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Solan News: कोट पंचायत में उप प्रधान पद के प्रत्याशी को मिला सिर्फ एक वोट
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संवाद न्यूज एजेंसी
सोलन। कंडाघाट उपमंडल की कोट पंचायत से एक ऐसा चुनावी नतीजा सामने आया है, जो हर चौक-चौराहे पर चर्चा का विषय बन गया है। यहां उप प्रधान पद के एक प्रत्याशी को मतगणना के बाद मात्र एक वोट नसीब हुआ। चुनावी नतीजे आने के बाद लोग पूछ रहे हैं कि भाई यह एक वोट उम्मीदवार ने खुद को डाला या किसी सच्चे दोस्त ने डाला है। कोट पंचायत में उप प्रधान की कुर्सी के लिए कुल चार प्रत्याशी मैदान में थे। इस सीट पर कुल 664 मतदाताओं ने अपने वोट डाले थे। जब मतपेटियां खुलीं तो आंकड़े कुछ इस तरह चमके इसमें हेमेंद्र 383 वोट लेकर विजेता रहे है, जबकि यशवीर 250 वोट, नित्यानंद शर्मा 30 वोट और विकास शर्मा को केवल एक वोट ही पड़ा। जानकारी के अनुसार आमतौर पर जब किसी को सिर्फ एक वोट मिलता है, तो लोग मजाक में कहते हैं कि उम्मीदवार को उसकी पत्नी या परिवार ने भी वोट नहीं दिया, लेकिन विकास शर्मा के मामले में ऐसा बिल्कुल नहीं है। दरअसल, यह एक सोची-समझी रणनीति थी। नामांकन दाखिल करने और चुनाव चिह्न मिलने के बाद विकास शर्मा का मन बदल गया। उन्होंने चुनाव लड़ने के बजाय दूसरे मजबूत उम्मीदवार को अंदरूनी तौर पर समर्थन देने का मन बना लिया। ग्रामीण राजनीति के जानकारों का कहना है कि जब नामांकन वापसी का समय निकल जाता है, तो प्रत्याशी बैलेट पेपर से नाम नहीं हटा सकते। ऐसे में विकास शर्मा ने अपने समर्थकों से अपील की कि वे अपना वोट उन्हें देकर खराब न करें, बल्कि उस उम्मीदवार को दें जिसे वे जिताना चाहते हैं।
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सोलन। कंडाघाट उपमंडल की कोट पंचायत से एक ऐसा चुनावी नतीजा सामने आया है, जो हर चौक-चौराहे पर चर्चा का विषय बन गया है। यहां उप प्रधान पद के एक प्रत्याशी को मतगणना के बाद मात्र एक वोट नसीब हुआ। चुनावी नतीजे आने के बाद लोग पूछ रहे हैं कि भाई यह एक वोट उम्मीदवार ने खुद को डाला या किसी सच्चे दोस्त ने डाला है। कोट पंचायत में उप प्रधान की कुर्सी के लिए कुल चार प्रत्याशी मैदान में थे। इस सीट पर कुल 664 मतदाताओं ने अपने वोट डाले थे। जब मतपेटियां खुलीं तो आंकड़े कुछ इस तरह चमके इसमें हेमेंद्र 383 वोट लेकर विजेता रहे है, जबकि यशवीर 250 वोट, नित्यानंद शर्मा 30 वोट और विकास शर्मा को केवल एक वोट ही पड़ा। जानकारी के अनुसार आमतौर पर जब किसी को सिर्फ एक वोट मिलता है, तो लोग मजाक में कहते हैं कि उम्मीदवार को उसकी पत्नी या परिवार ने भी वोट नहीं दिया, लेकिन विकास शर्मा के मामले में ऐसा बिल्कुल नहीं है। दरअसल, यह एक सोची-समझी रणनीति थी। नामांकन दाखिल करने और चुनाव चिह्न मिलने के बाद विकास शर्मा का मन बदल गया। उन्होंने चुनाव लड़ने के बजाय दूसरे मजबूत उम्मीदवार को अंदरूनी तौर पर समर्थन देने का मन बना लिया। ग्रामीण राजनीति के जानकारों का कहना है कि जब नामांकन वापसी का समय निकल जाता है, तो प्रत्याशी बैलेट पेपर से नाम नहीं हटा सकते। ऐसे में विकास शर्मा ने अपने समर्थकों से अपील की कि वे अपना वोट उन्हें देकर खराब न करें, बल्कि उस उम्मीदवार को दें जिसे वे जिताना चाहते हैं।