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Solan News: छठ पर्व के लिए बीबीएन तैयार, सूर्य की उपासना करेंगी महिलाएं
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भारत के साथ अन्य देशों में भी मनाया जाता है यह पर्व
अब हिमाचल में रहने वाले लोग मनाते हैं पर्व
संवाद न्यूज एजेंसी
बद्दी(सोलन)। छठ पर्व को डाला छठ, सूर्य उपासना व्रत, षष्ठी व्रत और सूर्य व्रत के नाम से जाना जाता है। पूरे देश में शारदीय नवरात्र से शुरू होकर छठ पूजन की समाप्ति तक लगभग एक माह तक त्योहार और पर्व का माहौल रहता है। यह समय सभी के लिए अत्यंत खुशी लेकर आता है। इस वर्ष शनिवार से यह पर्व शुरू हो रहा है।
यह छठ पर्व उत्तर भारत से लेकर मध्य भारत तक और मॉरीशस सहित तमाम अन्य देशों में भी मनाया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय पर्व भी है। यह ऐसा पर्व है, जो नहाए खाय से शुरू होकर खरना, डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर पुनः एक बार उगते सूर्य को अर्घ्य देकर समाप्त होने वाला अत्यंत ही कठिन निर्जला व्रत है। यह एकमात्र ऐसा पर्व है जिसमें डूबते सूरज को जल दिया जाता है। दूसरे दिन ही उगते सूरज भगवान को अर्घ्य देकर इस महापर्व की समाप्ति की जाती है।
इनसेट
छठ क्यों मनाते हैं
कार्तिक शुक्ल पक्ष के चतुर्थी को नहाए- खाय, पंचमी को खरना, षष्ठी को निर्जला व्रत के साथ संध्या अर्घ्य और सप्तमी को उषा काल में सूर्य देवता को अर्घ्य देकर समाप्त कर प्रसाद से पारण किया जाता है। हिंदू मान्यता में सूर्य को यश, समृद्धि, प्रसिद्धि का देवता माना गया हैं इसलिए सर्वउद्देश्य, कार्य सिद्धि, पुत्र के तेजस्वी और दीर्घायु और अन्य शुभ फल प्राप्ति के उद्देश्य से यह व्रत किया जाता है। सूर्य की उपासना करके ही माताएं सूर्य के समान तेज और यशस्वी पुत्र की कामना भी करती है, इसलिए इस पर्व को सर्वश्रेष्ठ पर्व और सर्वसिद्धि कामना वाला व्रत कहते हैं। पुत्र कामना पर बल इसलिए दिया जाता है कि हिंदू मान्यता के अनुसार पुत्र ही आगे चलकर परिवार की सभी जिम्मेदारी को गृह मुखिया के रूप निभाता है।
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इनसेट
महिलाओं के साथ पुरुष व बच्चे भी रखते हैं व्रत
महिलाओं के साथ पुरुष व बच्चे भी इस व्रत को रखते हैं। इस पूजा में सूर्य उपासना के साथ छठी मैया का भी आह्वान किया जाता है। यह पर्व भारत का सबसे पुराना त्योहार है, जो वैदिक काल से चला आ रहा है। इस पर्व का उल्लेख तो महाभारत में भी मिलता है। अंग नरेश कर्ण सूर्यपुत्र थे और सूर्य भक्त भी थे, प्रतिदिन सूर्य भगवान की उपासना करते हुए कमर तक जल में खड़े होकर अर्घ्य देकर पूजा को संपन्न करते थे। द्रोपदी ने भी पांडव के साथ इस पर्व पर सूरज भगवान की आराधना की थी। हिंदी पंचांग की मान्यता के अनुसार कार्तिक अमावस्या को दीपावली मनाते हैं, तो ठीक दिवाली के 6 दिन बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी को छठ मनाया जाता है।
इनसेट
कैसे मनाते हैं छठ पर्व
छठ पर्व की तैयारियां कई दिन पहले शुरू हो जाती है। इसमें सभी नया कपड़ा खरीदते हैं। साथ ही विभिन्न प्रकार के फल की खरीदारी, घर में मीठी पूड़ी जिसे स्थानीय भाषा में ठेकुआ भी कहते हैं को प्रमुख रूप से सम्मिलित किया जाता है। ठेकुआ को गेहूं के आटे के साथ चीनी या गुड़ का प्रयोग करके बनाते हैं। पर्व में सब कुछ नया होता है। पूजन में सूप का बहुत ही महत्व है।
बीबीएन में सजे बाजार
बीबीएन में दो लाख पूर्वांचल के लोग रहते हैं। कुछ लोग घर चले गए हैं और जो यहां पर रहे हैं, वे बीबीएन में ही पर्व मनाएंगे। छठ पर्व के लिए बद्दी में बाजार सज गए हैं। इस व्रत में उपयोग होने से वाले सामान सभी बाजार में उपलब्ध हैं। उपवास के लिए प्रयोग होने वाला सभी सामान बाजार में मिल रहा है। इसमें सबसे जरूरी सूप, टोकरी, सीजन के फल, कच्चा अदरक व हल्दी, गन्ना यह सभी आसानी से मिलने वाला सामानों की दुकानें सज गई हैं। छठ पूजा वेलफेयर सोसायटी के उपाध्यक्ष पिंटू सिंह ने बताया कि यह सभी सामान आम प्रयोग में होने वाला सामान है। सूप व टोकरी की कीमतें हर साल बढ़ जाती हैं।
