कुल्लू। अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव के लिए बंजार, आनी, निरमंड, कुल्लू और मनाली से देवी-देवता लाव-लश्कर के साथ पहुंचे हैं। देवता 30 अक्तूबर तक अपने अस्थायी शिविरों में रहेंगे। ऐसे में देवालय देवी-देवताओं के बगैर सूने पड़ गए हैं। देवालयों में देवताओं की होने वाली पूजा-अर्चना भी देवताओं के वापस लौटने पर ही शुरू होगी। हारियानों की ओर से देवताओं का स्वागत फूलमालाओं से किया जाएगा। कुछ देवता दशहरा उत्सव से चार से पांच दिन पहले ही निकल गए थे जबकि देवता बिजली महादेव, माता हिडिंबा एक दिन पहले कुल्लू दशहरा के निकले थे।
देवता के साथ देवलू और कारकून भी अस्थायी शिविरों में ही डेरा लगाए हुए हैं जबकि खराहल, पार्वती और मनाली क्षेत्र के देवी-देवताओं को वापस ले जाने के लिए मौहल्ला के दिन हारियान कुल्लू आएंगे। ऐसेे में देवताओं के दशहरा से वापस लौटने के बाद ही देवालयों में रौनक आएगी। दशहरा कुल्लू घाटी में अंतिम मेला होता है। इसके बाद मेले त्योहारों पर ब्रेक लग जाती है। पौष महीने में घाटी के सभी देवी-देवता स्वर्ग प्रवास पर जाएंगे। मकर संक्रांति को देवी-देवताओं के स्वर्ग प्रवास से लौटते ही फागली से एक बार घाटी में उत्सव आयोजित किए जाएंगे। जिला देवी-देवता कारदार संघ के महासचिव टीसी महंत ने कहा कि दशहरा में परंपरा का निर्वहन करने के बाद सभी देवता अपने देवालयों की ओर रवाना हो जाएंगे। देवालय पहुंचने पर देवताओं का फूलमालाओं से स्वागत होगा। वहीं, देवालयों में भी रौनक लौटेगी।