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रियासतकालीन शाही जलेब के 80 वर्ष बाद होंगे दर्शन
Updated Sat, 30 Dec 2017 10:50 PM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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मंडी। सूबे की सांस्कृतिक राजधानी छोटी काशी मंडी के अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव की शाही जलेब एक बार फिर रियासती दौर में दिखेगी। इस दफा शिवरात्रि की शाही जलेब कुछ बदली-बदली सी नजर आएगी। नजारा कुछ यूं होगा की देव चंडोही और देव वरनाग राजदेवता माधोराय के दाएं-बाएं चल कर जलेब की शोभा बढ़ाएंगे।
सर्वदेवता सेवा समिति मंडी और दोनों देवताओं के प्रयास यदि सार्थक हुए तो प्रदेशवासियों को इस बार राजाओं के राज के बाद पहली दफा अनूठा नजारा देखने को मिलेगा। दोनों देवता करीब 80 वर्ष से शिवरात्रि महोत्सव में शिरकत नहीं कर रहे हैं। यह धुरी विवाद कोई नया नहीं है। रियासतों के दौर में राजा ने फैसला कर इसे खत्म किया था। लेकिन, रियासतकाल खत्म होने के बाद जब यह विवाद छिड़ा तो इसे सुलझाने के आज तक प्रयास नहीं हुए। अब दशकों बाद यदि सेवा समिति और दोनों कमेटियों के प्रयास रंग लाते हैं तो यह शिवरात्रि महोत्सव अपने आप में अनूठा होगा।
क्या है धुरी विवाद
देव चंडोही के कारदार गोविंद राम कहते हैं कि धुरी विवाद का अर्थ शाही जलेब में राजदेवता माधोराय के दाएं और बाएं चलने का है। दाईं ओर का स्थान श्रेष्ठ माना जाता है। इसी के चलते दोनों देवताओं में विवाद चल रहा है। इस विवाद को सुलझाने का प्रयास किया जा रहा है। प्रयास रंग लाया तो इस बार देवता दशकों बाद शिवरात्रि में शिरकत करेंगे।
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यह है देवता का इतिहास
देव चंडोही को भगवान गणेश का स्वरूप माना जाता है। देवता का मूल स्थान ज्वालापुर क्षेत्र के ओढ़ीधार में है। देवता के उद्गम के बारे में कहा जाता है कि सदियों पहले मदी नामक ब्राह्मण के खेत में देव प्रकट हुए। देव का प्रचंड रूप देख कर ब्राह्मण चकित हो गए। इसके बाद देव ने व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर अपने उद्गम की अनुभूति करवाई और 14 शताब्दी में पैगोड़ा शैली में भटवाड़ी में देव के भव्य मंदिर का निर्माण किया गया। इसी शैली में देव पराशर ऋषि के मंदिर का निर्माण भी किया गया है। दोनों मंदिरों के निर्माण के बारे में कहा जाता है कि इन मंदिरों को एक ही पेड़ से बनाया गया और एक कील का भी इसमें इस्तेमाल नहीं हुआ है। देवता के बारे में एक और कथा यह भी प्रचलित है कि मंडी के राजा श्यामसेन के दौर में जब सुकेत के राजा ने अचानक आक्रमण किया तो श्यामसेन ने देव के प्रचंड रूप को डोरी में धारण कर सुकेत रियायत के राजाओं को खदेड़ कर भंगरोटू तक पहुंचा दिया था। इसके बाद से देव का नाम देव प्रचंड से देव चडोही हो गया। देव वरनाग और देव चंडोही का मंदिर तीन किमी से भी कम फासले पर स्थित है।
प्रयास जारी : शिवपाल
सर्वदेवता समिति के अध्यक्ष पंडित शिवपाल ने कहा कि दोनों देवताओं को इस दफा शिवरात्रि में लाने के प्रयास किए जा रहे है। पंजीकृत देवताओं में देव चंडोही, देव वरनाग, देव वैणी का गैहरी, देव खांदली नारायण, देव काशला मांहूनाग द्रंग, देव किगस नारायण रियासतों के दौर के बाद शिवरात्रि महोत्सव में शिरकत नहीं कर रहे हैं।
स्टोरी टू
मेले के पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखने पर चर्चा
मंडी। सर्वदेवता सेवा समिति मंडी की बैठक शनिवार को सनातन धर्म सेवा भवन में आयोजित हुई। बैठक में मेले के संचालन को लेकर चर्चा की गई। बैठक की अध्यक्षता अध्यक्ष पंडित शिवपाल ने की। उन्होंने कहा कि मंडी मेले के रियासती और पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखने के लिए आगामी शिवरात्रि महोत्सव में प्रयास किए जाएंगे। इसे लेकर प्रशासन के साथ मिलकर कार्य किया जाएगा। उन्होंने देव मेला, चौहाटा की जातर के स्वरूप को यथावत बनाए रखना जरूरी है। इस अवसर पर बैठक में वेद राम ठाकुर, भीम चंद सरोच, युद्ध कुमार, गिरीश ठाकुर, रेवती शर्मा, धमेंद्र वर्मा, मनोज कुमार, लेखराज, बलवीर ठाकुर सहित कार्यकारिणी के पदाधिकारी एवं सदस्य उपस्थित रहे।
