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Rampur Bushahar News: बंगलूरू की लाली छायी, फीका पड़ा पहाड़ी टमाटर
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दो साल से घाटे में उत्पादन, किसानों को बीज और कीटनाशकों का खर्च भी निकालना मुश्किल
दीपक सूद
नेरवा ( रोहडू )।
सब्जी मंडियों में बंगलूरू टमाटर के आगे पहाड़ी टमाटर की लाली फीकी पड़ रही है। बंगलूरू से आने वाले टमाटर ने हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के टमाटर उत्पादकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पिछले दो वर्षों से टमाटर उत्पादकों को लगातार घाटा उठाना पड़ रहा है। स्थिति यह है कि किसानों को बीज और कीटनाशकों पर किया गया खर्च भी वापस नहीं मिल पा रहा है। इस वर्ष कई किसानों ने मंडी तक टमाटर पहुंचाने का खर्च भी न निकलता देख अपनी फसल खेतों में ही सड़ने देना बेहतर समझा। नेरवा सब्जी मंडी के प्रमुख आढ़ती ओम प्रकाश चौहान ने बताया कि इस वर्ष कई किसान बीज और कीटनाशक खरीदने के लिए आढ़तियों से लिया गया अग्रिम पैसा तक वापस नहीं कर पाए हैं। उन्होंने बताया कि दो वर्ष पहले तक बंगलूरू का टमाटर सीजन हिमाचल और उत्तराखंड के टमाटर सीजन के करीब डेढ़ महीने बाद शुरू होता था। बरसात शुरू होते ही मैदानी क्षेत्रों में टमाटर का उत्पादन कम होने लगता था, जिससे पहाड़ी क्षेत्रों के टमाटर को मंडियों में बेहतर दाम मिल जाते थे लेकिन पिछले दो वर्षों से बंगलूरू का टमाटर भी हिमाचल और उत्तराखंड के टमाटर सीजन के साथ ही मंडियों में पहुंचने लगा है। इससे स्थानीय टमाटर की मांग और कीमत दोनों प्रभावित हुई हैं। ओम प्रकाश चौहान के अनुसार, किसानों द्वारा घटिया किस्म के बीजों का इस्तेमाल करना भी कम उत्पादन और खराब गुणवत्ता का एक कारण है। लागत कम करने के प्रयास में कुछ किसान हल्की किस्म के बीज इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे फसल कम होने के साथ बीमारियों का प्रकोप बढ़ रहा है और टमाटर की गुणवत्ता और टिकाऊपन भी प्रभावित हो रहा है। उन्होंने कहा कि हिम सोना और अभिनव जैसी बेहतर किस्मों के बीज इस्तेमाल करने वाले किसान कम उत्पादन के बावजूद अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं। किसानों ने सरकार से टमाटर की खेती को लाभकारी बनाने के लिए बाजार व्यवस्था मजबूत करने और बेहतर किस्म के बीज उपलब्ध करवाने की मांग की है। संवाद
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दीपक सूद
नेरवा ( रोहडू )।
सब्जी मंडियों में बंगलूरू टमाटर के आगे पहाड़ी टमाटर की लाली फीकी पड़ रही है। बंगलूरू से आने वाले टमाटर ने हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के टमाटर उत्पादकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पिछले दो वर्षों से टमाटर उत्पादकों को लगातार घाटा उठाना पड़ रहा है। स्थिति यह है कि किसानों को बीज और कीटनाशकों पर किया गया खर्च भी वापस नहीं मिल पा रहा है। इस वर्ष कई किसानों ने मंडी तक टमाटर पहुंचाने का खर्च भी न निकलता देख अपनी फसल खेतों में ही सड़ने देना बेहतर समझा। नेरवा सब्जी मंडी के प्रमुख आढ़ती ओम प्रकाश चौहान ने बताया कि इस वर्ष कई किसान बीज और कीटनाशक खरीदने के लिए आढ़तियों से लिया गया अग्रिम पैसा तक वापस नहीं कर पाए हैं। उन्होंने बताया कि दो वर्ष पहले तक बंगलूरू का टमाटर सीजन हिमाचल और उत्तराखंड के टमाटर सीजन के करीब डेढ़ महीने बाद शुरू होता था। बरसात शुरू होते ही मैदानी क्षेत्रों में टमाटर का उत्पादन कम होने लगता था, जिससे पहाड़ी क्षेत्रों के टमाटर को मंडियों में बेहतर दाम मिल जाते थे लेकिन पिछले दो वर्षों से बंगलूरू का टमाटर भी हिमाचल और उत्तराखंड के टमाटर सीजन के साथ ही मंडियों में पहुंचने लगा है। इससे स्थानीय टमाटर की मांग और कीमत दोनों प्रभावित हुई हैं। ओम प्रकाश चौहान के अनुसार, किसानों द्वारा घटिया किस्म के बीजों का इस्तेमाल करना भी कम उत्पादन और खराब गुणवत्ता का एक कारण है। लागत कम करने के प्रयास में कुछ किसान हल्की किस्म के बीज इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे फसल कम होने के साथ बीमारियों का प्रकोप बढ़ रहा है और टमाटर की गुणवत्ता और टिकाऊपन भी प्रभावित हो रहा है। उन्होंने कहा कि हिम सोना और अभिनव जैसी बेहतर किस्मों के बीज इस्तेमाल करने वाले किसान कम उत्पादन के बावजूद अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं। किसानों ने सरकार से टमाटर की खेती को लाभकारी बनाने के लिए बाजार व्यवस्था मजबूत करने और बेहतर किस्म के बीज उपलब्ध करवाने की मांग की है। संवाद