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‘बेटी की पढ़ाई के लिए मां ने गवां दी जान’
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संवाद न्यूज एजेंसी
कुल्लू। बेटी को पढ़ाने और उसे परीक्षा में टॉप करवाने के लिए मां को विकट परिस्थितियों के बीच अपनी जान गवानी पड़ी। कुल्लू कार्निवाल की नाट्य प्रस्तुतियों में बियोंड थियेटर संस्था सोलन की ओर से प्रस्तुत नाटक मैट्रिक ने सैकड़ों दर्शकों को भावुक कर दिया। यह नाट्य प्रस्तुतियों की तीसरी प्रस्तुति थी।
प्रवीण पाटकर की ओर से लिखित एवं संजीव आरोड़ा द्वारा निर्देशित नाटक मैट्रिक ने दर्शकों का खूब मनोरंजन करने के साथ उन्हें भावुक भी किया। नाटक मैट्रिक दुर्गम पहाड़ियों में बसे एक छोटे से गांव की कहानी है, जिसमें मानवीय संवेदनाओं का सजीव चित्रण है। घटनाओं का कुछ ऐसा ताना बाना बुना गया है, जो ग्रामीण परिवेश की कहानी कहता ही है। इसके अलावा वहां रहने वालों की दिनचर्या और चुनौतियों को भी खूब दर्शाता है। कहानी एक ऐसे दंपति की है, जो अपनी बेटी को पढ़ाना चाहते हैं। उन्हें स्कूल से ही यह पता चलता है कि अगर उनकी बच्ची जिले में टॉप करती है तो उसकी आगे की पढ़ाई सरकार की ओर से मुफ्त करवाई जाएगी। उनके घर में बिजली नहीं है, वे बिजली चोरी कर उसके लिए बल्ब लगा लेते हैं। बेटी का अंतिम पेपर होता है, तो पहली रात उसकी मां बिजली का कनेक्शन जोड़ने जाती है। उसे करंट लगता है और मर जाती है, लेकिन उसका बाप उसे नहीं बताता, जिससे उसका पेपर खराब न हो। जब वह पेपर देकर आती है तो उसे पता चलता है कि उसकी मां अब इस दुनिया में नहीं है। नाटक में गरिमा सिंह, अंजलि दत्ता, नावेद, हेमंत अत्री, गौरव मेहता, हितेश, अर्पित, कनिष्क और अजय शर्मा ने अपनी-अपनी भूमिकाओं को बखूबी अंजाम दिया।
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कुल्लू। बेटी को पढ़ाने और उसे परीक्षा में टॉप करवाने के लिए मां को विकट परिस्थितियों के बीच अपनी जान गवानी पड़ी। कुल्लू कार्निवाल की नाट्य प्रस्तुतियों में बियोंड थियेटर संस्था सोलन की ओर से प्रस्तुत नाटक मैट्रिक ने सैकड़ों दर्शकों को भावुक कर दिया। यह नाट्य प्रस्तुतियों की तीसरी प्रस्तुति थी।
प्रवीण पाटकर की ओर से लिखित एवं संजीव आरोड़ा द्वारा निर्देशित नाटक मैट्रिक ने दर्शकों का खूब मनोरंजन करने के साथ उन्हें भावुक भी किया। नाटक मैट्रिक दुर्गम पहाड़ियों में बसे एक छोटे से गांव की कहानी है, जिसमें मानवीय संवेदनाओं का सजीव चित्रण है। घटनाओं का कुछ ऐसा ताना बाना बुना गया है, जो ग्रामीण परिवेश की कहानी कहता ही है। इसके अलावा वहां रहने वालों की दिनचर्या और चुनौतियों को भी खूब दर्शाता है। कहानी एक ऐसे दंपति की है, जो अपनी बेटी को पढ़ाना चाहते हैं। उन्हें स्कूल से ही यह पता चलता है कि अगर उनकी बच्ची जिले में टॉप करती है तो उसकी आगे की पढ़ाई सरकार की ओर से मुफ्त करवाई जाएगी। उनके घर में बिजली नहीं है, वे बिजली चोरी कर उसके लिए बल्ब लगा लेते हैं। बेटी का अंतिम पेपर होता है, तो पहली रात उसकी मां बिजली का कनेक्शन जोड़ने जाती है। उसे करंट लगता है और मर जाती है, लेकिन उसका बाप उसे नहीं बताता, जिससे उसका पेपर खराब न हो। जब वह पेपर देकर आती है तो उसे पता चलता है कि उसकी मां अब इस दुनिया में नहीं है। नाटक में गरिमा सिंह, अंजलि दत्ता, नावेद, हेमंत अत्री, गौरव मेहता, हितेश, अर्पित, कनिष्क और अजय शर्मा ने अपनी-अपनी भूमिकाओं को बखूबी अंजाम दिया।
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