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खेतों से बंदरों को भगा रहे गेंदा और गेहूं
अमर उजाला, शिमला
Updated Sun, 15 Dec 2013 01:12 PM IST
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बंदरों की समस्या से परेशान किसानों के लिए राहत भरी खबर है।
एक तो उत्पाती बंदरों से फसल को बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने गेंदा फूल तलाशा है।
दूसरा, ऐसा गेहूं बीज मिला गया है, जिसकी गंध सूंघकर बंदर उलटे पांव लौट रहे हैं।
नौणी विश्वविद्यालय के पुष्प एवं स्थल संदर्भ विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. वाईसी गुप्ता का दावा है कि अफ्रीकन गेंदा फूल (मैरीगोल्ड, टैगिटेस इरेक्टा) से बंदरों की समस्या से निजात मिल सकती है।
इस प्रजाति के फूल से निकलने वाला तेल बंदरों के शरीर में खुजली पैदा करता है और इसकी तीखी गंध से बंदर खेत में नहीं फटकते हैं।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2004 से चल रहे शोध को अब सफलता मिली है। खेत के चारों ओर इस फूल का बाड़ लगाने से बंदर खेत में दाखिल नहीं होते हैं।
किसान जागरूकता शिविर, नौणी में जुब्बड़हट्टी (शिमला) से आए रामगोपाल ठाकुर ने बताया कि इस गेंदा का प्रयोग मक्के के खेतों में किया। जैसे ही बंदर खेत तक पहुंचे उन्हें खुजली शुरू हुई और भाग गए।
यहीं आए चंबा के सरू के दीवान चंद के मुताबिक वैज्ञानिकों की इस सलाह पर उन्होंने घर से दूरदराज के खेतों में इस फूल के बाड़ लगाए। वहां अब बंदर आतंक नहीं मचाते।
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दूसरी तरफ कृषि अनुसंधान केंद्र, धौलाकुआं ने किसानों से लेकर ट्रिटी कायल किस्म का गेहूं बोया, जो खेतों से बंदरों को भगाने सफल रहा है।
किसानों ने भी बताया कि इस किस्म का गेहूं बोने के बाद बंदरों ने कई बार खेत में आने की कोशिश की, किंतु उसकी गंध सूंघते ही वे अपनी दिशा बदल ली।
हरियाणा, उत्तर प्रदेश तथा पंजाब में इस किस्म का बीज प्रति क्विंटल तीन हजार रुपये में मिल रहा है।
50 ग्राम बीज एक बीघा के लिए पर्याप्त
नौणी विवि के विभागाध्यक्ष का कहना है कि यह गेंदा बीज 5000 रुपये किलो नौणी विवि में किसानों को मुहैया करवाया जा रहा है। 50 ग्राम बीज एक बीघा खेत के लिए पर्याप्त है।
ट्रिटी कायल नाम का यह गेहूं बीज फिलहाल प्रयोग के तौर पर जंगल के समीप खेतों में बीजा गया है। इसे कुछ किसानों ने हरियाणा से मंगवाया है। अंकुरण के दौरान बंदर इसे नहीं खा रहे हैं।
-डॉ. धनवीर, सह निदेशक, पर्वतीय अनुसंधान केंद्र, धौलाकुआं
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एक तो उत्पाती बंदरों से फसल को बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने गेंदा फूल तलाशा है।
दूसरा, ऐसा गेहूं बीज मिला गया है, जिसकी गंध सूंघकर बंदर उलटे पांव लौट रहे हैं।
नौणी विश्वविद्यालय के पुष्प एवं स्थल संदर्भ विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. वाईसी गुप्ता का दावा है कि अफ्रीकन गेंदा फूल (मैरीगोल्ड, टैगिटेस इरेक्टा) से बंदरों की समस्या से निजात मिल सकती है।
इस प्रजाति के फूल से निकलने वाला तेल बंदरों के शरीर में खुजली पैदा करता है और इसकी तीखी गंध से बंदर खेत में नहीं फटकते हैं।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2004 से चल रहे शोध को अब सफलता मिली है। खेत के चारों ओर इस फूल का बाड़ लगाने से बंदर खेत में दाखिल नहीं होते हैं।
किसान जागरूकता शिविर, नौणी में जुब्बड़हट्टी (शिमला) से आए रामगोपाल ठाकुर ने बताया कि इस गेंदा का प्रयोग मक्के के खेतों में किया। जैसे ही बंदर खेत तक पहुंचे उन्हें खुजली शुरू हुई और भाग गए।
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यहीं आए चंबा के सरू के दीवान चंद के मुताबिक वैज्ञानिकों की इस सलाह पर उन्होंने घर से दूरदराज के खेतों में इस फूल के बाड़ लगाए। वहां अब बंदर आतंक नहीं मचाते।
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दूसरी तरफ कृषि अनुसंधान केंद्र, धौलाकुआं ने किसानों से लेकर ट्रिटी कायल किस्म का गेहूं बोया, जो खेतों से बंदरों को भगाने सफल रहा है।
किसानों ने भी बताया कि इस किस्म का गेहूं बोने के बाद बंदरों ने कई बार खेत में आने की कोशिश की, किंतु उसकी गंध सूंघते ही वे अपनी दिशा बदल ली।
हरियाणा, उत्तर प्रदेश तथा पंजाब में इस किस्म का बीज प्रति क्विंटल तीन हजार रुपये में मिल रहा है।
50 ग्राम बीज एक बीघा के लिए पर्याप्त
नौणी विवि के विभागाध्यक्ष का कहना है कि यह गेंदा बीज 5000 रुपये किलो नौणी विवि में किसानों को मुहैया करवाया जा रहा है। 50 ग्राम बीज एक बीघा खेत के लिए पर्याप्त है।
ट्रिटी कायल नाम का यह गेहूं बीज फिलहाल प्रयोग के तौर पर जंगल के समीप खेतों में बीजा गया है। इसे कुछ किसानों ने हरियाणा से मंगवाया है। अंकुरण के दौरान बंदर इसे नहीं खा रहे हैं।
-डॉ. धनवीर, सह निदेशक, पर्वतीय अनुसंधान केंद्र, धौलाकुआं