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Mandi News: बैल बचे न घुंघरू, अब मशीनें सुनाती हैं जीवन का राग
Wed, 18 Sep 2024 04:51 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी
संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी
Updated Wed, 18 Sep 2024 04:51 AM IST
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बैलों की खरीद फरोख्त के लिए मशहूर ख्योड़ नलवाड़ मेले में इस बार नहीं पहुंची एक भी जोड़ी, शुभारंभ के लिए किराये पर लाए गए बैल
बैलों, घोड़ों, खच्चरों के एक करोड़ से अधिक के कारोबार वाले ख्योड़ नलवाड़ में अब शून्य होता है यह करोबार
किसानों का तर्क, यही हाल रहा तो अगली पीढ़ी भूल जाएगी हल लगाना
सतीश ठाकुर
गोहर (मंडी)। एक जमाना था जब खेतीबाड़ी के लिए बैलों का अहम स्थान था। प्रदेश ही नहीं पूरे देश में किसानी के लिए बैलों का इस्तेमाल होता था। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के 'जय जवान जय किसान' के नारे को ध्यान में रखकर 1967 में बनी फिल्म उपकार में मनोज कुमार ने ' बैलों के गले में जब घुंघरू जीवन का राग सुनाते हैं' गाना गया था। वहीं, हिमाचल में बैलों की खरीद फरोख्त के लिए नलवाड़ मेलों का आयोजन होता था। मेलों का आयोजन तो आज भी हो रहा है, लेकिन अब बैलों को सिर्फ औपचारिकता पूरी करने के लिए किराये पर लाया जाता है। हालत यह है कि अब न तो बैल बचे और न ही घुंघरू, अब मशीनें सुनाती हैं जीवन का राग। अब इनकी जगह ट्रैक्टरों और पावर टिलर ने ले ली है।
नाचन के ख्योड़ नलवाड़ मेले में भी अब बैलों का कारोबार शून्य हो गया है। वहीं, नलवाड़ मेलों से बैलों के साथ इनके शृंगार का कारोबार भी लुप्त हो गया है। बैलों के गले के घुंघरू, सींगों की सजावट की स्याही और मालाओं की दुकानें नलवाड़ मेलों से गायब हो गई हैं। 40 हजार रुपये तक की बिकने वाली बैलों की जोड़ी नलवाड़ मेले के कारोबार को चांदी लगाती थी। मगर अब यह कारोबार विरला ही रह गया है।
ख्योड़ नलवाड़ मेले में हर वर्ष करीब एक करोड़ से अधिक बैलों, घोड़े और खच्चरों का कारोबार होता था, लेकिन अब ख्योड़ नलवाड़ मेले में यह कारोबार शून्य तक पहुंच गया है। मेले के शुभारंभ अवसर पर खूंटा गाड़ने के लिए किराये पर गांव से बैलों की जोड़ी पंचायत को लानी पड़ी थी।एक समय था, जब गांव से किसान पैदल बैल की जोड़ी लेकर नलवाड़ मेलों में अच्छी नस्ल के बैल खेत जोतने के लिए खरीदते थे। मगर कुछ समय से नलवाड़ मेले बिना बैलों के आयोजित होने लगे हैं। यह सब आजकल नाचन क्षेत्र की बासा पंचायत में शुरू हुए ख्योड़ नलवाड़ मेले में देखने को मिल रहा है। खेत जोतने के लिए आधुनिक मशीनें बाजार में आने से लोग बैलों को भूल गए हैं और इन्हें जंगलों और सड़कों में आवारा छोड़ने लगे हैं। हल जोतकर खेतों में फसलों की बिजाई करना अब बिरले ही दिखती है। ख्योड़ नलवाड़ मेले की बात करें तो मशीनों के आधुनिकीकरण से यहां एक भी जोड़ी बैल दिखाई नहीं दे रही है। मेले के शुभारंभ की परंपरा निभाने के लिए बैल की जोड़ी नलवाड़ मेले में लाई गई। इसके बाद मेले में खरीद फरोख्त के लिए कोई बैल दिखाई नहीं दिए। आने वाले समय में ख्योड़ मेले में परंपरा निभाने के लिए बैलों का अकाल पड़ सकता है। अब यहां बैलों केे बजाय दूसरी चीजें ही मेले में बिकती है।
