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Una News: 20 वर्ष तक कठोर परीक्षा के बाद 26 वर्ष की आयु में गुरु आत्मानंद ने सौंपी थी गद्दी
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डेरा बाबा रुद्रा नंद धाम नारी में स्वामी सुग्रीवानंद जी महाराज शरीर को त्यागने पर डेरा में जाम
सुग्रीवानंद महाराज को 6 वर्ष की आयु में आश्रम छोड़ गए थे परिजन, बचपन का नाम था कर्मचंद
नारी (ऊना)। 5 नवंबर 1928 को ऊना जिला के गुगलैहड़ में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे बालक को उस समय क्या पता था कि वह सनातन परंपरा को बुलंदियों तक पहुंचाएगा।
बचपन का नाम कर्म चंद था। उस समय आश्रम डेरा बाबा रुद्रानंद में बाबा आत्मानंद महाराज डेरा के महंंत थे। उन्होंने आश्रम में एक संस्कृत पाठशाला चला रखी थी।
उस समय संसाधन नाममात्र थे। कर्मचंद के माता-पिता ने भी 6 वर्ष की आयु में बालक को आश्रम में आत्मानंद महाराज के पास छोड़ दिया। जहां पर इन्होंने प्रारंभिक शिक्षा संस्कृत में हासिल की। बचपन से ही आत्मानंद ने देखा कि यह बालक भक्ति भाव में रमा रहता है। शुरू से ही उनकी नजर इस बालक पर थी।
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धीरे-धीरे बालक ने आश्रम में ही शिक्षा ग्रहण की तथा महाराज आत्मानंद को अपना गुरु धारण कर लिया। गुरु दीक्षा लेने के बाद गुरु के साथ बैठकर तपस्या करना और अन्य कर्मकांड सीख लिए। महाराज आत्मानंद ने 20 वर्ष तक इनकी कठोर परीक्षा ली। तब जाकर उन्हें गद्दी का उत्तराधिकारी बनने के योग्य समझा और 1952 में मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा तिथि को कर्म चंद को 26 वर्ष की आयु में गद्दी पर बिठाया और इनका नाम सुग्रीवानंद रखा। आत्मानंद के समाधि लीन होने के बाद बनारस में चारों वेद और उपनिषदों का अध्ययन किया। इसके अलावा कर्मकांड और सभी शास्त्रों के ज्ञान हासिल किया। सुग्रीवानंद ने संसाधन जुटाकर आश्रम में बहुत ही तरक्की की तथा लोगों को सद्मार्ग का रास्ता दिखाया। सनातन धर्म का प्रचार किया, मार्गदर्शन किया तथा अपने से पहले महंतों की ओर से चलाई गई परंपराओं को आगे बढ़ाया। 1850 से चल रहा धूना बाकायदा आज भी चल रहा है।
1864 में सदा व्रत लंगर को भी जारी रखा। आज भी 24 घटे लंगर आश्रम में लगा रहता है। तड़के 3:00 उठकर स्नान आदि के बाद धूने पर आकर तपस्या करना उनकी दिनचर्या थी। आश्रम में चल रही संस्कृत पाठशाला को विश्वविद्यालय का दर्जा दिलवाया। जहां आज लगभग 80 विद्यार्थी विभिन्न प्रदेशों से वेदों और उपनिषदों पर अनुसंधान कर रहे हैं तथा शास्त्री तक की कक्षाएं भी यहां पर चलाई जा रही हैं। आश्रम में एक
बहुत बड़ी गोशाला भी है। लगभग 300 गायें हैं।
आश्रम में गांव का दूध ही प्रयोग में लाया जाता है। रसोई में काम करने वाले और आश्रम के कर्मचारी को धोती पहनना जरूरी है। 2000 में महाराज ने विश्व के कल्याण के लिए महायज्ञ का आयोजन करवाया। इसमें देश के कोने-कोने से विद्वान पाठ करने के लिए आए। ऊना जिले के अमलैहड़ का आश्रम भी डेरा बाबा रुद्रानंद आश्रम के साथ जुड़ा हुआ है। महाराज ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में वसंत पंचमी वाले दिन 2015 को
बालक हीरालाल जो विद्यालय में ही शिक्षा ग्रहण करते हैं, उन्हें इलाकावासियों की उपस्थिति में अपना उत्तराधिकारी चुन लिया है।
