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नववर्ष पर होगा राक्षस नाटक का मंचन
Updated Sun, 17 Dec 2017 09:06 PM IST
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कुल्लू में राक्षस नाटक मंचन के लिए तैयारी करते बाल कलाकार।
- फोटो : अमर उजाला
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अमर उजाला ब्यूरो
कुल्लू। लालचंद प्रार्थी कलाकेंद्र में मोनाल एक्टिव कल्चरल एसोसिएशन की ओर से नववर्ष के मौके पर नए नाटक राक्षस का मंचन किया जाएगा। एक से तीन जनवरी तक होने वाले इस नाटक को संस्था के बाल कलाकारों की ओर से प्रस्तुत किया जाएगा। 1 घंटा 20 मिनट की अवधि के इस नाटक का लेखन प्रख्यात लेखक डॉ. शंकर तथा निर्देशन प्रसिद्ध रंगकर्मी के केहर सिंह ठाकुर द्वारा किया जा रहा है। बाल कलाकारों की ओर से नाटक की रिहर्सल कलाकेंद्र में इन दिनों की जा रही है। संस्था के अध्यक्ष केहर सिंह ठाकुर ने कहा कि इन बच्चों का साथ वरिष्ठ रंगकर्मी आरती ठाकुर, निखिल ठाकुर तथा अनुराग ठाकुर की ओर से दिया जा रहा है। मंच पार्श्व में सेट, कॉस्ट्यूम, लाइटिंग तथा प्रोपर्टीज आदि का कार्य वरिष्ठ रंगकर्मी मीनाक्षी, जीवानंद, दीनदयाल, आशा तथा कविता द्वारा संपन्न किया जाएगा। उन्होंने कहा कि नाटक राक्षस इंसान के भीतर अच्छी और बुरी प्रवृत्तियों की बात करता है। नाटक में कहा गया है कि राक्षस बाहर कहीं नहीं है, वह हमारे भीतर ही है। राक्षस हमारी भावनाओं के और मन की चंचलताओं के साथ आकार पाने लगता है। जैसे ही हमारी बुरी भावनाएं बढ़ने लगती हैं तो इस राक्षस का आकार बढ़ने लगता है।
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कुल्लू। लालचंद प्रार्थी कलाकेंद्र में मोनाल एक्टिव कल्चरल एसोसिएशन की ओर से नववर्ष के मौके पर नए नाटक राक्षस का मंचन किया जाएगा। एक से तीन जनवरी तक होने वाले इस नाटक को संस्था के बाल कलाकारों की ओर से प्रस्तुत किया जाएगा। 1 घंटा 20 मिनट की अवधि के इस नाटक का लेखन प्रख्यात लेखक डॉ. शंकर तथा निर्देशन प्रसिद्ध रंगकर्मी के केहर सिंह ठाकुर द्वारा किया जा रहा है। बाल कलाकारों की ओर से नाटक की रिहर्सल कलाकेंद्र में इन दिनों की जा रही है। संस्था के अध्यक्ष केहर सिंह ठाकुर ने कहा कि इन बच्चों का साथ वरिष्ठ रंगकर्मी आरती ठाकुर, निखिल ठाकुर तथा अनुराग ठाकुर की ओर से दिया जा रहा है। मंच पार्श्व में सेट, कॉस्ट्यूम, लाइटिंग तथा प्रोपर्टीज आदि का कार्य वरिष्ठ रंगकर्मी मीनाक्षी, जीवानंद, दीनदयाल, आशा तथा कविता द्वारा संपन्न किया जाएगा। उन्होंने कहा कि नाटक राक्षस इंसान के भीतर अच्छी और बुरी प्रवृत्तियों की बात करता है। नाटक में कहा गया है कि राक्षस बाहर कहीं नहीं है, वह हमारे भीतर ही है। राक्षस हमारी भावनाओं के और मन की चंचलताओं के साथ आकार पाने लगता है। जैसे ही हमारी बुरी भावनाएं बढ़ने लगती हैं तो इस राक्षस का आकार बढ़ने लगता है।