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Sirmour News: दिल्ली गेट के घंटे कागजों में भी खामोश
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नाहन के दिल्लीगेट लिटन मेमोरियल पर साल 1902 घंटाघर निर्माण कर स्थापित की गई चार घडिय़ां।
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नगर परिषद ने 22 महीने पहले सदन में रखा था प्रस्ताव, निरीक्षण के बाद भी मरम्मत और संचालन की प्रक्रिया नहीं बढ़ी
1902 में लंदन से मंगवाए थे तीन घंटे, 1970 के दशक तक पूरे शहर में सुनाई देती थी मधुर ध्वनि
घंटों की आवाज से लोगों को मिलती थी समय की जानकारी, चार घड़ियों से किया जाता था मिलान
प्रत्येक 15-15 मिनट बाद अलग-अलग बजती थी ध्वनियां, दूर तक जाती थी आवाज
पंकज तन्हा
नाहन (सिरमौर)। सिरमौर की ऐतिहासिक धरोहर लिटन मेमोरियल यानी दिल्ली गेट पर चार दशक से अधिक समय से खामोश पड़े ऐतिहासिक घंटों को दोबारा बजाने की योजना 22 महीने बाद भी धरातल पर नहीं उतर पाई है। अक्तूबर 2023 में नगर परिषद ने घंटों को शुरू करने के लिए हाउस में प्रस्ताव रखा था। इसके बाद अधिकारियों ने दिल्ली गेट का निरीक्षण भी किया, लेकिन घंटों की मरम्मत और उन्हें दोबारा शुरू करने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। ऐसे में शहरवासियों को अब भी उस दौर का इंतजार है, जब दिल्ली गेट से घंटों की मधुर ध्वनि पूरे शहर में गूंजा करती थी।
नगर परिषद के तत्कालीन कार्यकारी अधिकारी के निर्देश पर सेनेटरी अधिकारी सुलेमान ने दिल्ली गेट का निरीक्षण किया था। इस दौरान पीतल से बने ऐतिहासिक घंटों को दोबारा शुरू करने की संभावनाएं देखी गई थीं। अधिकारियों ने इन्हें ठीक करवाकर फिर से शुरू करने की बात कही थी। उम्मीद थी कि दिल्ली गेट के सबसे ऊपरी हिस्से में लगे तीन घंटे जल्द बजने लगेंगे। इन घंटों की ध्वनि से लोगों को समय की जानकारी मिलती थी और इसका मिलान दिल्ली गेट पर लगी चार घड़ियों से किया जाता था। हालांकि करीब 22 महीने बीतने के बाद भी यह योजना सिरे नहीं चढ़ पाई है।
शहरवासियों का कहना है कि ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित करने के साथ उनसे जुड़ी पुरानी परंपराओं को भी जीवित किया जाना चाहिए। घंटों के दोबारा शुरू होने से न केवल नाहन की पुरानी पहचान लौटेगी, बल्कि नई पीढ़ी भी शहर के इतिहास और विरासत से रूबरू हो सकेगी।
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1902 में लंदन से मंगवाए थे तीन घंटे
दिल्ली गेट के सबसे ऊपरी हिस्से पर वर्ष 1902 में तीन घंटे लंदन से विशेष रूप से मंगवाकर स्थापित किए गए थे। 1970 के दशक तक इन घंटों की मधुर ध्वनि शहर में सुनाई देती थी। इसके बाद ये खामोश हो गए। कई दशक बीतने के बावजूद इन्हें दोबारा शुरू करने की पहल नहीं हो सकी। आज की युवा पीढ़ी भी दिल्ली गेट से कभी गूंजने वाली इन घंटों की आवाज से अनजान है।
लॉर्ड लिटन के नाहन आगमन पर बनाया था स्मारक
लिटन मेमोरियल का निर्माण महाराजा शमशेर प्रकाश ने वर्ष 1877 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिटन के नाहन आगमन की स्मृति में करवाया था। उस समय जनता को प्रतिदिन दोपहर 12 बजे समय की जानकारी देने के लिए तोप चलाने की परंपरा थी। यह तोप आज भी दिल्ली गेट के नीचे रखी है। महाराजा सुरेंद्र प्रकाश ने वर्ष 1902 में यहां घंटाघर का निर्माण करवाकर चार घड़ियां स्थापित करवाई थीं। घंटाघर में चार घड़ियां और इनके लिए तीन घंटे लगाए गए थे। घंटों की ध्वनि दूर-दूर तक सुनाई देती थी और यह नाहन की पहचान का हिस्सा हुआ करती थी।
नगर परिषद ने तेज किए प्रयास
नई नगर परिषद ने करीब एक महीने पहले कार्यभार संभाला है। नगर परिषद ने ऐतिहासिक घंटों को शुरू करने के प्रयास तेज कर दिए हैं। तकनीकी दिक्कत नहीं आई तो जल्द शहरवासियों को घंटों की मधुर ध्वनि सुनाई देगी।
