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प्रभु के प्रवचनों से मिलता दुखों से छुटकारा : कृष्ण
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ऊना। एकादश रुद्र महादेव मंदिर अजनोली में रविवार को श्रीराम कथा का समापन हो गया। अतुल कृष्ण महाराज ने प्रभु के अमृतवचनों से श्रद्धालुओं को निहाल किया। उन्होंने कहा कि भजन के बिना दुखों से छुटकारा नहीं मिलता।
उन्होंने कहा कि जो भगवान से विमुख होते हैं वे अपने शरीर एवं शरीर के संबंधियों को ही सब कुछ मान बैठते हैं। इसी सोच के कारण जीवन भर अशांत रहते हैं। ऐसे लोग अज्ञान को ज्ञान मानकर अभिमान करते हैं। इन क्षुद्र विचारों से जीव को कभी संतोष एवं तृप्ति नहीं मिल सकती। कल्पना में जीने वालों के मनोरथ रेत के महल की तरह खत्म हो जाते हैं। परमार्थ को न जानने वाले अंत में अपना सब किया-कराया यहीं छोड़कर वहां जाने के लिए विवश होते हैं। जहां के बारे में उन्हें कुछ भी पता नहीं। परिणामत: ऐसे प्राणी अनंत काल तक इस संसार समुद्र में भटकने के लिए विवश हो जाते हैं।
उन्होंने कहा कि जो ईश्वर का भजन करते हैं। उन्हें संसार में किसी भी वस्तु की कमी नहीं रह जाती। कलियुग में यद्यपि कई दोष हैं, पर प्रभु नाम का संकीर्तन एवं उनकी लोकपावनी कथा की महिमा मुक्ति के लिए चमत्कारी साधन के रूप में प्रसिद्ध हैं। भक्त को व्यर्थ के तर्क-वितर्क में न पड़ कर अनन्य भाव से परमात्मा की भक्ति करनी चाहिए। वे संत-महापुरुष इस धरती को स्वर्ग बना देते हैं जो अपनी साधना के प्रताप से लोक मंगल में सदैव तत्पर रहते हैं।
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अतुल कृष्ण ने कहा कि सुख एवं दुख देने वाला कोई दूसरा नहीं, अपितु अपना भ्रम ही इसका अनुभव कराता रहता है। हमारे मन ने ही शत्रु एवं मित्र बना लिए हैं। भगवान में मन लगाना ही सच्चा पुरुषार्थ है। अंतिम दिन श्रीराम का शबरी माता को नवधा भक्ति का उपदेश, बाली को परम गति, श्रीहनुमान के लंका दहन, समुद्र पर सेतु बंधन, रावण वध एवं भगवान के राज्याभिषेक का प्रसंग सभी ने अत्यंत तमंय होकर सुना।
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उन्होंने कहा कि जो भगवान से विमुख होते हैं वे अपने शरीर एवं शरीर के संबंधियों को ही सब कुछ मान बैठते हैं। इसी सोच के कारण जीवन भर अशांत रहते हैं। ऐसे लोग अज्ञान को ज्ञान मानकर अभिमान करते हैं। इन क्षुद्र विचारों से जीव को कभी संतोष एवं तृप्ति नहीं मिल सकती। कल्पना में जीने वालों के मनोरथ रेत के महल की तरह खत्म हो जाते हैं। परमार्थ को न जानने वाले अंत में अपना सब किया-कराया यहीं छोड़कर वहां जाने के लिए विवश होते हैं। जहां के बारे में उन्हें कुछ भी पता नहीं। परिणामत: ऐसे प्राणी अनंत काल तक इस संसार समुद्र में भटकने के लिए विवश हो जाते हैं।
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उन्होंने कहा कि जो ईश्वर का भजन करते हैं। उन्हें संसार में किसी भी वस्तु की कमी नहीं रह जाती। कलियुग में यद्यपि कई दोष हैं, पर प्रभु नाम का संकीर्तन एवं उनकी लोकपावनी कथा की महिमा मुक्ति के लिए चमत्कारी साधन के रूप में प्रसिद्ध हैं। भक्त को व्यर्थ के तर्क-वितर्क में न पड़ कर अनन्य भाव से परमात्मा की भक्ति करनी चाहिए। वे संत-महापुरुष इस धरती को स्वर्ग बना देते हैं जो अपनी साधना के प्रताप से लोक मंगल में सदैव तत्पर रहते हैं।
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अतुल कृष्ण ने कहा कि सुख एवं दुख देने वाला कोई दूसरा नहीं, अपितु अपना भ्रम ही इसका अनुभव कराता रहता है। हमारे मन ने ही शत्रु एवं मित्र बना लिए हैं। भगवान में मन लगाना ही सच्चा पुरुषार्थ है। अंतिम दिन श्रीराम का शबरी माता को नवधा भक्ति का उपदेश, बाली को परम गति, श्रीहनुमान के लंका दहन, समुद्र पर सेतु बंधन, रावण वध एवं भगवान के राज्याभिषेक का प्रसंग सभी ने अत्यंत तमंय होकर सुना।