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चेरी का सीजन जोरों पर, बागवान खुश
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अनिल कंवर
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कुमारसैन (रामपुर बुशहर)। क्षेत्र में चेरी का सीजन इन दिनों जोरों पर चल रहा है। सेब उत्पादकों का रुझान चेरी की ओर भी काफी बढ़ने लगा है। सेब की तुलना में चेरी उत्पादन में खर्च कम और आमदनी अधिक है। इलाके के बागवान चेरी चंडीगढ़ और दिल्ली की मंडियों में भेज रहे हैं। क्षेत्र के कोटगढ़, भुट्टी, कुमारसैन, भड़गांव, बगारी, धनापानी, छविशी और सांगरी आदि क्षेत्रों में चेरी का सीजन पूरे यौवन पर है।
इन दिनों मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में चेरी का सीजन शुरू हो चुका है। बागवानों को इसके दाम भी बेहतर मिल रहे हैं। चेरी के खरीदार बागवानों को घरद्वार पर ही अच्छा दाम दे रहे हैं, जिससे बागवानों को चेरी मंडी नहीं भेजनी पड़ रही। घर द्वार पर ही चेरी का प्रति डिब्बा 100 से 250 रुपये तक बिक रहा है।
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इस संबंध में बागवान विकास कंवर, दलीप ठाकुर, सुनील ठाकुर, विनोद ठाकुर, राकेश मेहता, निटू ठाकुर, वरूण और मनोज चौहान के अनुसार सेब की तुलना में चेरी उत्पादन में खर्च कम और आमदनी अधिक है। खरीदार लाल चंद डोगरा, मुनिश मखैक, चमन कुमार और कुलदीप कुमार के अनुसार चैरी के दाम 100 से 250 तक लिए जा रहे हैं। गौरतलब है कि मीठी चेरी की खेती यूरोप के देशों और एशिया के टर्की में दशकों से की जा रही है।
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विश्व में फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, स्विट्जरलैंड, टर्की और अमरीका चैरी पैदा करने वाले प्रमुख देशों की सूची में शामिल हैं। भारत में अंग्रेजों ने चेरी की खेती का चलन कश्मीर और हिमाचल से आरंभ किया था। हिमाचल में अधिकतर बागबान चेरी की सुधरी हुई किस्मों के पौधे लगाने लगे हैं, लेकिन प्रदेश में अभी भी तकनीकी रूप से पिछड़ने के कारण चेरी की खेती अपेक्षा के अनुरूप विकसित नहीं हो पाई है। इसका मुख्य कारण चेरी का रूट स्टॉक उपलब्ध न होना है।