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Sirmour News: घराट बचाओ, विरासत बचाओ अभियान चलाएगी प्रयास संस्था
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रेणुकाजी क्षेत्र में गांव में संचालित पारम्परिक पनचक्की। स्रोत : पाठक
विलुप्त हो रही पनचक्की को पुनर्जीवित करने के लिए होंगे कार्यक्रम
संवाद न्यूज एजेंसी
ददाहू (सिरमौर)। प्रयास सोसायटी विलुप्त होती घराट (पनचक्की) परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए घराट बचाओ, विरासत बचाओ अभियान शुरू करेगी। संस्था का कहना है कि हिमाचल और उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक जलचालित आटा चक्कियों का तेजी से समाप्त होना गंभीर चिंता का विषय है।
घराट केवल अनाज पिसाई की व्यवस्था नहीं, बल्कि पहाड़ी समाज की सांस्कृतिक पहचान, पर्यावरणीय संतुलन और ग्रामीण आत्मनिर्भरता का प्रतीक रहे हैं। प्राचीन समय में नदी-नालों के आसपास स्थापित घराट लोगों की आजीविका और दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति का प्रमुख साधन थे। इनके माध्यम से मक्की, गेहूं, जौ, मंडुवा सहित विभिन्न अनाजों की पिसाई की जाती थी। धीमी गति से पिसाई होने के कारण आटे की गुणवत्ता बेहतर रहती थी और पोषक तत्व भी सुरक्षित रहते थे। साथ ही यह प्रणाली जल ऊर्जा पर आधारित होने के कारण पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल मानी जाती है।
प्रयास सोसायटी के सचिव धीरज रमौल ने बताया कि आधुनिक मशीनों के बढ़ते प्रभाव, रखरखाव की कमी, जलस्रोतों के सूखने और जागरूकता के अभाव के चलते सैकड़ों घराट बंद हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते संरक्षण के ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियां इस परंपरा को केवल इतिहास के पन्नों में ही देख पाएंगी।
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उन्होंने बताया कि संस्था सरकार, प्रशासन, पंचायतों, सामाजिक संगठनों, महिला मंडलों और युवक मंडलों के सहयोग से इस परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए सामूहिक प्रयास करेगी। जल्द ही क्षेत्रीय स्तर पर जन-जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे और व्यापक संवाद अभियान चलाया जाएगा।
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संवाद न्यूज एजेंसी
ददाहू (सिरमौर)। प्रयास सोसायटी विलुप्त होती घराट (पनचक्की) परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए घराट बचाओ, विरासत बचाओ अभियान शुरू करेगी। संस्था का कहना है कि हिमाचल और उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक जलचालित आटा चक्कियों का तेजी से समाप्त होना गंभीर चिंता का विषय है।
घराट केवल अनाज पिसाई की व्यवस्था नहीं, बल्कि पहाड़ी समाज की सांस्कृतिक पहचान, पर्यावरणीय संतुलन और ग्रामीण आत्मनिर्भरता का प्रतीक रहे हैं। प्राचीन समय में नदी-नालों के आसपास स्थापित घराट लोगों की आजीविका और दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति का प्रमुख साधन थे। इनके माध्यम से मक्की, गेहूं, जौ, मंडुवा सहित विभिन्न अनाजों की पिसाई की जाती थी। धीमी गति से पिसाई होने के कारण आटे की गुणवत्ता बेहतर रहती थी और पोषक तत्व भी सुरक्षित रहते थे। साथ ही यह प्रणाली जल ऊर्जा पर आधारित होने के कारण पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल मानी जाती है।
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प्रयास सोसायटी के सचिव धीरज रमौल ने बताया कि आधुनिक मशीनों के बढ़ते प्रभाव, रखरखाव की कमी, जलस्रोतों के सूखने और जागरूकता के अभाव के चलते सैकड़ों घराट बंद हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते संरक्षण के ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियां इस परंपरा को केवल इतिहास के पन्नों में ही देख पाएंगी।
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उन्होंने बताया कि संस्था सरकार, प्रशासन, पंचायतों, सामाजिक संगठनों, महिला मंडलों और युवक मंडलों के सहयोग से इस परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए सामूहिक प्रयास करेगी। जल्द ही क्षेत्रीय स्तर पर जन-जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे और व्यापक संवाद अभियान चलाया जाएगा।