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Kullu News: लाहौल में सेब के बगीचों में वूली एफिड का हमला
Thu, 22 Aug 2024 06:41 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू
संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू
Updated Thu, 22 Aug 2024 06:41 AM IST
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केलांग (लाहौल-स्पीति। जनजातीय क्षेत्र लाहौल घाटी के केलांग, जुंडा और त्रिलोकनाथ सहित कुछ इलाकों के सेब बागानों में वूली एफिड बीमारी का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। इस कीट के प्रकोप से सेब के पौधों की शाखाओं और जड़ों को गंभीर नुकसान हो रहा है, जिससे बागवानों की चिंता बढ़ गई है।
बागवानों के अनुसार इस वर्ष भी वूली एफिड का हमला समय से पहले शुरू हो गया है। सेब की शाखाओं पर सफेद रुई जैसा पदार्थ जमने लगा है, जिसमें गहरे लाल और भूरे रंग के छोटे-छोटे कीड़े पाए जा रहे हैं। यह कीट पौधों की शाखाओं और तनों का रस चूसकर पौधों को कमजोर कर देता है। सर्दियों में यह कीट जड़ों में पहुंचकर और भी अधिक नुकसान पहुंचाता है, जिससे पेड़ सूखने की स्थिति में आ जाते हैं।
बागवान सुरेंद्र कुमार, रमेश लाल और महेश ने बताया कि इस बीमारी के कारण घाटी के सेब उत्पादन पर गंभीर असर पड़ सकता है। उन्होंने संबंधित विभाग से इस समस्या के समाधान के लिए तुरंत कदम उठाने की मांग की है।
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बजौरा में तैनात बागवानी विशेषज्ञ डॉ. रमेश राणा ने बताया कि वूली एफिड की रोकथाम के लिए सेब तुड़ान के बाद अक्टूबर में क्लोरपायरिफास 0.08 प्रतिशत 20 ईसी का छिड़काव पौधों पर करना आवश्यक है। उन्होंने बागवानों को पौधों की जड़ों से निकलने वाली टहनियों को भी हटाने की सलाह दी है।
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बागवानों के अनुसार इस वर्ष भी वूली एफिड का हमला समय से पहले शुरू हो गया है। सेब की शाखाओं पर सफेद रुई जैसा पदार्थ जमने लगा है, जिसमें गहरे लाल और भूरे रंग के छोटे-छोटे कीड़े पाए जा रहे हैं। यह कीट पौधों की शाखाओं और तनों का रस चूसकर पौधों को कमजोर कर देता है। सर्दियों में यह कीट जड़ों में पहुंचकर और भी अधिक नुकसान पहुंचाता है, जिससे पेड़ सूखने की स्थिति में आ जाते हैं।
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बागवान सुरेंद्र कुमार, रमेश लाल और महेश ने बताया कि इस बीमारी के कारण घाटी के सेब उत्पादन पर गंभीर असर पड़ सकता है। उन्होंने संबंधित विभाग से इस समस्या के समाधान के लिए तुरंत कदम उठाने की मांग की है।
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बजौरा में तैनात बागवानी विशेषज्ञ डॉ. रमेश राणा ने बताया कि वूली एफिड की रोकथाम के लिए सेब तुड़ान के बाद अक्टूबर में क्लोरपायरिफास 0.08 प्रतिशत 20 ईसी का छिड़काव पौधों पर करना आवश्यक है। उन्होंने बागवानों को पौधों की जड़ों से निकलने वाली टहनियों को भी हटाने की सलाह दी है।