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बाड़ीधार ने ओढ़ी सफेद चादर, 15 सेंटीमीटर तक गिरी बर्फ
Updated Tue, 13 Feb 2018 10:57 PM IST
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अरकी की बाड़ीधार में हुए हिमपात का दृश्य।
- फोटो : अमर उजाला
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दाड़लाघाट (सोलन)। धार्मिक एवं पर्यटन स्थल बाड़ीधार में जमकर बर्फबारी हुई। शिमला के बराबर ऊंचाई होने की वजह से देर रात से ही बाड़ीधार में बर्फबारी का दौर शुरू हो गया था। यहां देवदार, बान और चील के जंगल हैं। बर्फबारी के बाद ढके यह वादियां काफी खूबसूरत हो गई हैं। यहां करीब 15 सेंटीमीटर तक बर्फबारी हो चुकी है। यहां लोग सेब की फसल भी उगा रहे हैं। ताजा बर्फबारी सेब का साइज बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगी।
बाड़ीधार को पांडवों से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि पांडवों ने इस जगह पर युद्ध में अपने परिजनों की हत्या के दोष निवारण के लिए भगवान शिव की तपस्या की थी। लोग बाड़ादेव को अपनी फसलों का रक्षक और इष्ट मानते हैं। इस जगह को लेकर लोगों में कई जन श्रुतियां भी विख्यात हैं। कपिल ठाकुर ने कहा कि शिवरात्रि के मौके पर बाड़ीधार पर बर्फ की चादर बिछ जाती है। यहां शिव की स्थली है जहां पांडव अज्ञातवास के दौरान रुके थे। अपने ही कुल को नष्ट करने के दोष निवारण के लिए पांडवों ने यहां भगवान शिव की तपस्या की थी। बर्फबारी का लुत्फ उठाने के लिए स्थानीय लोगों के अलावा बाहरी राज्यों से भी पर्यटक यहां पहुंचते हैं। बारिश और बर्फबारी से इस जगह के कई परंपरागत जलस्रोत जल से भर गए हैं। पर्यटन की दृष्टि से भी इस धार्मिक स्थल को विकसित किया जा रहा है। सूखे की स्थिति के बाद बारिश और बर्फबारी से किसानों तथा बागवानों को भारी राहत मिली है। इस क्षेत्र में परंपरागत फसलों गेहूं, सरसों, पलम, नाशपाती, खुमानी और अखरोट के अलावा अब सेब की विभिन्न प्रजातियों का उत्पादन होने लगा है। ताजा बर्फबारी सेब के लिए फायदेमंद माना जा रही है।
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बाड़ीधार को पांडवों से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि पांडवों ने इस जगह पर युद्ध में अपने परिजनों की हत्या के दोष निवारण के लिए भगवान शिव की तपस्या की थी। लोग बाड़ादेव को अपनी फसलों का रक्षक और इष्ट मानते हैं। इस जगह को लेकर लोगों में कई जन श्रुतियां भी विख्यात हैं। कपिल ठाकुर ने कहा कि शिवरात्रि के मौके पर बाड़ीधार पर बर्फ की चादर बिछ जाती है। यहां शिव की स्थली है जहां पांडव अज्ञातवास के दौरान रुके थे। अपने ही कुल को नष्ट करने के दोष निवारण के लिए पांडवों ने यहां भगवान शिव की तपस्या की थी। बर्फबारी का लुत्फ उठाने के लिए स्थानीय लोगों के अलावा बाहरी राज्यों से भी पर्यटक यहां पहुंचते हैं। बारिश और बर्फबारी से इस जगह के कई परंपरागत जलस्रोत जल से भर गए हैं। पर्यटन की दृष्टि से भी इस धार्मिक स्थल को विकसित किया जा रहा है। सूखे की स्थिति के बाद बारिश और बर्फबारी से किसानों तथा बागवानों को भारी राहत मिली है। इस क्षेत्र में परंपरागत फसलों गेहूं, सरसों, पलम, नाशपाती, खुमानी और अखरोट के अलावा अब सेब की विभिन्न प्रजातियों का उत्पादन होने लगा है। ताजा बर्फबारी सेब के लिए फायदेमंद माना जा रही है।
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