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हिमाचल: बारिश ही नहीं, मिट्टी की नमी भी बताएगी भूस्खलन का खतरा, आईआईटी मंडी ने तैयार किया नया मॉडल
Tue, 15 Sep 2026 11:05 AM IST
Ankesh Dogra
संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी।
संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी।
Published by: Ankesh Dogra
Updated Tue, 15 Sep 2026 11:05 AM IST
सार
पहाड़ों में भूस्खलन का खतरा केवल बारिश की मात्रा से नहीं, बल्कि मिट्टी में मौजूद नमी से भी बढ़ सकता है। आईआईटी मंडी और अमेरिका के इडाहो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने भारतीय हिमालय क्षेत्र के लिए नया डायनेमिक मॉडल तैयार किया है। इसमें बारिश, मिट्टी की नमी, ढलान और सड़क व नदी-नालों से दूरी जैसे कारकों को शामिल किया गया है। मॉडल की मदद से 100 मीटर के स्तर पर रोजाना भूस्खलन की संवेदनशीलता का आकलन किया जा सकेगा।
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आईआईटी मंडी
- फोटो : संवाद
विस्तार
पहाड़ों में भूस्खलन का खतरा केवल बारिश की मात्रा से तय नहीं होता। कई बार बारिश थमने के बाद भी पहाड़ों के खिसकने का खतरा बना रहता है। इसकी एक बड़ी वजह मिट्टी में मौजूद नमी हो सकती है। इसी पहलू को ध्यान में रखते हुए आईआईटी मंडी और अमेरिका के इडाहो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने भारतीय हिमालय क्षेत्र में भूस्खलन की संवेदनशीलता का आकलन करने के लिए नया डायनेमिक मॉडल तैयार किया है। इसमें बारिश और मिट्टी की नमी के साथ पहाड़ की ढलान, सड़क तथा नदी-नालों से दूरी को भी शामिल किया गया है।
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आईआईटी मंडी के सलिल शर्मा, सिद्दीक बरभुइया, विवेक गुप्ता और डॉ. कला वी उदय तथा अमेरिका के इडाहो विश्वविद्यालय के शुभंकर दास ने यह शोध किया है। यह शोध वर्ष 2026 में ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं ने नासा के वैश्विक भूस्खलन अभिलेख में दर्ज आंकड़ों के आधार पर भारतीय हिमालय क्षेत्र में 12 मार्च 2007 से 28 जुलाई 2014 के बीच हुए बारिश से जुड़े भूस्खलनों का अध्ययन किया। इस अवधि में कुल 491 भूस्खलन दर्ज किए गए। इनमें से 379 घटनाएं जून से सितंबर के बीच हुईं। अध्ययन में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के साथ जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को शामिल किया गया।
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हिमालय जैसे दुर्गम क्षेत्र में हर जगह वर्षामापी केंद्र उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में शोधकर्ताओं ने अलग-अलग स्रोतों से मिलने वाले बारिश के आंकड़ों की विश्वसनीयता जांची। इसके लिए 25 वर्षामापी केंद्रों के वास्तविक आंकड़ों की तुलना छह अलग-अलग वर्षा आंकड़ा प्रणालियों से की गई। अध्ययन में यूरोपीय केंद्र की पुनर्विश्लेषण आधारित वर्षा प्रणाली को बारिश के आकलन के लिए सबसे बेहतर पाया गया। 30 दिन की संचयी बारिश के मामले में इसका वास्तविक वर्षामापी आंकड़ों से सहसंबंध 0.69 रहा। इसके बाद इसी वर्षा आंकड़े को आगे के विश्लेषण में इस्तेमाल किया गया।
