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Sirmour News: अदालत , <bha>--</bha>
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धार्मिक संपत्ति विवाद में साधक को झटका, कोर्ट ने कहा,
पहले प्रमाण लाओ; कानूनी पात्रता पर भी उठे सवाल
- शंभूवाला क्षेत्र में ‘सतगुरु साहिब धाम’ की जमीन बताकर स्वामित्व चुनौती देने का मामला, निचली अदालत का फैसला बरकरार
- कोर्ट की टिप्पणी : राजस्व रिकॉर्ड सुधार का अधिकार राजस्व अधिकारियों के पास
दीपक मेहता
नाहन (सिरमौर)। शंभूवाला क्षेत्र की करोड़ों रुपये मूल्य की भूमि को धार्मिक संपत्ति बताकर स्वामित्व पर उठाए गए विवाद में जिला न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश गौरव महाजन ने हरियाणा के सुनील कुमार की अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत के आदेश को सही ठहराया है। न्यायालय ने टिप्पणी की कि अपीलकर्ता यह साबित नहीं कर सका कि वह संबंधित धार्मिक संस्था का अधिकृत प्रतिनिधि या उत्तराधिकारी है।
अंबाला कैंट निवासी सुनील कुमार ने अदालत में दावा किया था कि संबंधित भूमि ‘परम संत सतगुरु साहिब जी’ की धार्मिक संपत्ति है और राजस्व रिकॉर्ड में राम प्यारी के नाम दर्ज स्वामित्व अवैध है। उन्होंने स्वयं को उक्त संपत्ति का चेला एवं प्रबंधक घोषित करने तथा भूमि के हस्तांतरण पर रोक लगाने की भी मांग की थी। अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई दस्तावेज मौजूद नहीं है जिससे साबित हो कि विवादित भूमि किसी पंजीकृत धार्मिक न्यास या धार्मिक संस्था की संपत्ति है। न्यायालय ने यह भी कहा कि राजस्व अभिलेखों में भूमि स्वर्गीय बलबीर चंद के नाम दर्ज थी और उनके निधन के बाद कानूनी प्रक्रिया के तहत राम प्यारी के नाम विरासत दर्ज हुई।
फैसले में स्पष्ट किया गया कि राजस्व रिकॉर्ड में संशोधन और म्यूटेशन से जुड़े विवादों का निपटारा राजस्व अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में आता है। ऐसे मामलों में सिविल न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता। अदालत ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता पहले उच्च न्यायालय और राजस्व अधिकारियों के समक्ष भी इसी प्रकार की राहत मांग चुका था। अदालत के अनुसार वाद में कई महत्वपूर्ण दस्तावेज भी प्रस्तुत नहीं किए गए और दावों का आधार स्पष्ट नहीं था। सभी तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद अदालत ने अपील को लागत सहित खारिज करते हुए 17 फरवरी 2026 को वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश के पारित आदेश को बरकरार रखा।
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संवाद
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पहले प्रमाण लाओ
- शंभूवाला क्षेत्र में ‘सतगुरु साहिब धाम’ की जमीन बताकर स्वामित्व चुनौती देने का मामला, निचली अदालत का फैसला बरकरार
- कोर्ट की टिप्पणी : राजस्व रिकॉर्ड सुधार का अधिकार राजस्व अधिकारियों के पास
दीपक मेहता
नाहन (सिरमौर)। शंभूवाला क्षेत्र की करोड़ों रुपये मूल्य की भूमि को धार्मिक संपत्ति बताकर स्वामित्व पर उठाए गए विवाद में जिला न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश गौरव महाजन ने हरियाणा के सुनील कुमार की अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत के आदेश को सही ठहराया है। न्यायालय ने टिप्पणी की कि अपीलकर्ता यह साबित नहीं कर सका कि वह संबंधित धार्मिक संस्था का अधिकृत प्रतिनिधि या उत्तराधिकारी है।
अंबाला कैंट निवासी सुनील कुमार ने अदालत में दावा किया था कि संबंधित भूमि ‘परम संत सतगुरु साहिब जी’ की धार्मिक संपत्ति है और राजस्व रिकॉर्ड में राम प्यारी के नाम दर्ज स्वामित्व अवैध है। उन्होंने स्वयं को उक्त संपत्ति का चेला एवं प्रबंधक घोषित करने तथा भूमि के हस्तांतरण पर रोक लगाने की भी मांग की थी। अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई दस्तावेज मौजूद नहीं है जिससे साबित हो कि विवादित भूमि किसी पंजीकृत धार्मिक न्यास या धार्मिक संस्था की संपत्ति है। न्यायालय ने यह भी कहा कि राजस्व अभिलेखों में भूमि स्वर्गीय बलबीर चंद के नाम दर्ज थी और उनके निधन के बाद कानूनी प्रक्रिया के तहत राम प्यारी के नाम विरासत दर्ज हुई।
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फैसले में स्पष्ट किया गया कि राजस्व रिकॉर्ड में संशोधन और म्यूटेशन से जुड़े विवादों का निपटारा राजस्व अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में आता है। ऐसे मामलों में सिविल न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता। अदालत ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता पहले उच्च न्यायालय और राजस्व अधिकारियों के समक्ष भी इसी प्रकार की राहत मांग चुका था। अदालत के अनुसार वाद में कई महत्वपूर्ण दस्तावेज भी प्रस्तुत नहीं किए गए और दावों का आधार स्पष्ट नहीं था। सभी तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद अदालत ने अपील को लागत सहित खारिज करते हुए 17 फरवरी 2026 को वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश के पारित आदेश को बरकरार रखा।
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