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हिमाचल: सोलन में वैज्ञानिकों की बड़ी कामयाबी! अब 25 से 30 डिग्री तापमान में भी उगेगा शटाके मशरूम, जानें
Tue, 22 Sep 2026 10:45 AM IST
Ankesh Dogra
ललित कश्यप, सोलन।
ललित कश्यप, सोलन।
Published by: Ankesh Dogra
Updated Tue, 22 Sep 2026 10:45 AM IST
सार
सोलन के आईसीएआर-मशरूम अनुसंधान निदेशालय ने शटाके मशरूम की नई किस्म डीएमआरओ-18 विकसित की है। इस किस्म की खासियत यह बताई गई है कि इसे 25 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी उगाया जा सकेगा। पहले शटाके मशरूम की खेती के लिए करीब 18 से 20 डिग्री तापमान की जरूरत होती थी। करीब 60 दिन में फसल देने वाली नई किस्म आकार, मोटाई और चॉकलेट रंग के कारण बाजार में बेहतर मूल्य की संभावना रखती है।
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शटाके मशरूम।
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
विस्तार
मशरूम उत्पादन के क्षेत्र में हिमाचल के सोलन से किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। आईसीएआर-मशरूम अनुसंधान निदेशालय (डीएमआर) सोलन के वैज्ञानिकों ने शटाके मशरूम की नई किस्म डीएमआरओ-18 विकसित की है। इसकी खासियत यह है कि अब शटाके मशरूम की खेती केवल ठंडे क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहेगी। नई किस्म को 25 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी तैयार किया जा सकेगा। इससे मैदानी और अपेक्षाकृत गर्म इलाकों में भी शटाके मशरूम की खेती की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
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करीब 60 दिन में तैयार होगी फसल
वैज्ञानिकों के अनुसार डीएमआरओ-18 करीब 60 दिन में फसल देने वाली किस्म है। इसके सफल परीक्षण के बाद इसे गर्म तापमान वाले क्षेत्रों में शटाके मशरूम उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे पहले शटाके मशरूम की खेती के लिए लगभग 18 से 20 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती थी। तापमान की इस सीमा के कारण इसकी खेती मुख्य रूप से ठंडे क्षेत्रों तक सीमित रहती थी। नई किस्म के 25 से 30 डिग्री तापमान में तैयार होने की क्षमता से देश के मैदानी और गर्म इलाकों के किसानों के लिए भी इसकी खेती का रास्ता खुल सकता है।
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आकार में बड़ी और चॉकलेट रंग की होगी डीएमआरओ-18
नई किस्म की एक और खासियत इसका आकर्षक स्वरूप बताया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार पहले उपलब्ध शटाके की किस्म का आकार अपेक्षाकृत छोटा, रंग हल्का गुलाबी और बाजार मूल्य कम था। इसके मुकाबले डीएमआरओ-18 का आकार बड़ा और मशरूम मोटा होगा। इसका रंग आकर्षक चॉकलेट बताया गया है। ऐसे में बाजार में इसके बेहतर दाम मिलने की संभावना जताई जा रही है, जिससे किसानों की आय के लिहाज से भी यह किस्म महत्वपूर्ण हो सकती है।
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औषधीय गुणों के कारण भी खास
शटाके मशरूम को उसके पोषण और औषधीय गुणों के लिए भी जाना जाता है। डीएमआर के वैज्ञानिक डॉ. परमेश के अनुसार डीएमआरओ-18 शटाके मशरूम स्वास्थ्य की दृष्टि से भी उपयोगी हो सकती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार शटाके मशरूम में ऐसे गुण पाए जाते हैं जो बैड कोलेस्ट्रॉल कम करने और उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं। हालांकि किसी बीमारी के इलाज या दवा के विकल्प के तौर पर इसका इस्तेमाल चिकित्सकीय सलाह के बिना नहीं किया जाना चाहिए।
वैज्ञानिकों ने करीब 60 दिन में फसल देने वाली इस नई किस्म का सफल परीक्षण किया है। गर्म इलाकों में उत्पादन की संभावना बढ़ने के साथ अब इस किस्म को किसानों तक पहुंचाने और व्यावसायिक उत्पादन की दिशा में आगे काम की उम्मीद है।
गर्म इलाकों के किसानों के लिए खुल सकता है नया रास्ता
डीएमआरओ-18 के विकास से शटाके मशरूम की खेती के भौगोलिक दायरे को बढ़ाने की संभावना है। यदि किसान 25 से 30 डिग्री तापमान में भी इसका सफल उत्पादन कर पाते हैं तो मैदानी राज्यों में भी इसकी खेती को बढ़ावा मिल सकता है। सोलन स्थित मशरूम अनुसंधान निदेशालय की यह पहल मशरूम उत्पादन में नई संभावनाओं का रास्ता खोल सकती है। खासकर ऐसे किसान जो पारंपरिक फसलों के साथ उच्च मूल्य वाली मशरूम खेती की ओर बढ़ना चाहते हैं, उनके लिए यह नई किस्म आकर्षण का केंद्र बन सकती है।
शटाके मशरूम को उसके पोषण और औषधीय गुणों के लिए भी जाना जाता है। डीएमआर के वैज्ञानिक डॉ. परमेश के अनुसार डीएमआरओ-18 शटाके मशरूम स्वास्थ्य की दृष्टि से भी उपयोगी हो सकती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार शटाके मशरूम में ऐसे गुण पाए जाते हैं जो बैड कोलेस्ट्रॉल कम करने और उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं। हालांकि किसी बीमारी के इलाज या दवा के विकल्प के तौर पर इसका इस्तेमाल चिकित्सकीय सलाह के बिना नहीं किया जाना चाहिए।
वैज्ञानिकों ने करीब 60 दिन में फसल देने वाली इस नई किस्म का सफल परीक्षण किया है। गर्म इलाकों में उत्पादन की संभावना बढ़ने के साथ अब इस किस्म को किसानों तक पहुंचाने और व्यावसायिक उत्पादन की दिशा में आगे काम की उम्मीद है।
गर्म इलाकों के किसानों के लिए खुल सकता है नया रास्ता
डीएमआरओ-18 के विकास से शटाके मशरूम की खेती के भौगोलिक दायरे को बढ़ाने की संभावना है। यदि किसान 25 से 30 डिग्री तापमान में भी इसका सफल उत्पादन कर पाते हैं तो मैदानी राज्यों में भी इसकी खेती को बढ़ावा मिल सकता है। सोलन स्थित मशरूम अनुसंधान निदेशालय की यह पहल मशरूम उत्पादन में नई संभावनाओं का रास्ता खोल सकती है। खासकर ऐसे किसान जो पारंपरिक फसलों के साथ उच्च मूल्य वाली मशरूम खेती की ओर बढ़ना चाहते हैं, उनके लिए यह नई किस्म आकर्षण का केंद्र बन सकती है।