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40 साल पुराने राजमहल भूमि विवाद में बड़ा फैसला : महिला को मिलेगा मकान का कब्जा
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न्यायाधीश गौरव महाजन ने पंजीकृत बिक्री विलेख को माना निर्णायक
दीपक मेहता
नाहन (सिरमौर)।
करीब चार दशक पुराने राजपरिवार की संपत्ति विवाद में जिला न्यायालय ने बड़ा फैसला सुनाते हुए निचली अदालत के निर्णय को पलट दिया है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश गौरव महाजन की अदालत ने आशा अग्रवाल की सिविल अपील स्वीकार करते हुए राजेंद्र नगर स्थित विवादित मकान और भूमि का कब्जा उन्हें सौंपने का आदेश दिया है। अदालत ने माना कि पंजीकृत बिक्री विलेख के आधार पर आशा अग्रवाल ही संपत्ति की वैध स्वामिनी हैं।
मामला नाहन के 86.62 वर्गमीटर भूमि और उस पर बने भवन से जुड़ा है। ट्रायल कोर्ट ने मार्च, 2024 में आशा अग्रवाल का प्रतिदावा (काउंटर क्लेम) खारिज कर दिया था, लेकिन अपीलीय अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों और साक्ष्यों का दोबारा परीक्षण करते हुए फैसला पलट दिया। अदालत ने निर्णय में स्पष्ट किया कि 15 दिसंबर 2014 को कमलेश रानी की ओर से आशा अग्रवाल के पक्ष में निष्पादित पंजीकृत बिक्री विलेख पूरी तरह वैध है और उसी से संपत्ति का स्वामित्व स्थापित होता है। इसके विपरीत वर्ष 1980 के बिक्री समझौते (एग्रीमेंट टू सेल) के आधार पर स्वामित्व का दावा कानूनन स्वीकार नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि केवल बिक्री समझौता किसी व्यक्ति को मालिकाना हक नहीं देता और लंबे समय तक कब्जा रहने मात्र से भी स्वामित्व सिद्ध नहीं होता। अदालत ने आशा अग्रवाल के पक्ष में विवादित संपत्ति का कब्जा देने की डिक्री पारित करते हुए निर्धारित अवधि में शेष न्यायालय शुल्क जमा कराने के निर्देश भी दिए हैं। साथ ही मुकदमे का खर्च भी उनके पक्ष में देने का आदेश दिया गया है।
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हाईकोर्ट के बंटवारे के बाद बदला स्वामित्व
फैसले में कहा गया कि हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की ओर से राजपरिवार की संपत्तियों के बंटवारे के बाद 13 फरवरी 2014 को दर्ज म्यूटेशन के जरिए विवादित भूमि कमलेश रानी के हिस्से में आई। इसके बाद 15 दिसंबर 2014 को कमलेश रानी ने विधिवत पंजीकृत बिक्री विलेख के माध्यम से यह संपत्ति आशा अग्रवाल के नाम बेच दी। अदालत ने इसी बिक्री विलेख को वैध मानते हुए आशा अग्रवाल के स्वामित्व और कब्जे के अधिकार को स्वीकार किया।
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क्यों अहम है फैसला
न्यायालय ने निर्णय में दोहराया कि अचल संपत्ति का स्वामित्व केवल पंजीकृत बिक्री विलेख से ही हस्तांतरित होता है। साधारण एग्रीमेंट टू सेल न तो मालिकाना हक देता है और न ही केवल लंबे कब्जे के आधार पर स्वामित्व का दावा स्वीकार किया जा सकता है। संपत्ति विवादों में यह फैसला एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है।-- -- -- -
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दीपक मेहता
नाहन (सिरमौर)।
करीब चार दशक पुराने राजपरिवार की संपत्ति विवाद में जिला न्यायालय ने बड़ा फैसला सुनाते हुए निचली अदालत के निर्णय को पलट दिया है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश गौरव महाजन की अदालत ने आशा अग्रवाल की सिविल अपील स्वीकार करते हुए राजेंद्र नगर स्थित विवादित मकान और भूमि का कब्जा उन्हें सौंपने का आदेश दिया है। अदालत ने माना कि पंजीकृत बिक्री विलेख के आधार पर आशा अग्रवाल ही संपत्ति की वैध स्वामिनी हैं।
मामला नाहन के 86.62 वर्गमीटर भूमि और उस पर बने भवन से जुड़ा है। ट्रायल कोर्ट ने मार्च, 2024 में आशा अग्रवाल का प्रतिदावा (काउंटर क्लेम) खारिज कर दिया था, लेकिन अपीलीय अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों और साक्ष्यों का दोबारा परीक्षण करते हुए फैसला पलट दिया। अदालत ने निर्णय में स्पष्ट किया कि 15 दिसंबर 2014 को कमलेश रानी की ओर से आशा अग्रवाल के पक्ष में निष्पादित पंजीकृत बिक्री विलेख पूरी तरह वैध है और उसी से संपत्ति का स्वामित्व स्थापित होता है। इसके विपरीत वर्ष 1980 के बिक्री समझौते (एग्रीमेंट टू सेल) के आधार पर स्वामित्व का दावा कानूनन स्वीकार नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि केवल बिक्री समझौता किसी व्यक्ति को मालिकाना हक नहीं देता और लंबे समय तक कब्जा रहने मात्र से भी स्वामित्व सिद्ध नहीं होता। अदालत ने आशा अग्रवाल के पक्ष में विवादित संपत्ति का कब्जा देने की डिक्री पारित करते हुए निर्धारित अवधि में शेष न्यायालय शुल्क जमा कराने के निर्देश भी दिए हैं। साथ ही मुकदमे का खर्च भी उनके पक्ष में देने का आदेश दिया गया है।
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हाईकोर्ट के बंटवारे के बाद बदला स्वामित्व
फैसले में कहा गया कि हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की ओर से राजपरिवार की संपत्तियों के बंटवारे के बाद 13 फरवरी 2014 को दर्ज म्यूटेशन के जरिए विवादित भूमि कमलेश रानी के हिस्से में आई। इसके बाद 15 दिसंबर 2014 को कमलेश रानी ने विधिवत पंजीकृत बिक्री विलेख के माध्यम से यह संपत्ति आशा अग्रवाल के नाम बेच दी। अदालत ने इसी बिक्री विलेख को वैध मानते हुए आशा अग्रवाल के स्वामित्व और कब्जे के अधिकार को स्वीकार किया।
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क्यों अहम है फैसला
न्यायालय ने निर्णय में दोहराया कि अचल संपत्ति का स्वामित्व केवल पंजीकृत बिक्री विलेख से ही हस्तांतरित होता है। साधारण एग्रीमेंट टू सेल न तो मालिकाना हक देता है और न ही केवल लंबे कब्जे के आधार पर स्वामित्व का दावा स्वीकार किया जा सकता है। संपत्ति विवादों में यह फैसला एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है।