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शांत महायज्ञ के मंत्रोच्चारण के साथ गूंजा शिलाई क्षेत्र
Updated Tue, 03 Jul 2018 10:54 PM IST
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शिलाई में चल रहे शांत महायज्ञ उमड़ी लोगों की भीड़।
- फोटो : अमर उजाला
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शिलाई (सिरमौर)। हजारों लोगों की भीड़। परसा और तलवारें उठाए परंपरागत लिंबर नृत्य और मंत्रोच्चारण से गूंजायमान हुआ शिलाई का वातावरण...। पांच दिन तक शिलाई में यही अलौकिक नजारा देखने को मिला। मौका था गिरिपार के शिलाई में काली स्वरूप ठारी देवी को समर्पित शांत महायज्ञ का। उत्तराखंड और हिमाचल के लोगों के इस महाकुंभ में बुरी शक्तियों के नाश के लिए 28 जून से दो जुलाई तक करीब सबा लाख मंत्रों का जाप किया गया। करीब तीन सौ प्रकार की सामग्रियों की हवन कुंड में आहुतियां डाली गईं। इस महा अनुष्ठान में उत्तराखंड और सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र के करीब 200 गांवों के 25 हजार से अधिक लोगों की भीड़ जुटी। मंगलवार को भंडारे के साथ शांत महायज्ञ का समापन हो गया। देश और प्रदेश की खुशहाली, बुरी शक्तियों से सुरक्षा और महामारी जैसी बीमारियों के निराकरण के लिए 12 वर्ष के बाद इस महायज्ञ का आयोजन किया गया। पांच दिन तक शिलाई भजन-कीर्तन से गुंजायमान रहा। इस दौरान लिंबर, रासा और हारुल नृत्य का भी दौर चलता रहा। सोमवार को महायज्ञ की पूर्णाहुति हुई, जबकि मंगलवार को विशेष पूजा के बाद भंडारे का आयोजन किया गया। खास यह रहा कि इस महायज्ञ में हिमाचल के गिरपार और उत्तराखंड के लोगों ने आपस में दाईचारा और भाईचारा भी निभाया। उत्तराखंड से यहां पहुंचे लोगों का स्थानीय लोगों ने जोरदार स्वागत किया। बताया जा रहा है कि उत्तराखंड से करीब पैंतीस हजार लोग ठारी देवी का आशीर्वाद लेने यहां पहुंचे।
सूती धागे से बांधा गांव
शांत महायज्ञ पूर्ण होने के बाद रात के समय तांत्रिक विधि से देवी की पूजा की जाती है। इसमें हर घर से एक सदस्य शामिल होता है। करीब दो घंटे की पूजा के बाद शांत महायज्ञ की पूर्ण आहुति दी जाती है। इसके बाद ब्राह्मणों के साथ गांव की परिक्रमा की जाती है। सूती धागे से पूरे गांव के बाहर सुरक्षा कवच लगाया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से अगले यज्ञ तक गांव के साथ क्षेत्र की सुरक्षा बनी रहती है। अंत में लिंबर नृत्य किया जाता है। इसमें परसा और तलवारें उठाकर लोग नृत्य करते हैं।
कई जगह से लाई गई मिट्टी और पानी
ठारी मंदिर के पुजारी हीरा सिंह, जाति राम, गुमान सिंह, रतिराम, सुंदर सिंह और चियाना गांव के ब्राह्मण नाग चंद शर्मा ने बताया कि शांत महायज्ञ के लिए कई जगह से सामग्री लाई जाती है। राजमहल, विधानसभा और संसद भवन की मिट्टी, आठ आड़तों के चावल, धान के साथ क्यारियों की मिट्टी, नदी के उल्टे सुलटे फेर का पानी, पानी से चलने वाले घराट का पत्थर, समुद्र और नदियों का जल समेत कई सामग्री इस महायज्ञ में उपयोग की गई।
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सूती धागे से बांधा गांव
शांत महायज्ञ पूर्ण होने के बाद रात के समय तांत्रिक विधि से देवी की पूजा की जाती है। इसमें हर घर से एक सदस्य शामिल होता है। करीब दो घंटे की पूजा के बाद शांत महायज्ञ की पूर्ण आहुति दी जाती है। इसके बाद ब्राह्मणों के साथ गांव की परिक्रमा की जाती है। सूती धागे से पूरे गांव के बाहर सुरक्षा कवच लगाया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से अगले यज्ञ तक गांव के साथ क्षेत्र की सुरक्षा बनी रहती है। अंत में लिंबर नृत्य किया जाता है। इसमें परसा और तलवारें उठाकर लोग नृत्य करते हैं।
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कई जगह से लाई गई मिट्टी और पानी
ठारी मंदिर के पुजारी हीरा सिंह, जाति राम, गुमान सिंह, रतिराम, सुंदर सिंह और चियाना गांव के ब्राह्मण नाग चंद शर्मा ने बताया कि शांत महायज्ञ के लिए कई जगह से सामग्री लाई जाती है। राजमहल, विधानसभा और संसद भवन की मिट्टी, आठ आड़तों के चावल, धान के साथ क्यारियों की मिट्टी, नदी के उल्टे सुलटे फेर का पानी, पानी से चलने वाले घराट का पत्थर, समुद्र और नदियों का जल समेत कई सामग्री इस महायज्ञ में उपयोग की गई।
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