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Rampur Bushahar News: बागवान मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का करें इस्तेमाल
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बागवानों को सेब के रोगों की रोकथाम के लिए जागरूक करते विशेषज्ञ
रोहड़ू में सेब बागीचों में रोग नियंत्रण को लेकर वैज्ञानिकों ने दिए अहम सुझाव
रोहड़ू। शिमला जिले के सेब के बगीचों में पिछले दो साल से अल्टरनेरिया लीफ स्पॉट और मार्सोनिना ब्लॉच रोग के कारण समय से पहले पत्तों के झड़ने से उत्पादन में गिरावट दर्ज की जा रही है। इसी के मद्देनजर डॉ. वाईएस परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी ने बागवानी विभाग के सहयोग से ग्राम स्तर पर अभियान चलाया है। सेब बहुल क्षेत्रों में विशेष जागरूकता शिविर लगाए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों ने पंचायतों में पहुंचकर बागवानों को सेब की बीमारियों की रोकथाम के वैज्ञानिक उपाय बताए। उन्होंने स्पष्ट किया कि रोग मिट्टी और पौधों के समग्र स्वास्थ्य से जुड़े होते हैं, इसलिए मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। मृदा वैज्ञानिकों ने संतुलित पोषण और सही नमूना लेने की विधि पर जोर देते हुए बताया कि जांच की गई अधिकांश मिट्टी में फास्फोरस और पोटेशियम का स्तर पहले से ही उच्च पाया गया। शिविरों में माइट के वैज्ञानिक प्रबंधन पर भी विशेष मार्गदर्शन दिया गया, जिसे अल्टरनेरिया की बढ़ोतरी का एक प्रमुख कारण माना गया। कीट वैज्ञानिकों ने कीटनाशक छिड़काव से बचने, केवल आर्थिक क्षति स्तर से ऊपर ही उपयोग करने और बागवानी खनिज तेल का इस्तेमाल हाफ इंच लीफ से टाइट क्लस्टर अवस्था में बिना मिलावट करने की सलाह दी। डॉ. उषा शर्मा और डॉ. अजय बरागटा ने किसानों को फफूंदनाशकों को अन्य कृषि रसायनों के साथ न मिलाने की चेतावनी दी। साथ ही संक्रमित पत्तियों और प्रूनिंग की टहनियों को बगीचे से हटाकर गड्ढों में सड़ाने की सलाह दी गई, ताकि अगले वर्ष संक्रमण कम हो सके। वैज्ञानिकों ने रसायनों के विवेकपूर्ण उपयोग के साथ टिकाऊ और लाभकारी सेब उत्पादन पर जोर दिया।
आठ विशेषज्ञ टीमों का किया गठन
विशेष अभियान के तहत विश्वविद्यालय ने आठ विशेषज्ञ टीमों का गठन किया है। टीम में कृषि विज्ञान केंद्र शिमला, कृषि विज्ञान केंद्र सोलन, आरएचआरटी एंड एस मशोबरा और विश्वविद्यालय के पादप रोग, कीट, फल एवं मृदा वैज्ञानिक शामिल हैं। इनमें से दो टीमों ने शिमला जिले के रोहड़ू, चिड़गांव, जुब्बल और कोटखाई ब्लॉकों का दौरा किया। टीम केवीके शिमला की प्रभारी डॉ. उषा शर्मा, कीट वैज्ञानिक डॉ. वीजीएस. चंदेल और मृदा वैज्ञानिक डॉ. एन.पी. बुटेल शामिल रहे। टीम-2 में कीट वैज्ञानिक डॉ. संगीता शर्मा, पादक रोग वैज्ञानिक डॉ. अजय बरागटा और मृदा वैज्ञानिक डॉ. उपेंद्र शर्मा ने भाग लिया। संबंधित क्षेत्रों में बागवानी विभाग के अधिकारियों ने टीमों को सहयोग प्रदान किया।
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रोहड़ू। शिमला जिले के सेब के बगीचों में पिछले दो साल से अल्टरनेरिया लीफ स्पॉट और मार्सोनिना ब्लॉच रोग के कारण समय से पहले पत्तों के झड़ने से उत्पादन में गिरावट दर्ज की जा रही है। इसी के मद्देनजर डॉ. वाईएस परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी ने बागवानी विभाग के सहयोग से ग्राम स्तर पर अभियान चलाया है। सेब बहुल क्षेत्रों में विशेष जागरूकता शिविर लगाए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों ने पंचायतों में पहुंचकर बागवानों को सेब की बीमारियों की रोकथाम के वैज्ञानिक उपाय बताए। उन्होंने स्पष्ट किया कि रोग मिट्टी और पौधों के समग्र स्वास्थ्य से जुड़े होते हैं, इसलिए मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। मृदा वैज्ञानिकों ने संतुलित पोषण और सही नमूना लेने की विधि पर जोर देते हुए बताया कि जांच की गई अधिकांश मिट्टी में फास्फोरस और पोटेशियम का स्तर पहले से ही उच्च पाया गया। शिविरों में माइट के वैज्ञानिक प्रबंधन पर भी विशेष मार्गदर्शन दिया गया, जिसे अल्टरनेरिया की बढ़ोतरी का एक प्रमुख कारण माना गया। कीट वैज्ञानिकों ने कीटनाशक छिड़काव से बचने, केवल आर्थिक क्षति स्तर से ऊपर ही उपयोग करने और बागवानी खनिज तेल का इस्तेमाल हाफ इंच लीफ से टाइट क्लस्टर अवस्था में बिना मिलावट करने की सलाह दी। डॉ. उषा शर्मा और डॉ. अजय बरागटा ने किसानों को फफूंदनाशकों को अन्य कृषि रसायनों के साथ न मिलाने की चेतावनी दी। साथ ही संक्रमित पत्तियों और प्रूनिंग की टहनियों को बगीचे से हटाकर गड्ढों में सड़ाने की सलाह दी गई, ताकि अगले वर्ष संक्रमण कम हो सके। वैज्ञानिकों ने रसायनों के विवेकपूर्ण उपयोग के साथ टिकाऊ और लाभकारी सेब उत्पादन पर जोर दिया।
आठ विशेषज्ञ टीमों का किया गठन
विशेष अभियान के तहत विश्वविद्यालय ने आठ विशेषज्ञ टीमों का गठन किया है। टीम में कृषि विज्ञान केंद्र शिमला, कृषि विज्ञान केंद्र सोलन, आरएचआरटी एंड एस मशोबरा और विश्वविद्यालय के पादप रोग, कीट, फल एवं मृदा वैज्ञानिक शामिल हैं। इनमें से दो टीमों ने शिमला जिले के रोहड़ू, चिड़गांव, जुब्बल और कोटखाई ब्लॉकों का दौरा किया। टीम केवीके शिमला की प्रभारी डॉ. उषा शर्मा, कीट वैज्ञानिक डॉ. वीजीएस. चंदेल और मृदा वैज्ञानिक डॉ. एन.पी. बुटेल शामिल रहे। टीम-2 में कीट वैज्ञानिक डॉ. संगीता शर्मा, पादक रोग वैज्ञानिक डॉ. अजय बरागटा और मृदा वैज्ञानिक डॉ. उपेंद्र शर्मा ने भाग लिया। संबंधित क्षेत्रों में बागवानी विभाग के अधिकारियों ने टीमों को सहयोग प्रदान किया।
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