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मिट्टी की नमी भी बनी अहम कड़ी
मिट्टी में मौजूद नमी को समझने के लिए शोधकर्ताओं ने उपग्रह आधारित आंकड़ों की तुलना हिमाचल प्रदेश के जीभी में लगाए गए मिट्टी की नमी मापक यंत्र के आंकड़ों से की। जमीन की 0 से 10 सेंटीमीटर गहरी परत में एक आंकड़ा स्रोत का सहसंबंध 0.92। जबकि दूसरे का 0.95 रहा। इससे शोधकर्ताओं को मिट्टी की नमी के उपग्रह आधारित आंकड़ों को मॉडल में इस्तेमाल करने का आधार मिला।
10 साल के आंकड़ों से सामने आया जुलाई-अगस्त का खतरा
भूस्खलन की बदलती संवेदनशीलता समझने के लिए 2014 से 2023 यानी 10 साल के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें हर महीने की अधिकतम दैनिक बारिश और तीन दिन की औसत मिट्टी की नमी को आधार बनाया गया। अध्ययन में जुलाई और अगस्त के दौरान भूस्खलन की संवेदनशीलता सबसे अधिक पाई गई। जबकि नवंबर सबसे कम संवेदनशील महीना रहा। अध्ययन के अनुसार जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश के कई हिस्सों में बारिश और मिट्टी की नमी जैसी परिस्थितियों के कारण भूस्खलन की संवेदनशीलता बढ़ सकती है। हिमाचल प्रदेश के बड़े हिस्से में पूरे वर्ष संवेदनशीलता बनी रहने की बात भी सामने आई है।
रोजाना 100 मीटर के स्तर पर होगा आकलन
शोध में तैयार डायनेमिक मॉडल की खासियत यह है कि इससे 100 मीटर के स्तर पर रोजाना भूस्खलन की संवेदनशीलता का आकलन किया जा सकता है। इसमें बारिश, मिट्टी की नमी, ढलान तथा सड़क और नदी-नालों से दूरी को एक साथ देखा जाता है। मॉडल में मौसम से जुड़े बदलते कारकों के साथ जमीन की स्थायी परिस्थितियों को भी महत्व दिया गया है।
भविष्य में मौसम के पूर्वानुमान से मिलने वाली बारिश और मॉडल से निकाली गई मिट्टी की नमी के आधार पर संवेदनशीलता के मानचित्र रोजाना तैयार किए जा सकते हैं। इससे भूस्खलन संभावित इलाकों की पहचान और समय रहते चेतावनी देने में मदद मिल सकती है। हालांकि यह मॉडल मुख्य रूप से उथले भूस्खलनों के आकलन के लिए है और गहरे भूस्खलनों के लिए अलग प्रक्रिया आधारित मॉडल की जरूरत होगी।- डॉ. कला वी उदय, अध्यक्ष, जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन केंद्र, आईआईटी मंडी।
शोध में तैयार डायनेमिक मॉडल की खासियत यह है कि इससे 100 मीटर के स्तर पर रोजाना भूस्खलन की संवेदनशीलता का आकलन किया जा सकता है। इसमें बारिश, मिट्टी की नमी, ढलान तथा सड़क और नदी-नालों से दूरी को एक साथ देखा जाता है। मॉडल में मौसम से जुड़े बदलते कारकों के साथ जमीन की स्थायी परिस्थितियों को भी महत्व दिया गया है।
भविष्य में मौसम के पूर्वानुमान से मिलने वाली बारिश और मॉडल से निकाली गई मिट्टी की नमी के आधार पर संवेदनशीलता के मानचित्र रोजाना तैयार किए जा सकते हैं। इससे भूस्खलन संभावित इलाकों की पहचान और समय रहते चेतावनी देने में मदद मिल सकती है। हालांकि यह मॉडल मुख्य रूप से उथले भूस्खलनों के आकलन के लिए है और गहरे भूस्खलनों के लिए अलग प्रक्रिया आधारित मॉडल की जरूरत होगी।- डॉ. कला वी उदय, अध्यक्ष, जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन केंद्र, आईआईटी मंडी।