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रोपा वैली में पारंपरिक पर्व तीरंदाजी शुरू
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रोपा वैली में पारंपरिक पर्व तीरंदाजी का आगाज
मां दुर्गा स्वर्ग में अन्य देवी-देवताओं के साथ खेलती हैं पासा
वार्षिक शुभ एवं अशुभ फलादेश का करते हैं निर्णय
अमर उजाला ब्यूरो
रिकांगपिओ (किन्नौर)। जनजातीय जिला किन्नौर में आधुनिकता के दौर में भी सदियों पुरानी परंपरा को कई गांव में संजोया हुआ है। जिले के पूह खंड के रोपा गांव में तीरंदाज पर्व की परंपरा सदियों पुरानी चली आ रही है। आज भी इस पर्व को धूमधाम से मनाया जाता है।
मान्यता है कि रोपा वासियों की देवी मां दुर्गा माघ माह के दूसरे पखवाड़े 16 माघ से लेकर 30 माघ तक स्वर्ग यात्रा पर जाती हैं। उस दौरान मां दुर्गा स्वर्ग में अन्य देवी देवताओं के साथ पासा (स्थानीय बोली छोलो) खेलते हैं। उस पासा खेल में कृषि व्यापार देश-विदेश को लाभ, प्राकृतिक आपदा, सामाजिक एवं अपने गांव के हित इत्यादि वार्षिक शुभ एवं अशुभ फल का निर्णय पासा खेल में हार या जीत के आधार पर होता है। जीत और हार का फलादेश मां दुर्गा के गूर माघ माह के अंतिम दिन खेल द्वारा घोषणा कर किया जाता है।
रोपा निवासी चरण सिंह नेगी और देवी सिंह ने बताया कि दुर्गा माता के स्वर्ग भ्रमण के साथ ही रोपा गांव में तीरंदाज खेल पर्व का प्रारंभ होता है। मां दुर्गा के स्वर्ग वापसी के साथ ही इस खेल का समापन होता है। मान्यता है कि मां दुर्गा के स्वर्ग भ्रमण पर जाते ही उनकी अनुपस्थिति के दौरान अनिष्ट और बुरी शक्तियों के प्रकोप को नष्ट करने के उद्देश्य से रोपा गांव में तीरंदाजी खेल पर्व का आयोजन होता है। इस खेल में गांव के प्रत्येक परिवार से एक पुरुष सदस्य का भाग लेना अनिवार्य होता है, जो परिवार इस खेल में भाग नहीं लेता बतौर जुर्माना देना पड़ता है। तीर चलाने का लक्ष्य दो दिशाओं पूर्व और पश्चिम की तरफ होता है। दोनों दिशाओं की दूरी लगभग 100 फीट या इससे भी अधिक होती है। इस पर्व को दिन में 2 बजे से 6:30 बजे तक प्रतिदिन खेला जाता है। एक पखवाड़े तक चलने वाली तीरंदाजी खेल पर्व के आखिरी दिन समापन समारोह का आयोजन किया जाता है। इस दौरान ढोल नगाड़ों की थाप से प्रोत्साहित होकर प्रत्येक प्रतिभागी लक्ष्य को भेदने को आतुर होते हैं। अंत में दल का प्रत्येक प्रतिभागी एक-एक तीर अपने-अपने मुखिया को लक्ष्य को साधने को देते हैं। दोनों ही दल के मुखिया खिलाड़ियों से प्राप्त तीर का उपयोग कर उपरांत विजेता दल की घोषणा होती है।
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मां दुर्गा स्वर्ग में अन्य देवी-देवताओं के साथ खेलती हैं पासा
वार्षिक शुभ एवं अशुभ फलादेश का करते हैं निर्णय
अमर उजाला ब्यूरो
रिकांगपिओ (किन्नौर)। जनजातीय जिला किन्नौर में आधुनिकता के दौर में भी सदियों पुरानी परंपरा को कई गांव में संजोया हुआ है। जिले के पूह खंड के रोपा गांव में तीरंदाज पर्व की परंपरा सदियों पुरानी चली आ रही है। आज भी इस पर्व को धूमधाम से मनाया जाता है।
मान्यता है कि रोपा वासियों की देवी मां दुर्गा माघ माह के दूसरे पखवाड़े 16 माघ से लेकर 30 माघ तक स्वर्ग यात्रा पर जाती हैं। उस दौरान मां दुर्गा स्वर्ग में अन्य देवी देवताओं के साथ पासा (स्थानीय बोली छोलो) खेलते हैं। उस पासा खेल में कृषि व्यापार देश-विदेश को लाभ, प्राकृतिक आपदा, सामाजिक एवं अपने गांव के हित इत्यादि वार्षिक शुभ एवं अशुभ फल का निर्णय पासा खेल में हार या जीत के आधार पर होता है। जीत और हार का फलादेश मां दुर्गा के गूर माघ माह के अंतिम दिन खेल द्वारा घोषणा कर किया जाता है।
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रोपा निवासी चरण सिंह नेगी और देवी सिंह ने बताया कि दुर्गा माता के स्वर्ग भ्रमण के साथ ही रोपा गांव में तीरंदाज खेल पर्व का प्रारंभ होता है। मां दुर्गा के स्वर्ग वापसी के साथ ही इस खेल का समापन होता है। मान्यता है कि मां दुर्गा के स्वर्ग भ्रमण पर जाते ही उनकी अनुपस्थिति के दौरान अनिष्ट और बुरी शक्तियों के प्रकोप को नष्ट करने के उद्देश्य से रोपा गांव में तीरंदाजी खेल पर्व का आयोजन होता है। इस खेल में गांव के प्रत्येक परिवार से एक पुरुष सदस्य का भाग लेना अनिवार्य होता है, जो परिवार इस खेल में भाग नहीं लेता बतौर जुर्माना देना पड़ता है। तीर चलाने का लक्ष्य दो दिशाओं पूर्व और पश्चिम की तरफ होता है। दोनों दिशाओं की दूरी लगभग 100 फीट या इससे भी अधिक होती है। इस पर्व को दिन में 2 बजे से 6:30 बजे तक प्रतिदिन खेला जाता है। एक पखवाड़े तक चलने वाली तीरंदाजी खेल पर्व के आखिरी दिन समापन समारोह का आयोजन किया जाता है। इस दौरान ढोल नगाड़ों की थाप से प्रोत्साहित होकर प्रत्येक प्रतिभागी लक्ष्य को भेदने को आतुर होते हैं। अंत में दल का प्रत्येक प्रतिभागी एक-एक तीर अपने-अपने मुखिया को लक्ष्य को साधने को देते हैं। दोनों ही दल के मुखिया खिलाड़ियों से प्राप्त तीर का उपयोग कर उपरांत विजेता दल की घोषणा होती है।
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