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नारी (ऊना)। 5 नवंबर 1928 को ऊना जिला के गुगलैहड़ में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे बालक को उस समय क्या पता था कि वह सनातन परंपरा को बुलंदियों तक पहुंचाएगा।
बचपन का नाम कर्म चंद था। उस समय आश्रम डेरा बाबा रुद्रानंद में बाबा आत्मानंद महाराज डेरा के महंंत थे। उन्होंने आश्रम में एक संस्कृत पाठशाला चला रखी थी।
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उस समय संसाधन नाममात्र थे। कर्मचंद के माता-पिता ने भी 6 वर्ष की आयु में बालक को आश्रम में आत्मानंद महाराज के पास छोड़ दिया। जहां पर इन्होंने प्रारंभिक शिक्षा संस्कृत में हासिल की। बचपन से ही आत्मानंद ने देखा कि यह बालक भक्ति भाव में रमा रहता है। शुरू से ही उनकी नजर इस बालक पर थी।
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धीरे-धीरे बालक ने आश्रम में ही शिक्षा ग्रहण की तथा महाराज आत्मानंद को अपना गुरु धारण कर लिया। गुरु दीक्षा लेने के बाद गुरु के साथ बैठकर तपस्या करना और अन्य कर्मकांड सीख लिए। महाराज आत्मानंद ने 20 वर्ष तक इनकी कठोर परीक्षा ली। तब जाकर उन्हें गद्दी का उत्तराधिकारी बनने के योग्य समझा और 1952 में मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा तिथि को कर्म चंद को 26 वर्ष की आयु में गद्दी पर बिठाया और इनका नाम सुग्रीवानंद रखा। आत्मानंद के समाधि लीन होने के बाद बनारस में चारों वेद और उपनिषदों का अध्ययन किया। इसके अलावा कर्मकांड और सभी शास्त्रों के ज्ञान हासिल किया। सुग्रीवानंद ने संसाधन जुटाकर आश्रम में बहुत ही तरक्की की तथा लोगों को सद्मार्ग का रास्ता दिखाया। सनातन धर्म का प्रचार किया, मार्गदर्शन किया तथा अपने से पहले महंतों की ओर से चलाई गई परंपराओं को आगे बढ़ाया। 1850 से चल रहा धूना बाकायदा आज भी चल रहा है।
1864 में सदा व्रत लंगर को भी जारी रखा। आज भी 24 घटे लंगर आश्रम में लगा रहता है। तड़के 3:00 उठकर स्नान आदि के बाद धूने पर आकर तपस्या करना उनकी दिनचर्या थी। आश्रम में चल रही संस्कृत पाठशाला को विश्वविद्यालय का दर्जा दिलवाया। जहां आज लगभग 80 विद्यार्थी विभिन्न प्रदेशों से वेदों और उपनिषदों पर अनुसंधान कर रहे हैं तथा शास्त्री तक की कक्षाएं भी यहां पर चलाई जा रही हैं। आश्रम में एक
बहुत बड़ी गोशाला भी है। लगभग 300 गायें हैं।
आश्रम में गांव का दूध ही प्रयोग में लाया जाता है। रसोई में काम करने वाले और आश्रम के कर्मचारी को धोती पहनना जरूरी है। 2000 में महाराज ने विश्व के कल्याण के लिए महायज्ञ का आयोजन करवाया। इसमें देश के कोने-कोने से विद्वान पाठ करने के लिए आए। ऊना जिले के अमलैहड़ का आश्रम भी डेरा बाबा रुद्रानंद आश्रम के साथ जुड़ा हुआ है। महाराज ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में वसंत पंचमी वाले दिन 2015 को
बालक हीरालाल जो विद्यालय में ही शिक्षा ग्रहण करते हैं, उन्हें इलाकावासियों की उपस्थिति में अपना उत्तराधिकारी चुन लिया है।

डेरा बाबा रुद्रा नंद धाम नारी में स्वामी सुग्रीवानंद जी महाराज शरीर को त्यागने पर डेरा में जाम

डेरा बाबा रुद्रा नंद धाम नारी में स्वामी सुग्रीवानंद जी महाराज शरीर को त्यागने पर डेरा में जाम

डेरा बाबा रुद्रा नंद धाम नारी में स्वामी सुग्रीवानंद जी महाराज शरीर को त्यागने पर डेरा में जाम