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Rampur Bushahar News: शुरुआती चरण में संक्रमण को रोकें तो 50 प्रतिशत कम होगा नुकसान

Tue, 17 Feb 2026 11:36 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Tue, 17 Feb 2026 11:36 PM IST
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Four specialist teams deployed to combat Marsonina
जुब्बल तहसील की कठासू पंचायत  के बटाड़गलू में बागवानों को बीमारी की रोकथाम की जानकारी देते बागव
बागवानों को किया जा रहा जागरूक, समय पर पहल हुई तो 50 प्रतिशत बीमारी पर पाया जा सकता है नियंत्रण
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संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू । शिमला जिले के प्रमुख बागवानी क्षेत्रों में सेब के बगीचों में पतझड़ रोग की बढ़ती आशंका को देखते हुए विशेषज्ञों की चार टीमें सक्रिय हो गई हैं। ये टीमें गांवों में पहुंचकर बागवानों को अल्टरनेरिया और मार्सोनिना रोग की पहचान, रोकथाम और समय पर नियंत्रण के उपाय बता रही हैं। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि यह रोग पत्तियां निकलते ही प्रारंभ हो जाता है। पत्तियों पर धब्बे पड़ने से संक्रमण की शुरुआत होती है। यदि शुरुआती चरण में ही संक्रमण को नियंत्रित कर लिया जाए, तो करीब 50 प्रतिशत तक नुकसान को रोका जा सकता है। मंगलवार को एक टीम जुब्बल के कठासू, दूसरी राेहड़ू के लोअर कोटी बागी, तीसरी चौपाल और चौथी टीम रामपुर बुशहर के ननखड़ी में लोगों को जागरूक कर रही है। विशेषज्ञों के अनुसार मौसम में लगातार हो रहे बदलाव, असामान्य बारिश, अधिक नमी और तापमान में उतार-चढ़ाव के कारण सेब में पतझड़ रोग तेजी से फैलने लगा है। इस बीमारी के कारण पत्तियाें के समय से पहले झड़ने से पेड़ों की प्रकाश संश्लेषण क्षमता घटती है। इसका सीधा असर फल की गुणवत्ता, आकार और उत्पादन पर पड़ता है। मंगलवार को कृषि विज्ञान केंद्र रोहड़ू की प्रभारी डाॅ. उषा शर्मा, एंटोमोलॉजिस्ट डाॅ. विश्व चंदेल और मृदा विशेषज्ञ डाॅ. नागेंद्र बुटेल ने कठासू गांव में बागवानों के साथ बैठक कर रोग के रोकथाम की जानकारी दी। इस दौरान बागवानों को पत्तियों पर दिखने वाले शुरुआती लक्षणों की पहचान भी करवाई । डाॅ. उषा शर्मा ने बताया कि अल्टरनेरिया और मार्सोनिना रोग की शुरुआत पत्तियों पर छोटे-छोटे धब्बों से होती है, जो धीरे-धीरे बड़े होकर पत्तियों को कमजोर कर देते हैं। इसके बाद पत्तियां पीली होकर झड़ने लगती हैं। उन्होंने कहा कि बीमारी जैसे ही पत्तियां निकलती हैं, उसी समय सक्रिय हो जाती हैं। यदि बागवान शुरुआती संक्रमण को गंभीरता से लेकर समय पर नियंत्रित करें, तो रोग को आधे से अधिक स्तर तक रोका जा सकता है। एंटोमोलॉजिस्ट डाॅ. विश्व चंदेल ने बागवानों को सलाह दी है कि रोग के साथ-साथ कीट नियंत्रण पर भी ध्यान देना जरूरी है, क्योंकि कमजोर पेड़ों पर कीटों का प्रभाव तेजी से बढ़ता है। उन्होंने कहा कि बगीचों में नियमित निगरानी जरूरी है और पत्तियों पर रोग के शुरुआती धब्बे दिखते ही उचित कदम उठाए जाएं। मृदा विशेषज्ञ डाॅ. नागेंद्र बुटेल ने मिट्टी की उर्वरता और संतुलित पोषण को भी रोग नियंत्रण से जोड़ते हुए कहा कि यदि मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी होगी, तो पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता घट जाएगी, इसलिए बागवानों को मृदा परीक्षण कराकर संतुलित खाद व उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए। विशेषज्ञों ने बागवानों को सलाह दी कि बगीचों में हवा का उचित संचार बनाए रखने के लिए छंटाई समय पर करें, संक्रमित पत्तियों व टहनियों को हटाकर नष्ट करें तथा अत्यधिक नमी से बचाव के लिए जल निकासी व्यवस्था दुरुस्त रखें।
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