बड़े स्तर पर खरीद होती है। इसके अलावा खाद्य पदार्थों में भी गीली मक्की का काफी मात्रा में इस्तेमाल होता है। जिला के किसान पंजाब के होशियारपुर में जाकर मक्की की बिक्री करते हैं। इसका कारण यह है कि जिला में बड़े स्तर पर मक्की की खरीद करने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। बता दें कि मक्की की अगेती फसल अगस्त माह तक तैयार होती है। उस समय बरसात का मौसम चरम पर होता है और किसान फसल को बिना सुखाए बेचना ही बेहतर मानते हैंं, जबकि मक्की की पारंपरिक खेती सर्दी के शुरुआती महीनों में तैयार होती है और किसान उसे सुखाने के बाद मंडियों में बेचते हैं।
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जिले में बेहतर सिंचाई सुविधाओं का लाभ किसानों को मिल रहा है। किसानों को फसल तैयार करने से लेकर उन्हें कहां बेचना है, इस बारे में बारीकी से समझ है, जिसका लाभ भी उन्हें मिलता है। इस बार भी बड़े स्तर पर मक्की की अगेती फसल तैयार हो रही है। हालांकि भीषण गर्मी में यह फसल तैयार करना बड़ी चुनौती रहती है।
कुलभूषण धीमान, उपनिदेशक, जिला कृषि विभाग