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चाय के बाग में बना डाले आलीशान भवन
Mandi
Updated Tue, 19 Jun 2012 12:00 PM IST
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चौंतड़ा (मंडी)। तिब्बती कालोनी से आठ ताइवानियों की गिरफ्तारी के बाद तिब्बतियों के एक के बाद एक कारनामे सामने आ रहे हैं। जिस जमीन को तिब्बतियन खांपा इंडस्ट्रियल सोसायटी के नाम बताया जा रहा है वहां आज भी सरकारी रिकार्ड में चाय का बाग चल रहा है। इसका लाइसेंस टी बोर्ड ऑफ इंडिया की ओर से जारी किया गया है। लेकिन, हैरत की बात है कि जहां चाय का बाग होना चाहिए था वहां तिब्बतियों ने करोड़ों रुपये के आलीशान भवन बना रखे हैं।
टी बोर्ड ऑफ इंडिया के रिकार्ड पर गौर करें तो मंडी के राजा को 10-9-1935 को टी बोर्ड ऑफ इंडिया की ओर से यहां पर चाय का बाग लगाने का मंजूरी मिली थी। इसका पंजीकरण नंबर 1027 है और यह बाग करीब 100.39 हेक्टेयर भूमि पर था। इस बाग से साल भर में चाय की पैदावार करीब 180.39 क्विंटल के करीब थी। इस चाय के बाग के लिए टी बोर्ड अॅाफ इंडिया ने लाइसेंस भी जारी कर रखा है जिसका नंबर सी-55/एलसी है। यह चौंतड़ा एंड डैलू टी अस्टेट के नाम से था। अब सवाल यह उठता है कि तिब्बतियाें ने चाय के बाग को उजाड़ कर यहां किस की अनुमति से करोड़ों रुपये के आलीशान भवन बना डाले हैं। इधर, इस बारे में हलका पटवारी रवि थापा का कहना है कि इस जमीन में आज से करीब 30 साल पहले चाय के बाग थे, लेकिन अब रिकार्ड के अनुसार यहां पर बंजर और उपजाऊ जमीन होनी चाहिए। दूसरी ओर, टी बोर्ड ऑफ इंडिया की रिपोर्ट पर गौर करें तो 01-10-1900 से लेकर 30-06-2010 तक यहां पर चाय का बाग दिखाया गया है। इधर, दोनों विभागों के रिकार्ड भी अपने आप में कई संदेह पैदा कर रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि कहीं राजस्व विभाग अपनी गलती को तो नहीं छिपा रहा है?
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टी बोर्ड ऑफ इंडिया के रिकार्ड पर गौर करें तो मंडी के राजा को 10-9-1935 को टी बोर्ड ऑफ इंडिया की ओर से यहां पर चाय का बाग लगाने का मंजूरी मिली थी। इसका पंजीकरण नंबर 1027 है और यह बाग करीब 100.39 हेक्टेयर भूमि पर था। इस बाग से साल भर में चाय की पैदावार करीब 180.39 क्विंटल के करीब थी। इस चाय के बाग के लिए टी बोर्ड अॅाफ इंडिया ने लाइसेंस भी जारी कर रखा है जिसका नंबर सी-55/एलसी है। यह चौंतड़ा एंड डैलू टी अस्टेट के नाम से था। अब सवाल यह उठता है कि तिब्बतियाें ने चाय के बाग को उजाड़ कर यहां किस की अनुमति से करोड़ों रुपये के आलीशान भवन बना डाले हैं। इधर, इस बारे में हलका पटवारी रवि थापा का कहना है कि इस जमीन में आज से करीब 30 साल पहले चाय के बाग थे, लेकिन अब रिकार्ड के अनुसार यहां पर बंजर और उपजाऊ जमीन होनी चाहिए। दूसरी ओर, टी बोर्ड ऑफ इंडिया की रिपोर्ट पर गौर करें तो 01-10-1900 से लेकर 30-06-2010 तक यहां पर चाय का बाग दिखाया गया है। इधर, दोनों विभागों के रिकार्ड भी अपने आप में कई संदेह पैदा कर रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि कहीं राजस्व विभाग अपनी गलती को तो नहीं छिपा रहा है?
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