-उपमा धीमान, अध्यक्ष, नगर परिषद नाहन
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1902 में लंदन से मंगवाए थे तीन घंटे, 1970 के दशक तक पूरे शहर में सुनाई देती थी मधुर ध्वनि
घंटों की आवाज से लोगों को मिलती थी समय की जानकारी, चार घड़ियों से किया जाता था मिलान
प्रत्येक 15-15 मिनट बाद अलग-अलग बजती थी ध्वनियां, दूर तक जाती थी आवाज
पंकज तन्हा
नाहन (सिरमौर)। सिरमौर की ऐतिहासिक धरोहर लिटन मेमोरियल यानी दिल्ली गेट पर चार दशक से अधिक समय से खामोश पड़े ऐतिहासिक घंटों को दोबारा बजाने की योजना 22 महीने बाद भी धरातल पर नहीं उतर पाई है। अक्तूबर 2023 में नगर परिषद ने घंटों को शुरू करने के लिए हाउस में प्रस्ताव रखा था। इसके बाद अधिकारियों ने दिल्ली गेट का निरीक्षण भी किया, लेकिन घंटों की मरम्मत और उन्हें दोबारा शुरू करने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। ऐसे में शहरवासियों को अब भी उस दौर का इंतजार है, जब दिल्ली गेट से घंटों की मधुर ध्वनि पूरे शहर में गूंजा करती थी।
नगर परिषद के तत्कालीन कार्यकारी अधिकारी के निर्देश पर सेनेटरी अधिकारी सुलेमान ने दिल्ली गेट का निरीक्षण किया था। इस दौरान पीतल से बने ऐतिहासिक घंटों को दोबारा शुरू करने की संभावनाएं देखी गई थीं। अधिकारियों ने इन्हें ठीक करवाकर फिर से शुरू करने की बात कही थी। उम्मीद थी कि दिल्ली गेट के सबसे ऊपरी हिस्से में लगे तीन घंटे जल्द बजने लगेंगे। इन घंटों की ध्वनि से लोगों को समय की जानकारी मिलती थी और इसका मिलान दिल्ली गेट पर लगी चार घड़ियों से किया जाता था। हालांकि करीब 22 महीने बीतने के बाद भी यह योजना सिरे नहीं चढ़ पाई है।
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शहरवासियों का कहना है कि ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित करने के साथ उनसे जुड़ी पुरानी परंपराओं को भी जीवित किया जाना चाहिए। घंटों के दोबारा शुरू होने से न केवल नाहन की पुरानी पहचान लौटेगी, बल्कि नई पीढ़ी भी शहर के इतिहास और विरासत से रूबरू हो सकेगी।
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1902 में लंदन से मंगवाए थे तीन घंटे
दिल्ली गेट के सबसे ऊपरी हिस्से पर वर्ष 1902 में तीन घंटे लंदन से विशेष रूप से मंगवाकर स्थापित किए गए थे। 1970 के दशक तक इन घंटों की मधुर ध्वनि शहर में सुनाई देती थी। इसके बाद ये खामोश हो गए। कई दशक बीतने के बावजूद इन्हें दोबारा शुरू करने की पहल नहीं हो सकी। आज की युवा पीढ़ी भी दिल्ली गेट से कभी गूंजने वाली इन घंटों की आवाज से अनजान है।
लॉर्ड लिटन के नाहन आगमन पर बनाया था स्मारक
लिटन मेमोरियल का निर्माण महाराजा शमशेर प्रकाश ने वर्ष 1877 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिटन के नाहन आगमन की स्मृति में करवाया था। उस समय जनता को प्रतिदिन दोपहर 12 बजे समय की जानकारी देने के लिए तोप चलाने की परंपरा थी। यह तोप आज भी दिल्ली गेट के नीचे रखी है। महाराजा सुरेंद्र प्रकाश ने वर्ष 1902 में यहां घंटाघर का निर्माण करवाकर चार घड़ियां स्थापित करवाई थीं। घंटाघर में चार घड़ियां और इनके लिए तीन घंटे लगाए गए थे। घंटों की ध्वनि दूर-दूर तक सुनाई देती थी और यह नाहन की पहचान का हिस्सा हुआ करती थी।
नगर परिषद ने तेज किए प्रयास
नई नगर परिषद ने करीब एक महीने पहले कार्यभार संभाला है। नगर परिषद ने ऐतिहासिक घंटों को शुरू करने के प्रयास तेज कर दिए हैं। तकनीकी दिक्कत नहीं आई तो जल्द शहरवासियों को घंटों की मधुर ध्वनि सुनाई देगी।
-उपमा धीमान, अध्यक्ष, नगर परिषद नाहन

नाहन के दिल्लीगेट लिटन मेमोरियल पर साल 1902 घंटाघर निर्माण कर स्थापित की गई चार घडिय़ां।

नाहन के दिल्लीगेट लिटन मेमोरियल पर साल 1902 घंटाघर निर्माण कर स्थापित की गई चार घडिय़ां।