अध्ययन में खुलासा: कुल्लू में 31 साल में 4.7 गुना बढ़ा निर्माण, आधे से भी कम रह गया हरित क्षेत्र
कुल्लू जिले में वर्ष 1991 से 2022 के बीच निर्मित क्षेत्र करीब पांच गुना हो गया, जबकि वनस्पति से ढका क्षेत्र आधे से भी कम रह गया। इसी अवधि में बर्फ से ढके क्षेत्र में भी भारी कमी दर्ज की गई।
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हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ते निर्माण और बदलते भूमि उपयोग का असर प्राकृतिक भू-दृश्य पर दिखाई देने लगा है। कुल्लू जिले में वर्ष 1991 से 2022 के बीच निर्मित क्षेत्र करीब पांच गुना हो गया, जबकि वनस्पति से ढका क्षेत्र आधे से भी कम रह गया। इसी अवधि में बर्फ से ढके क्षेत्र में भी भारी कमी दर्ज की गई। दिल्ली विश्वविद्यालय के दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के भूगोल विभाग से जुड़े शोधकर्ताओं के अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। शोधपत्र हाल ही में एक वैज्ञानिक पत्रिका एटमॉस्फियर में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन कुल्लू जिले पर केंद्रित है।
ये महत्वपूर्ण सवाल उठाते हैं अध्ययन के निष्कर्ष
हालांकि, इसके निष्कर्ष पर्वतीय क्षेत्रों में भूमि उपयोग में आ रहे बदलावों, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और विकास योजनाओं के नियोजन को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाते हैं। अध्ययन के अनुसार कुल्लू जिले में वर्ष 1991 में निर्मित क्षेत्र 239.81 वर्ग किलोमीटर था, जो कुल क्षेत्रफल का 4.37 फीसदी था। वर्ष 2022 तक यह बढ़कर 1119.28 वर्ग किलोमीटर यानी 20.40 फीसदी हो गया। इस तरह निर्मित क्षेत्र में करीब 4.7 गुना विस्तार दर्ज किया गया। इसके विपरीत वनस्पति से ढका क्षेत्र 1888.37 वर्ग किलोमीटर से घटकर 890.78 वर्ग किलोमीटर रह गया। कृषि भूमि का हिस्सा भी 20.83 फीसदी से घटकर 18.02 फीसदी हो गया। वहीं, बंजर भूमि 9.44 फीसदी से बढ़कर 16.47 फीसदी हो गई। अध्ययनकर्ताओं के विश्लेषण में वनस्पति और कृषि भूमि के कुछ हिस्सों का निर्मित तथा बंजर क्षेत्र में बदलना भी सामने आया है।
अध्ययन में हुआ ये खुलासा
अध्ययन के मुताबिक वर्ष 1991 में कुल्लू जिले का 15.20 फीसदी क्षेत्र बर्फ से ढका था। वर्ष 2022 में यह घटकर 3.02 फीसदी रह गया। शोधकर्ताओं ने भूमि उपयोग और भूमि आवरण में आए बदलावों का आकलन करने के लिए 1991, 2001, 2011 और 2022 की लैंडसैट उपग्रह तस्वीरों का विश्लेषण किया। इसमें मशीन लर्निंग तकनीक की मदद से कृषि भूमि, बंजर भूमि, निर्मित क्षेत्र, बर्फ, वनस्पति और जल निकायों की स्थिति का आकलन किया गया। अध्ययन में जलाशयों के तहत क्षेत्र में भी वृद्धि दिखाई गई है, लेकिन शोधकर्ताओं ने आगाह किया है कि पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ, पानी, छाया और मौसमी परिस्थितियों के कारण उपग्रह तस्वीरों के वर्गीकरण में अनिश्चितता हो सकती है।
इन्होंने किया अध्ययन
संजीव कुमार झा, निर्भव, हरीश कुमार सहित विभिन्न संस्थानों के वैज्ञानिकों ने उपग्रह आंकड़ों के आधार पर यह अध्ययन किया है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान के विशेषज्ञ तौशिफ जमान, डॉ. बीआर अंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली के प्रदीप कुमार झा आदि ने भी इसमें सहयोग किया।