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वन्य प्राणियों की डीएनए जांच के लिए आधुनिक प्रयोगशाला लगाई
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संवाद न्यूज एजेंसी
सोलन। भारतीय वन्य प्राणी सर्वेक्षण कार्यालय सोलन में वन्य प्राणियों की डीएनए जांच भी संभव हो सकेगी। इसके लिए विभाग ने सोलन कार्यालय में आधुनिक सुविधाओं से लैस आणविक पद्धतिबद्ध प्रयोगशाला को स्थापित कर दिया है।
प्रयोगशाला का शुभारंभ बुधवार भारतीय वन्य प्राणी सर्वेक्षण विभाग कोलकाता की निदेशक डॉ. धृति बनर्जी ने किया। देश में ऐसी नौवीं लैब लगाई गई है। वर्तमान में प्रदेश में ऐसी कोई भी प्रयोगशाला नहीं है जहां जंगली जानवरों के डीएनए का पता लगाया जा सके।
सोलन में भारतीय वन्य प्राणी सर्वेक्षण विभाग का क्षेत्रीय कार्यालय है। यहां पर करीब 40 लाख से आणविक पद्धतिबद्ध प्रयोगशाला यानी मॉलिक्यूल सिस्टम लैब स्थापित की गई है।
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इस दौरान निदेशक डॉ. धृति बनर्जी ने कहा कि प्रयोगशाला से वन्य प्राणियों की पहचान करने में आसानी होगी जिनकी पहचान नहीं की जा सकती है। उन्होंने बताया कि प्रदेश के दुर्गम क्षेत्रों में कई ऐसे वन्य प्राणी जिनकी सही पहचान करना मुश्किल है।
कई बार दुर्गम सहित दूसरे क्षेत्रों में मृत जानवर मिलते हैं। कुछ ही अवशेष शेष रहने पर इनकी पहचान नहीं हो पाती। अब डीएनए जांच से इनकी पहचान हो सकेगी। यह प्रयोगशाला भारतीय वन्य प्राणी सर्वेक्षण विभाग ने स्थापित की है।
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सोलन। भारतीय वन्य प्राणी सर्वेक्षण कार्यालय सोलन में वन्य प्राणियों की डीएनए जांच भी संभव हो सकेगी। इसके लिए विभाग ने सोलन कार्यालय में आधुनिक सुविधाओं से लैस आणविक पद्धतिबद्ध प्रयोगशाला को स्थापित कर दिया है।
प्रयोगशाला का शुभारंभ बुधवार भारतीय वन्य प्राणी सर्वेक्षण विभाग कोलकाता की निदेशक डॉ. धृति बनर्जी ने किया। देश में ऐसी नौवीं लैब लगाई गई है। वर्तमान में प्रदेश में ऐसी कोई भी प्रयोगशाला नहीं है जहां जंगली जानवरों के डीएनए का पता लगाया जा सके।
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सोलन में भारतीय वन्य प्राणी सर्वेक्षण विभाग का क्षेत्रीय कार्यालय है। यहां पर करीब 40 लाख से आणविक पद्धतिबद्ध प्रयोगशाला यानी मॉलिक्यूल सिस्टम लैब स्थापित की गई है।
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इस दौरान निदेशक डॉ. धृति बनर्जी ने कहा कि प्रयोगशाला से वन्य प्राणियों की पहचान करने में आसानी होगी जिनकी पहचान नहीं की जा सकती है। उन्होंने बताया कि प्रदेश के दुर्गम क्षेत्रों में कई ऐसे वन्य प्राणी जिनकी सही पहचान करना मुश्किल है।
कई बार दुर्गम सहित दूसरे क्षेत्रों में मृत जानवर मिलते हैं। कुछ ही अवशेष शेष रहने पर इनकी पहचान नहीं हो पाती। अब डीएनए जांच से इनकी पहचान हो सकेगी। यह प्रयोगशाला भारतीय वन्य प्राणी सर्वेक्षण विभाग ने स्थापित की है।