{"_id":"6a44fda5ae0528b395091d77","slug":"staff-shortage-at-hrtc-nerwa-shimla-rohru-rampur-hp-news-c-178-1-ssml1033-163768-2026-07-01","type":"story","status":"publish","title_hn":"Rampur Bushahar News: नेरवा में स्टाफ की कमी, खटारा \nबसों के भरोसे सफर, 18 रूट बंद","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Rampur Bushahar News: नेरवा में स्टाफ की कमी, खटारा बसों के भरोसे सफर, 18 रूट बंद
विज्ञापन
इंजन में खराबी आ जाने के कारण उत्तराखंड में एक सप्ताह तक नेरवा डिपो की बस खड़ी रही थी।तारादेवी स
पहाड़ों में खतरें में सफर : नेरवा डिपो में 84 रूटों के लिए न्यूनतम 53 बसों की जरूरत, उपलब्ध सिर्फ 39
वर्ष 2016 के बाद से कोई नई बस सेवा शुरू नहीं हुई
शिमला-नेरवा-हरिद्वार लंबे रूट पर पुरानी बसें भेजी जा रहीं
संवाद न्यूज एजेंसी
नेरवा (रोहड़ू)। शिमला जिला के सबसे दुर्गम क्षेत्रों में शामिल चौपाल विधानसभा क्षेत्र के नेरवा में हिमाचल पथ परिवहन निगम (एचआरटीसी) के डिपो की हालत पांच वर्षों से बेहद खस्ता है। बसों और स्टाफ की भारी कमी के कारण डिपो के 18 रूट बंद हो गए हैं। वहीं, नेरवा के दुर्गम ग्रामीण क्षेत्रों में खटारा बसों के भरोसे लोगों का सफर है। वर्ष 2012 में डिपो खुलने पर बेहतर यातायात सुविधाओं की उम्मीद जगी थी, लेकिन अब स्थिति चिंताजनक है। नेरवा डिपो में 84 रूटों के लिए न्यूनतम 53 बसों की जरूरत है। वर्तमान में केवल 39 बसें ही उपलब्ध हैं। पिछले दो वर्षों में 14 पुरानी खटारा बसें सेवा से बाहर कर दी गई हैं। इनके स्थान पर एक भी नई बस नहीं भेजी गई। वर्ष 2016 के बाद से कोई नई बस सेवा शुरू नहीं हुई है। शिमला-नेरवा-हरिद्वार जैसे लंबे रूटों पर दस साल पुरानी बसें भेजी जा रही हैं। ये बसें अक्सर रास्ते में खराब हो जाती हैं। बसों की कमी के कारण कई रूटों पर जहां पहले दो बसें चलती थीं, वहां अब एक ही बस भेजी जा रही है। इससे बसें अक्सर ओवरलोड हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त, पांच रूटों को आपस में जोड़ दिया गया है। शिमला-तांदीयो और शिमला-कुटांगन जैसे महत्वपूर्ण रूटों पर बसें एक दिन छोड़कर एक दिन चल रही हैं।
खराबी आने पर तारादेवी से बुलाने पड़ते हैं मेकेनिक
डिपो में स्टाफ की भी काफी कमी है। वर्तमान में मात्र 46 कंडक्टर और 49 ड्राइवर उपलब्ध हैं। शिमला-नेरवा-हरिद्वार जैसे लंबे रूट पर प्रतिदिन दो परिचालक और दो चालकों की आवश्यकता होती है। वरिष्ठ मेकेनिक न होने के कारण इंजन या गियर में खराबी आने पर मेकेनिक तारादेवी से बुलाने पड़ते हैं, जिससे बसें कई दिनों तक खड़ी रहती हैं। ब्रेकडाउन हुई बसों को ठीक करने के लिए अब कोई वाहन भी उपलब्ध नहीं है, जिसका अनुबंध समाप्त होने के बाद नवीनीकरण नहीं किया गया। अब मेकेनिक अगली बस में ही जा पाते हैं, जिससे मरम्मत में दो दिन लग जाते हैं।
नियमित बस न होने से लोग परेशान
नियमित बस सेवा न होने के कारण नौकरीपेशा लोगों, बुजुर्गों और मरीजों को अत्यधिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। स्कूल-कॉलेज जाने वाले विद्यार्थियों को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें मजबूरन निजी वाहनों में अधिक किराया चुकाकर गंतव्य तक जाना पड़ता है। इन वाहनों में अक्सर क्षमता से अधिक सवारियां होती हैं। यात्रियों को कई गुना अधिक किराया भी चुकाना पड़ता है।
