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सौ से अधिक पंचायतों में कटेंगे चार करोड़ के बकरे
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माघी पर 137 पंचायतों में आज कटेंगे चार करोड़ के बकरे
- सिरमौर का गिरिपार क्षेत्र माघी पर्व के जश्न में डूबा, हर घर में बकरा काटने की परंपरा
- पर्व की पूर्व संध्या पर बने पारंपरिक पकवान, लोकनृत्य और गीत-संगीत का चलता दौर
संजय भारद्वाज
नाहन (सिरमौर)।
जिला सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र में माघी पर्व के जश्न की शुरुआत हो चुकी है। पर्व की पूर्व संध्या पर पारंपरिक पकवानों की खुशबू से पूरा इलाका महक उठा है। शनिवार से बकरे काटने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। क्षेत्र की सौ से अधिक पंचायतों में लगभग चार करोड़ रुपये के बकरे काटे जाएंगे। इस पर्व को मनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। पर्व में लोकनृत्य और गीत-संगीत का दौर भी चलता है।
गिरिपार क्षेत्र में माघी पर्व पर हर घर में बकरा काटने की परंपरा है। यहां की करीब 137 पंचायतों की आबादी पौने तीन लाख है, जबकि परिवारों की संख्या लगभग 40 हजार है। इस हिसाब से इस बार लगभग चार करोड़ रुपये के बकरे काटे जाने का अनुमान है। वर्तमान में बकरों की कीमत पांच हजार से शुरू होती है। यदि इसकी औसत को ही लें तो इनकी कीमत लगभग दो करोड़ रुपये बैठती है, जबकि बकरों की कीमत 35-40 हजार रुपये तक पहुंच गई है। हाटी समिति के महामंत्री कुंदन शास्त्री ने बताया कि गिरिपार के लगभग 95 फीसदी परिवार माघी पर्व पर बकरे काटते हैं। जो परिवार शाकाहारी हैं वे बकरे नहीं काटते।
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जौनसार बाबर में भी मनाया जाता है पर्व
गिरिपार क्षेत्र के साथ-साथ पड़ोसी राज्य उत्तराखंड के जौनसार बाबर में भी माघी पर्व मनाने की परंपरा है। पर्व पर गिरिपार क्षेत्र का हर व्यक्ति अपने घर में मौजूद रहता है। जो लोग गिरिपार क्षेत्र से बाहर नौकरी कर रहे हैं, वे भी इस दिन घर लौटते हैं। 11 जनवरी सभी घरों में पहाड़ी व्यंजन उलौले, तेलपक्की, बडोली बनाई जाती है। अगले दिन 12 जनवरी से बकरों के काटने का सिलसिला शुरू हो जाएगा।
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महाकाली की होती है विशेष पूजा
हाटी समिति के उपाध्यक्ष सुरेंद्र हिंदुस्तानी ने बताया कि गिरिपार क्षेत्र में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस दिन बाकायदा महाकाली की भी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग बकरे खरीदकर काटते हैं तो कुछ बकरे के बदले में कुछ और सामान देते हैं। कुछ लोग स्वयं बकरों को माघी के लिए विशेष रूप से पालते हैं।
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विवाहिता और मेहमानों को रखा जाता है हिस्सा
माघी पर्व पर बनने वाले पकवान और बकरे के काटे गए मांस का हिस्सा बेटी, बहन आदि को रखा जाता है। मेहमानों के लिए भी इसी प्रकार से हिस्सा रखा जाता है। हाटी समिति के महामंत्री कुंदन शास्त्री ने बताया कि माघी पर्व पर अपनी बेटी या बहन आदि को गुड़की भेजी भेजी जाती है। उसके लिए मांस अलग से रखा जाता है, जो मायके आने पर उसे परोसने की परंपरा है।
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माघी पर 137 पंचायतों में आज कटेंगे चार करोड़ के बकरे
- सिरमौर का गिरिपार क्षेत्र माघी पर्व के जश्न में डूबा, हर घर में बकरा काटने की परंपरा
- पर्व की पूर्व संध्या पर बने पारंपरिक पकवान, लोकनृत्य और गीत-संगीत का चलता दौर
संजय भारद्वाज
नाहन (सिरमौर)।
जिला सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र में माघी पर्व के जश्न की शुरुआत हो चुकी है। पर्व की पूर्व संध्या पर पारंपरिक पकवानों की खुशबू से पूरा इलाका महक उठा है। शनिवार से बकरे काटने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। क्षेत्र की सौ से अधिक पंचायतों में लगभग चार करोड़ रुपये के बकरे काटे जाएंगे। इस पर्व को मनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। पर्व में लोकनृत्य और गीत-संगीत का दौर भी चलता है।
गिरिपार क्षेत्र में माघी पर्व पर हर घर में बकरा काटने की परंपरा है। यहां की करीब 137 पंचायतों की आबादी पौने तीन लाख है, जबकि परिवारों की संख्या लगभग 40 हजार है। इस हिसाब से इस बार लगभग चार करोड़ रुपये के बकरे काटे जाने का अनुमान है। वर्तमान में बकरों की कीमत पांच हजार से शुरू होती है। यदि इसकी औसत को ही लें तो इनकी कीमत लगभग दो करोड़ रुपये बैठती है, जबकि बकरों की कीमत 35-40 हजार रुपये तक पहुंच गई है। हाटी समिति के महामंत्री कुंदन शास्त्री ने बताया कि गिरिपार के लगभग 95 फीसदी परिवार माघी पर्व पर बकरे काटते हैं। जो परिवार शाकाहारी हैं वे बकरे नहीं काटते।
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जौनसार बाबर में भी मनाया जाता है पर्व
गिरिपार क्षेत्र के साथ-साथ पड़ोसी राज्य उत्तराखंड के जौनसार बाबर में भी माघी पर्व मनाने की परंपरा है। पर्व पर गिरिपार क्षेत्र का हर व्यक्ति अपने घर में मौजूद रहता है। जो लोग गिरिपार क्षेत्र से बाहर नौकरी कर रहे हैं, वे भी इस दिन घर लौटते हैं। 11 जनवरी सभी घरों में पहाड़ी व्यंजन उलौले, तेलपक्की, बडोली बनाई जाती है। अगले दिन 12 जनवरी से बकरों के काटने का सिलसिला शुरू हो जाएगा।
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महाकाली की होती है विशेष पूजा
हाटी समिति के उपाध्यक्ष सुरेंद्र हिंदुस्तानी ने बताया कि गिरिपार क्षेत्र में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस दिन बाकायदा महाकाली की भी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग बकरे खरीदकर काटते हैं तो कुछ बकरे के बदले में कुछ और सामान देते हैं। कुछ लोग स्वयं बकरों को माघी के लिए विशेष रूप से पालते हैं।
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विवाहिता और मेहमानों को रखा जाता है हिस्सा
माघी पर्व पर बनने वाले पकवान और बकरे के काटे गए मांस का हिस्सा बेटी, बहन आदि को रखा जाता है। मेहमानों के लिए भी इसी प्रकार से हिस्सा रखा जाता है। हाटी समिति के महामंत्री कुंदन शास्त्री ने बताया कि माघी पर्व पर अपनी बेटी या बहन आदि को गुड़की भेजी भेजी जाती है। उसके लिए मांस अलग से रखा जाता है, जो मायके आने पर उसे परोसने की परंपरा है।
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