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Mandi News: बूढ़ी दिवाली में झूमे लोग, उमड़ा हुजूम
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थाटा डाहर में बूढ़ी दिवाली के आयोजन पर मशालें जलाए स्थानीय लोग। संवाद
थुनाग/बालीचौकी (मंडी)। सराज में बूढ़ी दिवाली मनाई गई। सराज में इस त्योहार को आराध्य देव शैटीनाग की जगीश के तौर पर मनाया जाता है। क्षेत्र की पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बूढ़ी दिवाली का आयोजन बुरी ताकतों और आसुरी शक्तियों को भगाने के लिए दैवीय अनुष्ठान के रूप में किया जाता है। मान्यता है कि शिव-शक्ति का सामूहिक आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए इस उत्सव को मनाया जाता है। बूढ़ी दिवाली एक साल चेत में तो दूसरे साल थाटा डाहर क्षेत्र में आयोजित की जाती है।
बूढ़ी दियाली इसलिए भी अनूठी है क्योंकि इसकी शुरुआत विशेष बस्ती से होती है जिसे डमराची कहते हैं। वहां से देवता के हारियान भाइयों के साथ नाचते गाते थाटा गांव पहुंचते हैं, जहां अग्नि का फेर कर सामान्य जाति के लोग अपनी मशालें प्रज्वलित कर गांव की ओर कूच करते हैं। पहले से तैयार लोग उनका जोरदार स्वागत करते हैं। इस दौरान मशालों से दोनों गांववालों में लड़ाई होती है, आतिशबाजी भी की जाती है। यहां से काफिला थाटा के लिए निकलता है। थाटा गांव में एक अग्निकुंड बनाया जाता है।
जैसे ही काफिला वहां पहुंचता है तो गूर की खेल इस बात का संकेत होता है कि दैवीय शक्ति भी साथ चलते हुए यहां पहुंच चुकी है। अग्निकुंड को प्रज्वलित किया जाता है। देवलु मशालें लेकर उसकी परिक्रमा करते हैं और अपनी मशालें अग्निकुंड के हवाले करते हैं। इसके बाद नाटी का दौर सुबह तक चलता है। शैटीनाग के कारदार हिम्मत राम ने बताया कि बूढ़ी दिवाली देखने आए लोग इसका भरपूर आनंद उठाते हैं। ग्रामीणों ने मेहमानों का स्वागत करने के लिए पारंपरिक पकवान बनाए।
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गांव-गांव घूमती करंडी
देवता की करंडी जिसे पाचड़ु कहते हैं, गांव-गांव घूमकर शैटाधार पहुंचाई जाती है। वहां से देवता का आशीर्वाद लेकर पूरी हार के सभी गांवों में पाचड़ु घुमाया जाता है और घरों में पवित्र पाची के छींटे डाले जाते हैं। बूढ़ी दिवाली का आयोजन मुख्य तौर से सराज के आराध्य देव शैटीनाग की जगीश होती है।
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बूढ़ी दियाली इसलिए भी अनूठी है क्योंकि इसकी शुरुआत विशेष बस्ती से होती है जिसे डमराची कहते हैं। वहां से देवता के हारियान भाइयों के साथ नाचते गाते थाटा गांव पहुंचते हैं, जहां अग्नि का फेर कर सामान्य जाति के लोग अपनी मशालें प्रज्वलित कर गांव की ओर कूच करते हैं। पहले से तैयार लोग उनका जोरदार स्वागत करते हैं। इस दौरान मशालों से दोनों गांववालों में लड़ाई होती है, आतिशबाजी भी की जाती है। यहां से काफिला थाटा के लिए निकलता है। थाटा गांव में एक अग्निकुंड बनाया जाता है।
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जैसे ही काफिला वहां पहुंचता है तो गूर की खेल इस बात का संकेत होता है कि दैवीय शक्ति भी साथ चलते हुए यहां पहुंच चुकी है। अग्निकुंड को प्रज्वलित किया जाता है। देवलु मशालें लेकर उसकी परिक्रमा करते हैं और अपनी मशालें अग्निकुंड के हवाले करते हैं। इसके बाद नाटी का दौर सुबह तक चलता है। शैटीनाग के कारदार हिम्मत राम ने बताया कि बूढ़ी दिवाली देखने आए लोग इसका भरपूर आनंद उठाते हैं। ग्रामीणों ने मेहमानों का स्वागत करने के लिए पारंपरिक पकवान बनाए।
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गांव-गांव घूमती करंडी
देवता की करंडी जिसे पाचड़ु कहते हैं, गांव-गांव घूमकर शैटाधार पहुंचाई जाती है। वहां से देवता का आशीर्वाद लेकर पूरी हार के सभी गांवों में पाचड़ु घुमाया जाता है और घरों में पवित्र पाची के छींटे डाले जाते हैं। बूढ़ी दिवाली का आयोजन मुख्य तौर से सराज के आराध्य देव शैटीनाग की जगीश होती है।