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Una News: अदालत में सिपाही को धक्का देने पर अधिवक्ता को तीन माह की सजा
Thu, 01 Oct 2026 12:08 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
Updated Thu, 01 Oct 2026 12:08 AM IST
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दुलैहड़ (ऊना)। अदालत परिसर में ड्यूटी पर तैनात सिपाही को धक्का देने के करीब 21 साल पुराने मामले में दोषी अधिवक्ता को तीन माह की जेल की सजा भुगतनी होगी।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-1 ऊना राजिंद्र कुमार की अदालत ने मंगलवार को अधिवक्ता की आपराधिक अपील खारिज करते हुए मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ऊना की ओर से पांच अगस्त 2023 को सुनाई गई सजा बरकरार रखी।
अदालत ने दोषी को एक सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने के निर्देश दिए हैं। मामला 22 नवंबर 2005 का है। अभियोजन के अनुसार अधिवक्ता अपने मामले की तारीख बदलवाने और आदेश की प्रति लेने को लेकर पीठासीन न्यायिक अधिकारी से आग्रह कर रहे थे। अदालत में व्यवधान होने पर उन्हें बाहर जाने के लिए कहा गया।
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इसके बाद न्यायिक अधिकारी विश्राम कक्ष में चली गईं और पुलिस कर्मचारियों को बिना अनुमति किसी को अंदर न आने के निर्देश दिए।
कुछ देर बाद अधिवक्ता विश्राम कक्ष की ओर गए। वहां तैनात सिपाही करनजीत सिंह ने उन्हें रोकने का प्रयास किया तो उन्होंने सिपाही को धक्का देकर अंदर जाने की कोशिश की।
इस आधार पर सदर थाना ऊना में मामला दर्ज किया गया। सुनवाई के दौरान अभियोजन ने 13 गवाह पेश किए। ट्रायल कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 353 के तहत दोषी मानते हुए तीन माह के साधारण कारावास और एक हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
अपील में अधिवक्ता ने गवाहों के बयानों में विरोधाभास और स्वतंत्र गवाह के नहीं होने का तर्क दिया। बचाव पक्ष ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किए जाने की दलील भी दी। अतिरिक्त सत्र अदालत ने इन तर्कों को खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि सिपाही करनजीत सिंह की गवाही की पुष्टि अन्य पुलिस और न्यायालय कर्मचारियों के बयानों के साथ घटना के दौरान और उसके बाद दर्ज डेली डायरी की प्रविष्टियों से होती है।
सरकारी कर्मचारी होने मात्र से उनकी गवाही को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता। अदालत ने सजा में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए दोषी को एक सप्ताह में आत्मसमर्पण करने के आदेश दिए।
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अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-1 ऊना राजिंद्र कुमार की अदालत ने मंगलवार को अधिवक्ता की आपराधिक अपील खारिज करते हुए मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ऊना की ओर से पांच अगस्त 2023 को सुनाई गई सजा बरकरार रखी।
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अदालत ने दोषी को एक सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने के निर्देश दिए हैं। मामला 22 नवंबर 2005 का है। अभियोजन के अनुसार अधिवक्ता अपने मामले की तारीख बदलवाने और आदेश की प्रति लेने को लेकर पीठासीन न्यायिक अधिकारी से आग्रह कर रहे थे। अदालत में व्यवधान होने पर उन्हें बाहर जाने के लिए कहा गया।
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इसके बाद न्यायिक अधिकारी विश्राम कक्ष में चली गईं और पुलिस कर्मचारियों को बिना अनुमति किसी को अंदर न आने के निर्देश दिए।
कुछ देर बाद अधिवक्ता विश्राम कक्ष की ओर गए। वहां तैनात सिपाही करनजीत सिंह ने उन्हें रोकने का प्रयास किया तो उन्होंने सिपाही को धक्का देकर अंदर जाने की कोशिश की।
इस आधार पर सदर थाना ऊना में मामला दर्ज किया गया। सुनवाई के दौरान अभियोजन ने 13 गवाह पेश किए। ट्रायल कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 353 के तहत दोषी मानते हुए तीन माह के साधारण कारावास और एक हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
अपील में अधिवक्ता ने गवाहों के बयानों में विरोधाभास और स्वतंत्र गवाह के नहीं होने का तर्क दिया। बचाव पक्ष ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किए जाने की दलील भी दी। अतिरिक्त सत्र अदालत ने इन तर्कों को खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि सिपाही करनजीत सिंह की गवाही की पुष्टि अन्य पुलिस और न्यायालय कर्मचारियों के बयानों के साथ घटना के दौरान और उसके बाद दर्ज डेली डायरी की प्रविष्टियों से होती है।
सरकारी कर्मचारी होने मात्र से उनकी गवाही को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता। अदालत ने सजा में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए दोषी को एक सप्ताह में आत्मसमर्पण करने के आदेश दिए।