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Mandi News: 18 पुत्रों के निधन के बाद राजा सूरज सेन ने देवता माधोराय को सौंपा था राजपाठ

Sun, 10 Mar 2024 05:29 AM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी
संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी Updated Sun, 10 Mar 2024 05:29 AM IST
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After the death of 18 sons, King Suraj Sen handed over the throne to Devta Madhorai
मंडी। मंडी शहर के राजमहल में स्थापित माधव राव का मंदिर रियासत काल से अपनी आस्था के लिए अलग पहचान रखता है। मंडी जनपद में महाशिवरात्रि, होली, दशहरा, दिवाली सहित अन्य त्योहार और मेलों का आयोजन राज देवता माधोराय की अगुवाई में ही होता आया है। महाशिवरात्रि के दौरान मंडी और आसपास के जिलों से आने वाले देवी देवता अपने आगमन और वापसी पर सबसे पहले माधोराय मंदिर पहुंचते हैं। यहां देव मिलन का दृश्य अपने आप में अलौकिक रहता है। रियासतकाल से ही मंडी शहर में यह परंपरा चली आ रही है।
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शैवमत से प्रभावित इस पहाड़ी रियासत में शिवरात्रि महापर्व की शुरूआत को लेकर विद्वान एकमत नहीं हैं। 1526 ई. में राजा अजबर सेन जब बटोहली से अपनी राजधानी ब्यास नदी के उस पार स्थापित की थी, संभवतः इसी दौरान महाशिवरात्रि पर्व का शुभारंभ हुआ। प्रारंभ में इसे दो दिन के लोकोत्सव के रूप में मनाया जाता रहा है। इसमें मंडी जनपद के लोक देवताओं की भागीदारी रहती थी।
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मंडी शिवरात्रि को शैव के साथ वैष्णव और लोकवादी स्वरूप प्रदान करने का श्रेय राजा सूरज सेन को जाता है। सूरज सेन का शासन सन् 1637-1664 ई. के दौरान रहा है। राजा सूरज सेन ने मंडी रियासत की सीमाओं के विस्तार में विशेष दिलचस्पी दिखाई। इसके लिए युद्ध और कुटनीति दोनों का सहारा लिया। सूरज सेन की 10 रानियां और 18 पुत्र एवं एक पुत्री थी। मगर एक के बाद एक सभी बेटे काल का ग्रास बन गए। इससे राजा भयभीत हो उठा और राज्य छिनने की चिंता सताने लगी।
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उन्होंने कूटनीति से काम लेते हुए अपना राज्य माधोराय को समर्पित कर दिया और स्वयं राज्य का संरक्षक बनकर राजकाज देखने लगा। मंडी शहर के नामी सुनार भीमा ने ही राज देवता माधोराय की चांदी की प्रतिमा तैयार की थी। जिसे अब हर वर्ष पालकी में रखकर सैकड़ों देवी-देवता और देवलुओं के साथ ढोल नगाड़ों की धुन पर नाचते गाते हुए पड्डल मेला मैदान तक ले जाया जाता है। राजा सूरज सेन ने मंडी जनपद के सभी देवी-देवताओं को मंडी नगर आमंत्रित करने और एक सप्ताह तक यहां देवी-देवताओं के मेहमाननबाजी की भी परंपरा शुरू की। रियासतकाल खत्म होने के बाद यह परंपरा स्थानीय प्रशासन द्वारा निभाई जाती है।

वर्तमान में राज देवता माधोराय मंदिर के पुजारी हर्ष कुमार ने बताया कि मंदिर में कृष्ण रूप माधोराय के साथ उनके बड़े भाई बलराम व उनकी पत्नी रेवती की भी मूर्तियां विराजमान है। राजा सूरज सेन द्वारा दमदमा महल की स्थापना के बाद राज देवता के मंदिर का भी निर्माण करवाया। पुजारी के अनुसार रियासत काल के अंतिम राजा जोगिंद्र सेन द्वारा शिवरात्रि कारज को जिला प्रशासन के हवाले कर दिया था।
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