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अब हिमाचल में रहने वाले लोग मनाते हैं पर्व
संवाद न्यूज एजेंसी
बद्दी(सोलन)। छठ पर्व को डाला छठ, सूर्य उपासना व्रत, षष्ठी व्रत और सूर्य व्रत के नाम से जाना जाता है। पूरे देश में शारदीय नवरात्र से शुरू होकर छठ पूजन की समाप्ति तक लगभग एक माह तक त्योहार और पर्व का माहौल रहता है। यह समय सभी के लिए अत्यंत खुशी लेकर आता है। इस वर्ष शनिवार से यह पर्व शुरू हो रहा है।
यह छठ पर्व उत्तर भारत से लेकर मध्य भारत तक और मॉरीशस सहित तमाम अन्य देशों में भी मनाया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय पर्व भी है। यह ऐसा पर्व है, जो नहाए खाय से शुरू होकर खरना, डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर पुनः एक बार उगते सूर्य को अर्घ्य देकर समाप्त होने वाला अत्यंत ही कठिन निर्जला व्रत है। यह एकमात्र ऐसा पर्व है जिसमें डूबते सूरज को जल दिया जाता है। दूसरे दिन ही उगते सूरज भगवान को अर्घ्य देकर इस महापर्व की समाप्ति की जाती है।
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छठ क्यों मनाते हैं
कार्तिक शुक्ल पक्ष के चतुर्थी को नहाए- खाय, पंचमी को खरना, षष्ठी को निर्जला व्रत के साथ संध्या अर्घ्य और सप्तमी को उषा काल में सूर्य देवता को अर्घ्य देकर समाप्त कर प्रसाद से पारण किया जाता है। हिंदू मान्यता में सूर्य को यश, समृद्धि, प्रसिद्धि का देवता माना गया हैं इसलिए सर्वउद्देश्य, कार्य सिद्धि, पुत्र के तेजस्वी और दीर्घायु और अन्य शुभ फल प्राप्ति के उद्देश्य से यह व्रत किया जाता है। सूर्य की उपासना करके ही माताएं सूर्य के समान तेज और यशस्वी पुत्र की कामना भी करती है, इसलिए इस पर्व को सर्वश्रेष्ठ पर्व और सर्वसिद्धि कामना वाला व्रत कहते हैं। पुत्र कामना पर बल इसलिए दिया जाता है कि हिंदू मान्यता के अनुसार पुत्र ही आगे चलकर परिवार की सभी जिम्मेदारी को गृह मुखिया के रूप निभाता है।
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महिलाओं के साथ पुरुष व बच्चे भी रखते हैं व्रत
महिलाओं के साथ पुरुष व बच्चे भी इस व्रत को रखते हैं। इस पूजा में सूर्य उपासना के साथ छठी मैया का भी आह्वान किया जाता है। यह पर्व भारत का सबसे पुराना त्योहार है, जो वैदिक काल से चला आ रहा है। इस पर्व का उल्लेख तो महाभारत में भी मिलता है। अंग नरेश कर्ण सूर्यपुत्र थे और सूर्य भक्त भी थे, प्रतिदिन सूर्य भगवान की उपासना करते हुए कमर तक जल में खड़े होकर अर्घ्य देकर पूजा को संपन्न करते थे। द्रोपदी ने भी पांडव के साथ इस पर्व पर सूरज भगवान की आराधना की थी। हिंदी पंचांग की मान्यता के अनुसार कार्तिक अमावस्या को दीपावली मनाते हैं, तो ठीक दिवाली के 6 दिन बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी को छठ मनाया जाता है।
इनसेट
कैसे मनाते हैं छठ पर्व
छठ पर्व की तैयारियां कई दिन पहले शुरू हो जाती है। इसमें सभी नया कपड़ा खरीदते हैं। साथ ही विभिन्न प्रकार के फल की खरीदारी, घर में मीठी पूड़ी जिसे स्थानीय भाषा में ठेकुआ भी कहते हैं को प्रमुख रूप से सम्मिलित किया जाता है। ठेकुआ को गेहूं के आटे के साथ चीनी या गुड़ का प्रयोग करके बनाते हैं। पर्व में सब कुछ नया होता है। पूजन में सूप का बहुत ही महत्व है।
बीबीएन में सजे बाजार
बीबीएन में दो लाख पूर्वांचल के लोग रहते हैं। कुछ लोग घर चले गए हैं और जो यहां पर रहे हैं, वे बीबीएन में ही पर्व मनाएंगे। छठ पर्व के लिए बद्दी में बाजार सज गए हैं। इस व्रत में उपयोग होने से वाले सामान सभी बाजार में उपलब्ध हैं। उपवास के लिए प्रयोग होने वाला सभी सामान बाजार में मिल रहा है। इसमें सबसे जरूरी सूप, टोकरी, सीजन के फल, कच्चा अदरक व हल्दी, गन्ना यह सभी आसानी से मिलने वाला सामानों की दुकानें सज गई हैं। छठ पूजा वेलफेयर सोसायटी के उपाध्यक्ष पिंटू सिंह ने बताया कि यह सभी सामान आम प्रयोग में होने वाला सामान है। सूप व टोकरी की कीमतें हर साल बढ़ जाती हैं।