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बॉक्स
बैलों के खेत जोतने और मशीन से खेत बनाने में दिन रात का अंतर है। बैलों के खेत जोतने से खुदाई अच्छी होती है और उपजाऊ मिट्टी को समानांतर रखती है। मशीन से खेत जोतना भूमि के लिए इतना लाभदायक नहीं है। शहर के साथ गांवों में पावर टिलर मशीन से खेतों की जुताई शुरू हो गई है, लेकिन दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में लोग अभी भी बैल से जुताई करते हैं। जहां आधुनिकीकरण में यह परंपरा भी अब लुप्त होने के कगार पर है। आजकल गांव में भी किसानों ने हल चलाना छोड़ दिया है।
बॉक्स ख्योड़ मेले में पंजाब और हरियाणा सेे पहुंचते थे बैल
दशकों से मनाए जा रहे जिला स्तरीय ख्योड़ नलवाड़ मेला वास्तव में अच्छी नस्ल के बैलों की खरीद फरोख्त के लिए मनाया जाता रहा है। ख्योड़ नलवाड़ मेले में मंडी जिला के अलावा बिलासपुर, ऊना और पड़ोसी राज्य पंजाब, हरियाणा से व्यापारी यहां बैल, घोड़े और खच्चरों के व्यापार के लिए पहुंचते थे। अब आधुनिकता के इस युग में मशीनीकरण होने से नलवाड़ मेलों में बैलों की खरीद फरोख्त विरले ही देखने को मिलती है।
-डाॅ विजय विशाल, निवासी चैलचौक
अब यहां पर रोजमर्रा की वस्तुओं का होता है कारोबार
ख्योड़ नलवाड़ मेले में जरूरत की चीजें खरीदते हैं ग्रामीण ख्योड़ नलवाड़ मेले में ग्रामीण साल भर की जरूरत की वस्तुएं खरीदते हैं। यहां कपड़े, क्रोकरी, बर्तन, औजार और अन्य जरूरत की हर प्रकार की वस्तुओं के व्यापारी आते हैं। यहां बैलों की खरीद फरोख्त के बजाए अब यही व्यापार रह गया है।
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बैलों, घोड़ों, खच्चरों के एक करोड़ से अधिक के कारोबार वाले ख्योड़ नलवाड़ में अब शून्य होता है यह करोबार
किसानों का तर्क, यही हाल रहा तो अगली पीढ़ी भूल जाएगी हल लगाना
सतीश ठाकुर
गोहर (मंडी)। एक जमाना था जब खेतीबाड़ी के लिए बैलों का अहम स्थान था। प्रदेश ही नहीं पूरे देश में किसानी के लिए बैलों का इस्तेमाल होता था। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के 'जय जवान जय किसान' के नारे को ध्यान में रखकर 1967 में बनी फिल्म उपकार में मनोज कुमार ने ' बैलों के गले में जब घुंघरू जीवन का राग सुनाते हैं' गाना गया था। वहीं, हिमाचल में बैलों की खरीद फरोख्त के लिए नलवाड़ मेलों का आयोजन होता था। मेलों का आयोजन तो आज भी हो रहा है, लेकिन अब बैलों को सिर्फ औपचारिकता पूरी करने के लिए किराये पर लाया जाता है। हालत यह है कि अब न तो बैल बचे और न ही घुंघरू, अब मशीनें सुनाती हैं जीवन का राग। अब इनकी जगह ट्रैक्टरों और पावर टिलर ने ले ली है।
नाचन के ख्योड़ नलवाड़ मेले में भी अब बैलों का कारोबार शून्य हो गया है। वहीं, नलवाड़ मेलों से बैलों के साथ इनके शृंगार का कारोबार भी लुप्त हो गया है। बैलों के गले के घुंघरू, सींगों की सजावट की स्याही और मालाओं की दुकानें नलवाड़ मेलों से गायब हो गई हैं। 40 हजार रुपये तक की बिकने वाली बैलों की जोड़ी नलवाड़ मेले के कारोबार को चांदी लगाती थी। मगर अब यह कारोबार विरला ही रह गया है।
