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Rampur Bushahar News: सफेद रूई से फीकी पड़ रही सेब की लाली

Sun, 26 Jul 2026 11:32 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Sun, 26 Jul 2026 11:32 PM IST
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Apple trees in the apple-growing regions of Nirmand affected by the woolly aphid infestation
निरमंड के सेब बहुल क्षेत्र में सेब के पेड़ में लगे वूली एफिड रोग को दर्शाता बागवान। संवाद
निरमंड के सेब बहुल क्षेत्रों में वूली एफिड रोग की चपेट में आए सेब के पेड़
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वूली एफिड के प्राकृतिक शत्रुओं के संरक्षण पर बागवान दें जोर : चौहान
संवाद न्यूज एजेंसी
निरमंड(कुल्लू)। उपमंडल निरमंड के सेब बहुल क्षेत्रों में सफेद रूई (वूली एफिड) से सेब की लाली फीकी पड़ती जा रही है। सेब बगीचों में वूली एफिड रोग का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। हालांकि, बागवानी विभाग इससे बचाव के लिए बागवानों को प्रशिक्षित कर रहे हैं। विभाग ने बागवानों से बगीचे में नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों के अधिक इस्तेमाल से बचने की सलाह दी है। साथ ही बागवानों से वूली एफिड के प्राकृतिक शत्रुओं के संरक्षण पर बल देने का आह्वान किया है। निरमंड क्षेत्र के सेब बहुल क्षेत्रों में वूली एफिड कीट का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। सेब के पेड़ों के घनत्व और संक्रमित स्थानों में यह रोग लग रहा है। बागवान सेब बगीचों में फैलते जा रहे इस रोग के निवारण की विभाग के अधिकारियों से सलाह ले रहे हैं। इस स्थिति को देखते हुए बागवानी विभाग आनी ने बागवानों के लिए विशेष सलाह जारी की है। बागवानी विभाग आनी के विषयवाद विशेषज्ञ डॉ. बलवीर चौहान ने बताया कि वूली एफिड की पहचान पेड़ों के तनों पर घावों से होती है। यह छंटाई वाले स्थानों, शाखाओं के जोड़ और जड़ों पर सफेद रूई जैसे मोमी आवरण के रूप में दिखाई देता है। यह कीट संक्रमित पौधों, हवा और सिंचाई के पानी से फैलता है। छंटाई में इस्तेमाल होने वाले औजार भी इसके फैलाव का कारण बनते हैं। वूली एफिड तने, शाखाओं और जड़ों का रस चूसता है। इससे वहां गांठ जैसी सूजन पैदा हो जाती है। कीट के छोड़े गए चिपचिपे रस पर काली फफूंद पैदा होती है। यह पत्तियों की भोजन बनाने की क्षमता को प्रभावित करती है। जड़ों में अधिक संक्रमण होने पर पेड़ों की जमीन पर पकड़ कमजोर हो जाती है और धीरे-धीरे पेड़ सूखने लगते हैं।

संक्रमित टहनियों की करें छंटाई, नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों का न करें उपयोग
बागवानी विभाग ने बागवानों को सलाह दी गई है कि बगीचे में अधिक नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों का उपयोग न करें। इससे वूली एफिड का प्रकोप बढ़ सकता है। रोग से संक्रमित टहनियों की समय पर छंटाई कर नष्ट करना चाहिए। मुख्य तने के पास निकलने वाली अनावश्यक शाखाओं को नियमित रूप से हटाते रहना भी जरूरी है। बागवानों से वूली एफिड के प्राकृतिक शत्रुओं जैसे परजीवी ततैया और गुबरैला के संरक्षण पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बिना आवश्यकता रासायनिक दवाओं का अंधाधुंध छिड़काव नहीं करना चाहिए। अधिक प्रकोप होने पर अनुशंसित कीटनाशक का तेज दबाव से सीधे प्रभावित स्थानों पर छिड़काव करें। इससे कीट का मोमी आवरण टूट सकेगा। जड़ों में गंभीर संक्रमण की स्थिति में कृषि विज्ञान केंद्र या बागवानी अधिकारी की सलाह पर ही मिट्टी में दवा का उपचार करें।
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