विज्ञापन
क्षेत्रीय प्रबंधक का पद रिक्त पड़ा
नेरवा डिपो में लंबे समय से क्षेत्रीय प्रबंधक का पद रिक्त पड़ा है। डिपो का संचालन यातायात प्रबंधक के सहारे चल रहा है। यातायात प्रबंधक को अक्सर रोहड़ू या रिकांगपिओ का अतिरिक्त कार्यभार सौंप दिया जाता है। पिछले वर्ष उत्तराखंड में हुए एक बस दुर्घटना के समय भी नेरवा के यातायात प्रबंधक के पास रिकांगपिओ डिपो का अतिरिक्त कार्यभार था। उनकी अनुपस्थिति में डिपो चलाने की जिम्मेदारी बस अड्डा प्रभारी नेरवा के कंधों पर आ जाती है।
लोगों का कहना
नेरवा डिपो की बसों की हालत खस्ता है। बसों का ब्रेकडाउन होना रोजमर्रा की बात हो गई है। बसों के खराब हो जाने पर सवारियों को लाने के लिए दूसरी बसें भी नहीं भेजी जाती हैं। लिहाजा, सवारियों को पैदल ही गंतव्य स्थान तक सफर करना पड़ता है। परिवहन निगम को दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए नई बसें भेजनी चाहिए।।
-- बबिता राणा, पूर्व प्रधान, पंचायत बिजमल
नेरवा डिपो का हाल बेहाल है। खस्ता हाल बसों का ब्रेकडाउन होना आम बात है। परेशानी यात्रियों को झेलनी पड़ती है। लोग काफी समय से नेरवा-पांवटा साहिब-चंडीगढ़, नेरवा-दिल्ली, नेरवा-धर्मशाला बस चलाने की मांग कर रहे हैं। इस क्षेत्र से एक भी रात्रि बस सेवा नहीं चलती है। लोगों की सुविधा के लिए सरकार को इन रूटों पर बस सेवा प्राथमिकता के आधार पर चलानी चाहिए।-- विक्रम भागटा, समाजसेवी
डिपो में बस की कमी होने के कारण कुछ रूट क्लब किए गए हैं। निगम की इलिक्टि्रक बसें आईं हैं, जिन्हें मैदानी क्षेत्रों में दिया जाना है। जिन डिपुओं में ये बसें दी जाएंगी, वहां से कुछ बसें नेरवा में भी भेजी जाएंगी। इसके बाद सभी रूट सुचारु रूप से चलेंगे।-- अब्दुल्ला खान, अड्डा प्रभारी, नेरवा।
विज्ञापन
वर्ष 2016 के बाद से कोई नई बस सेवा शुरू नहीं हुई
शिमला-नेरवा-हरिद्वार लंबे रूट पर पुरानी बसें भेजी जा रहीं
संवाद न्यूज एजेंसी
नेरवा (रोहड़ू)। शिमला जिला के सबसे दुर्गम क्षेत्रों में शामिल चौपाल विधानसभा क्षेत्र के नेरवा में हिमाचल पथ परिवहन निगम (एचआरटीसी) के डिपो की हालत पांच वर्षों से बेहद खस्ता है। बसों और स्टाफ की भारी कमी के कारण डिपो के 18 रूट बंद हो गए हैं। वहीं, नेरवा के दुर्गम ग्रामीण क्षेत्रों में खटारा बसों के भरोसे लोगों का सफर है। वर्ष 2012 में डिपो खुलने पर बेहतर यातायात सुविधाओं की उम्मीद जगी थी, लेकिन अब स्थिति चिंताजनक है। नेरवा डिपो में 84 रूटों के लिए न्यूनतम 53 बसों की जरूरत है। वर्तमान में केवल 39 बसें ही उपलब्ध हैं। पिछले दो वर्षों में 14 पुरानी खटारा बसें सेवा से बाहर कर दी गई हैं। इनके स्थान पर एक भी नई बस नहीं भेजी गई। वर्ष 2016 के बाद से कोई नई बस सेवा शुरू नहीं हुई है। शिमला-नेरवा-हरिद्वार जैसे लंबे रूटों पर दस साल पुरानी बसें भेजी जा रही हैं। ये बसें अक्सर रास्ते में खराब हो जाती हैं। बसों की कमी के कारण कई रूटों पर जहां पहले दो बसें चलती थीं, वहां अब एक ही बस भेजी जा रही है। इससे बसें अक्सर ओवरलोड हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त, पांच रूटों को आपस में जोड़ दिया गया है। शिमला-तांदीयो और शिमला-कुटांगन जैसे महत्वपूर्ण रूटों पर बसें एक दिन छोड़कर एक दिन चल रही हैं।