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ख्योड़ नलवाड़ मेले में हर वर्ष करीब एक करोड़ से अधिक बैलों, घोड़े और खच्चरों का कारोबार होता था, लेकिन अब ख्योड़ नलवाड़ मेले में यह कारोबार शून्य तक पहुंच गया है। मेले के शुभारंभ अवसर पर खूंटा गाड़ने के लिए किराये पर गांव से बैलों की जोड़ी पंचायत को लानी पड़ी थी।एक समय था, जब गांव से किसान पैदल बैल की जोड़ी लेकर नलवाड़ मेलों में अच्छी नस्ल के बैल खेत जोतने के लिए खरीदते थे। मगर कुछ समय से नलवाड़ मेले बिना बैलों के आयोजित होने लगे हैं। यह सब आजकल नाचन क्षेत्र की बासा पंचायत में शुरू हुए ख्योड़ नलवाड़ मेले में देखने को मिल रहा है। खेत जोतने के लिए आधुनिक मशीनें बाजार में आने से लोग बैलों को भूल गए हैं और इन्हें जंगलों और सड़कों में आवारा छोड़ने लगे हैं। हल जोतकर खेतों में फसलों की बिजाई करना अब बिरले ही दिखती है। ख्योड़ नलवाड़ मेले की बात करें तो मशीनों के आधुनिकीकरण से यहां एक भी जोड़ी बैल दिखाई नहीं दे रही है। मेले के शुभारंभ की परंपरा निभाने के लिए बैल की जोड़ी नलवाड़ मेले में लाई गई। इसके बाद मेले में खरीद फरोख्त के लिए कोई बैल दिखाई नहीं दिए। आने वाले समय में ख्योड़ मेले में परंपरा निभाने के लिए बैलों का अकाल पड़ सकता है। अब यहां बैलों केे बजाय दूसरी चीजें ही मेले में बिकती है।
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बैलों के खेत जोतने और मशीन से खेत बनाने में दिन रात का अंतर है। बैलों के खेत जोतने से खुदाई अच्छी होती है और उपजाऊ मिट्टी को समानांतर रखती है। मशीन से खेत जोतना भूमि के लिए इतना लाभदायक नहीं है। शहर के साथ गांवों में पावर टिलर मशीन से खेतों की जुताई शुरू हो गई है, लेकिन दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में लोग अभी भी बैल से जुताई करते हैं। जहां आधुनिकीकरण में यह परंपरा भी अब लुप्त होने के कगार पर है। आजकल गांव में भी किसानों ने हल चलाना छोड़ दिया है।
बॉक्स ख्योड़ मेले में पंजाब और हरियाणा सेे पहुंचते थे बैल
दशकों से मनाए जा रहे जिला स्तरीय ख्योड़ नलवाड़ मेला वास्तव में अच्छी नस्ल के बैलों की खरीद फरोख्त के लिए मनाया जाता रहा है। ख्योड़ नलवाड़ मेले में मंडी जिला के अलावा बिलासपुर, ऊना और पड़ोसी राज्य पंजाब, हरियाणा से व्यापारी यहां बैल, घोड़े और खच्चरों के व्यापार के लिए पहुंचते थे। अब आधुनिकता के इस युग में मशीनीकरण होने से नलवाड़ मेलों में बैलों की खरीद फरोख्त विरले ही देखने को मिलती है।
-डाॅ विजय विशाल, निवासी चैलचौक
अब यहां पर रोजमर्रा की वस्तुओं का होता है कारोबार
ख्योड़ नलवाड़ मेले में जरूरत की चीजें खरीदते हैं ग्रामीण ख्योड़ नलवाड़ मेले में ग्रामीण साल भर की जरूरत की वस्तुएं खरीदते हैं। यहां कपड़े, क्रोकरी, बर्तन, औजार और अन्य जरूरत की हर प्रकार की वस्तुओं के व्यापारी आते हैं। यहां बैलों की खरीद फरोख्त के बजाए अब यही व्यापार रह गया है।