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भारत–न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता सेब बागवानों के लिए घातक : कौशल मुंगटा
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. बोले-शिमला का सांसद बागवानों की आवाज उठाने में असमर्थ
संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू।
जिला परिषद सदस्य एवं बागवानी एवं कृषि समिति के अध्यक्ष कौशल मुंगटा ने कहा कि भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता प्रदेश के सेब बागवानों के लिए घातक है। प्रदेश की करीब छह हजार करोड़ रुपये की सेब आधारित अर्थव्यवस्था को तबाह करने वाला है। सांसद की ओर से बागवानों को आयात शुल्क कम करने का वादा जुमला साबित हो चुका है। कौशल मुंगटा ने कहा कि इस समझौते के तहत पहले वर्ष में 32,500 टन न्यूजीलैंड का सेब मात्र 25 प्रतिशत कस्टम ड्यूटी पर आयात किया जा रहा है। बाहर से सेब का आयात अप्रैल से अगस्त के बीच सीधे तौर पर भारतीय सेब के मुख्य सीजन से टकराएगा, जिससे बागवानों को सीधा नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि समझौते के अंतर्गत न्यूजीलैंड की 95 प्रतिशत वस्तुओं पर टैरिफ समाप्त या कम कर दिया गया है। सेब पर आयात शुल्क 50 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत, नाशपाती पर 16.5 प्रतिशत और कीवी पर शुल्क पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। जब डेयरी, पशु उत्पाद, सब्जियां, बादाम और चीनी जैसे क्षेत्रों को इस समझौते से बाहर रखा गया, तो सेब बागवानों को ही क्यों बलि का बकरा बनाया गया। मुंगटा ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्यूजीलैंड के विदेश मंत्री ने भी इस समझौते को न पूरी तरह स्वतंत्र और न ही निष्पक्ष बताया। सवाल यह उठता है कि जब दूसरे देश इसका विरोध कर रहे हैं, तो भारत में इसका पूरा नुकसान बागवानों को क्यों झेलना पड़ रहा है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू।
जिला परिषद सदस्य एवं बागवानी एवं कृषि समिति के अध्यक्ष कौशल मुंगटा ने कहा कि भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता प्रदेश के सेब बागवानों के लिए घातक है। प्रदेश की करीब छह हजार करोड़ रुपये की सेब आधारित अर्थव्यवस्था को तबाह करने वाला है। सांसद की ओर से बागवानों को आयात शुल्क कम करने का वादा जुमला साबित हो चुका है। कौशल मुंगटा ने कहा कि इस समझौते के तहत पहले वर्ष में 32,500 टन न्यूजीलैंड का सेब मात्र 25 प्रतिशत कस्टम ड्यूटी पर आयात किया जा रहा है। बाहर से सेब का आयात अप्रैल से अगस्त के बीच सीधे तौर पर भारतीय सेब के मुख्य सीजन से टकराएगा, जिससे बागवानों को सीधा नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि समझौते के अंतर्गत न्यूजीलैंड की 95 प्रतिशत वस्तुओं पर टैरिफ समाप्त या कम कर दिया गया है। सेब पर आयात शुल्क 50 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत, नाशपाती पर 16.5 प्रतिशत और कीवी पर शुल्क पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। जब डेयरी, पशु उत्पाद, सब्जियां, बादाम और चीनी जैसे क्षेत्रों को इस समझौते से बाहर रखा गया, तो सेब बागवानों को ही क्यों बलि का बकरा बनाया गया। मुंगटा ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्यूजीलैंड के विदेश मंत्री ने भी इस समझौते को न पूरी तरह स्वतंत्र और न ही निष्पक्ष बताया। सवाल यह उठता है कि जब दूसरे देश इसका विरोध कर रहे हैं, तो भारत में इसका पूरा नुकसान बागवानों को क्यों झेलना पड़ रहा है।