खराबी आने पर तारादेवी से बुलाने पड़ते हैं मेकेनिक
डिपो में स्टाफ की भी काफी कमी है। वर्तमान में मात्र 46 कंडक्टर और 49 ड्राइवर उपलब्ध हैं। शिमला-नेरवा-हरिद्वार जैसे लंबे रूट पर प्रतिदिन दो परिचालक और दो चालकों की आवश्यकता होती है। वरिष्ठ मेकेनिक न होने के कारण इंजन या गियर में खराबी आने पर मेकेनिक तारादेवी से बुलाने पड़ते हैं, जिससे बसें कई दिनों तक खड़ी रहती हैं। ब्रेकडाउन हुई बसों को ठीक करने के लिए अब कोई वाहन भी उपलब्ध नहीं है, जिसका अनुबंध समाप्त होने के बाद नवीनीकरण नहीं किया गया। अब मेकेनिक अगली बस में ही जा पाते हैं, जिससे मरम्मत में दो दिन लग जाते हैं।
विज्ञापन
नियमित बस न होने से लोग परेशान
नियमित बस सेवा न होने के कारण नौकरीपेशा लोगों, बुजुर्गों और मरीजों को अत्यधिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। स्कूल-कॉलेज जाने वाले विद्यार्थियों को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें मजबूरन निजी वाहनों में अधिक किराया चुकाकर गंतव्य तक जाना पड़ता है। इन वाहनों में अक्सर क्षमता से अधिक सवारियां होती हैं। यात्रियों को कई गुना अधिक किराया भी चुकाना पड़ता है।
विज्ञापन
क्षेत्रीय प्रबंधक का पद रिक्त पड़ा
नेरवा डिपो में लंबे समय से क्षेत्रीय प्रबंधक का पद रिक्त पड़ा है। डिपो का संचालन यातायात प्रबंधक के सहारे चल रहा है। यातायात प्रबंधक को अक्सर रोहड़ू या रिकांगपिओ का अतिरिक्त कार्यभार सौंप दिया जाता है। पिछले वर्ष उत्तराखंड में हुए एक बस दुर्घटना के समय भी नेरवा के यातायात प्रबंधक के पास रिकांगपिओ डिपो का अतिरिक्त कार्यभार था। उनकी अनुपस्थिति में डिपो चलाने की जिम्मेदारी बस अड्डा प्रभारी नेरवा के कंधों पर आ जाती है।
लोगों का कहना
नेरवा डिपो की बसों की हालत खस्ता है। बसों का ब्रेकडाउन होना रोजमर्रा की बात हो गई है। बसों के खराब हो जाने पर सवारियों को लाने के लिए दूसरी बसें भी नहीं भेजी जाती हैं। लिहाजा, सवारियों को पैदल ही गंतव्य स्थान तक सफर करना पड़ता है। परिवहन निगम को दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए नई बसें भेजनी चाहिए।।
नेरवा डिपो का हाल बेहाल है। खस्ता हाल बसों का ब्रेकडाउन होना आम बात है। परेशानी यात्रियों को झेलनी पड़ती है। लोग काफी समय से नेरवा-पांवटा साहिब-चंडीगढ़, नेरवा-दिल्ली, नेरवा-धर्मशाला बस चलाने की मांग कर रहे हैं। इस क्षेत्र से एक भी रात्रि बस सेवा नहीं चलती है। लोगों की सुविधा के लिए सरकार को इन रूटों पर बस सेवा प्राथमिकता के आधार पर चलानी चाहिए।
डिपो में बस की कमी होने के कारण कुछ रूट क्लब किए गए हैं। निगम की इलिक्टि्रक बसें आईं हैं, जिन्हें मैदानी क्षेत्रों में दिया जाना है। जिन डिपुओं में ये बसें दी जाएंगी, वहां से कुछ बसें नेरवा में भी भेजी जाएंगी। इसके बाद सभी रूट सुचारु रूप से चलेंगे।

इंजन में खराबी आ जाने के कारण उत्तराखंड में एक सप्ताह तक नेरवा डिपो की बस खड़ी रही थी।तारादेवी स

इंजन में खराबी आ जाने के कारण उत्तराखंड में एक सप्ताह तक नेरवा डिपो की बस खड़ी रही थी।तारादेवी स

इंजन में खराबी आ जाने के कारण उत्तराखंड में एक सप्ताह तक नेरवा डिपो की बस खड़ी रही थी।तारादेवी स