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सिरमौरी के लोईया और डांगरा का होगा पेटेंट, मिलेगी अंतरराष्ट्रीय पहचान
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अमर उजाला
- फोटो : amarujala
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नाहन (सिरमौर)। सिरमौर की समृद्ध संस्कृति एवं सभ्यता का परिचायक लोईया और डांगरा को पेटेंट करवाया जाएगा। इससे सिरमौरी संस्कृति को एक नई पहचान मिल सकेगी। पेटेंट के लिए उद्योग विभाग के माध्यम से प्रक्रिया आरंभ की गई है। प्रदेश विज्ञान प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद की नोडल एजेंसी हिमकोस्ट के तत्वावधान में हिमाचल पेटेंट सूचना केंद्र की स्थापना की गई है।
उपायुक्त सिरमौर ललित जैन ने कहा कि लोईया सिरमौर जिला के ट्रांसगिरि क्षेत्र की पहचान और पारंपरिक वेशभूषा है, जिसे विशेषकर सर्दियों के दौरान लोग बड़े शौक के साथ पहनते हैं। लोईया और डांगरा को पेटेंट करवाने के लिए हिमकोस्ट के साथ पत्राचार आरंभ कर दिया गया है। हिमकोस्ट को लोईया और डांगरा के परंपरागत और मौलिकता के बारे में जानकारी उपलब्ध करवाई जा रही है।
लोईया और डांगरा एक दूसरे के पर्याय हैं। डांगरा एक ऐसा अस्त्र-शस्त्र है जो आत्मरक्षा के साथ-साथ घरेलू कामों विशेषकर पशुओं के लिए चारा काटने में भी इस्तेमाल किया जाता है। डांगरा को भगवान परशुराम के कुल्हाड़े का प्रतीक भी माना जाता है। भगवान परशुराम भी ऐसा फरसा ही धारण करते थे। गिरिपार क्षेत्र में लोग कालांतर में युद्धकाल और वर्तमान में ठोडा खेल के दौरान इसे हाथ में लेकर नृत्य भी करते हैं। डांगरा समाज में दुष्ट प्रवृत्तियों के शमन के लिए अभियान का भी प्रतीक माना जाता है। जबकि, लोईया जिले के लोगों की सादगी का प्रतीक है। सिरमौर में लोइया और डांगरा अतिथि सत्कार के रूप में भी भेंट करने की परंपरा है।
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डीसी ललित जैन ने बताया कि किसी भी उत्पाद को भौगोलिक चिह्न अर्थात जीआई टैग का दर्जा प्राप्त करने के लिए उसका संबधित क्षेत्र में उत्पादन और प्रसंस्करण होना आवश्यक है। जिस तरह हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा की पेंटिंग, चंबा का रुमाल, दार्जिलिंग चाय, तिरुपति का लड्डू, कश्मीर का पश्मीना आदि को जीआई टैग मिला है, इसी तर्ज पर सिरमौर के लोईया और डांगरा को जीआई टैग प्रदान करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
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उपायुक्त सिरमौर ललित जैन ने कहा कि लोईया सिरमौर जिला के ट्रांसगिरि क्षेत्र की पहचान और पारंपरिक वेशभूषा है, जिसे विशेषकर सर्दियों के दौरान लोग बड़े शौक के साथ पहनते हैं। लोईया और डांगरा को पेटेंट करवाने के लिए हिमकोस्ट के साथ पत्राचार आरंभ कर दिया गया है। हिमकोस्ट को लोईया और डांगरा के परंपरागत और मौलिकता के बारे में जानकारी उपलब्ध करवाई जा रही है।
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लोईया और डांगरा एक दूसरे के पर्याय हैं। डांगरा एक ऐसा अस्त्र-शस्त्र है जो आत्मरक्षा के साथ-साथ घरेलू कामों विशेषकर पशुओं के लिए चारा काटने में भी इस्तेमाल किया जाता है। डांगरा को भगवान परशुराम के कुल्हाड़े का प्रतीक भी माना जाता है। भगवान परशुराम भी ऐसा फरसा ही धारण करते थे। गिरिपार क्षेत्र में लोग कालांतर में युद्धकाल और वर्तमान में ठोडा खेल के दौरान इसे हाथ में लेकर नृत्य भी करते हैं। डांगरा समाज में दुष्ट प्रवृत्तियों के शमन के लिए अभियान का भी प्रतीक माना जाता है। जबकि, लोईया जिले के लोगों की सादगी का प्रतीक है। सिरमौर में लोइया और डांगरा अतिथि सत्कार के रूप में भी भेंट करने की परंपरा है।
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डीसी ललित जैन ने बताया कि किसी भी उत्पाद को भौगोलिक चिह्न अर्थात जीआई टैग का दर्जा प्राप्त करने के लिए उसका संबधित क्षेत्र में उत्पादन और प्रसंस्करण होना आवश्यक है। जिस तरह हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा की पेंटिंग, चंबा का रुमाल, दार्जिलिंग चाय, तिरुपति का लड्डू, कश्मीर का पश्मीना आदि को जीआई टैग मिला है, इसी तर्ज पर सिरमौर के लोईया और डांगरा को जीआई टैग प्रदान करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।