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सर्वदेवता सेवा समिति मंडी और दोनों देवताओं के प्रयास यदि सार्थक हुए तो प्रदेशवासियों को इस बार राजाओं के राज के बाद पहली दफा अनूठा नजारा देखने को मिलेगा। दोनों देवता करीब 80 वर्ष से शिवरात्रि महोत्सव में शिरकत नहीं कर रहे हैं। यह धुरी विवाद कोई नया नहीं है। रियासतों के दौर में राजा ने फैसला कर इसे खत्म किया था। लेकिन, रियासतकाल खत्म होने के बाद जब यह विवाद छिड़ा तो इसे सुलझाने के आज तक प्रयास नहीं हुए। अब दशकों बाद यदि सेवा समिति और दोनों कमेटियों के प्रयास रंग लाते हैं तो यह शिवरात्रि महोत्सव अपने आप में अनूठा होगा।
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क्या है धुरी विवाद
देव चंडोही के कारदार गोविंद राम कहते हैं कि धुरी विवाद का अर्थ शाही जलेब में राजदेवता माधोराय के दाएं और बाएं चलने का है। दाईं ओर का स्थान श्रेष्ठ माना जाता है। इसी के चलते दोनों देवताओं में विवाद चल रहा है। इस विवाद को सुलझाने का प्रयास किया जा रहा है। प्रयास रंग लाया तो इस बार देवता दशकों बाद शिवरात्रि में शिरकत करेंगे।
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यह है देवता का इतिहास
देव चंडोही को भगवान गणेश का स्वरूप माना जाता है। देवता का मूल स्थान ज्वालापुर क्षेत्र के ओढ़ीधार में है। देवता के उद्गम के बारे में कहा जाता है कि सदियों पहले मदी नामक ब्राह्मण के खेत में देव प्रकट हुए। देव का प्रचंड रूप देख कर ब्राह्मण चकित हो गए। इसके बाद देव ने व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर अपने उद्गम की अनुभूति करवाई और 14 शताब्दी में पैगोड़ा शैली में भटवाड़ी में देव के भव्य मंदिर का निर्माण किया गया। इसी शैली में देव पराशर ऋषि के मंदिर का निर्माण भी किया गया है। दोनों मंदिरों के निर्माण के बारे में कहा जाता है कि इन मंदिरों को एक ही पेड़ से बनाया गया और एक कील का भी इसमें इस्तेमाल नहीं हुआ है। देवता के बारे में एक और कथा यह भी प्रचलित है कि मंडी के राजा श्यामसेन के दौर में जब सुकेत के राजा ने अचानक आक्रमण किया तो श्यामसेन ने देव के प्रचंड रूप को डोरी में धारण कर सुकेत रियायत के राजाओं को खदेड़ कर भंगरोटू तक पहुंचा दिया था। इसके बाद से देव का नाम देव प्रचंड से देव चडोही हो गया। देव वरनाग और देव चंडोही का मंदिर तीन किमी से भी कम फासले पर स्थित है।
प्रयास जारी : शिवपाल
सर्वदेवता समिति के अध्यक्ष पंडित शिवपाल ने कहा कि दोनों देवताओं को इस दफा शिवरात्रि में लाने के प्रयास किए जा रहे है। पंजीकृत देवताओं में देव चंडोही, देव वरनाग, देव वैणी का गैहरी, देव खांदली नारायण, देव काशला मांहूनाग द्रंग, देव किगस नारायण रियासतों के दौर के बाद शिवरात्रि महोत्सव में शिरकत नहीं कर रहे हैं।
स्टोरी टू
मेले के पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखने पर चर्चा
मंडी। सर्वदेवता सेवा समिति मंडी की बैठक शनिवार को सनातन धर्म सेवा भवन में आयोजित हुई। बैठक में मेले के संचालन को लेकर चर्चा की गई। बैठक की अध्यक्षता अध्यक्ष पंडित शिवपाल ने की। उन्होंने कहा कि मंडी मेले के रियासती और पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखने के लिए आगामी शिवरात्रि महोत्सव में प्रयास किए जाएंगे। इसे लेकर प्रशासन के साथ मिलकर कार्य किया जाएगा। उन्होंने देव मेला, चौहाटा की जातर के स्वरूप को यथावत बनाए रखना जरूरी है। इस अवसर पर बैठक में वेद राम ठाकुर, भीम चंद सरोच, युद्ध कुमार, गिरीश ठाकुर, रेवती शर्मा, धमेंद्र वर्मा, मनोज कुमार, लेखराज, बलवीर ठाकुर सहित कार्यकारिणी के पदाधिकारी एवं सदस्य उपस्थित रहे।