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देवी-देवताओं में अटूट आस्था का प्रतीक है कुल्लू का दशहरा
Updated Thu, 18 Oct 2018 09:49 PM IST
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देवी-देवताओं में अटूट आस्था का प्रतीक है कुल्लू का दशहरा
चार सौ साल पहले की परंपराओं का अब भी बखूबी हो रहा निर्वहन
देवलु भी सात दिन तक नियमों में रह कर करते हैं चाकरी
अमर उजाला ब्यूरो
कुल्लू/खराहल। भले ही आधुनिकता के दौर में हर क्षेत्र में परिवर्तन आ गया है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव में चार सौ साल पुरानी देव परंपराओं का अटूट आस्था और निष्ठा के साथ निर्वहन हो रहा है। ढालपुर में होने वाला देवी देवताओं का महाकुंभ लोगों की अटूट आस्था का प्रतीक है।
ढालपुर में कुल्लू जिला के सैकड़ों देवी-देवता अपनी हाजिरी देवलुओं के साथ भगवान रघुनाथ के दरबार में भरते हैं। कई किलोमीटर सफर के बाद देवी-देवता आराध्य रघुनाथ के समक्ष देवविधि के अनुसार मिलन करते हैं। सन-1650 ई. में तत्कालीन राजा जगत सिंह ने कुल्लू दशहरे का आगाज किया था। उन्होंने अपना राजपाठ रघुनाथ के चरणों में समर्पित कर दिया था और रघुनाथ के छड़ीबरदार के रूप में सेवा करने का संकल्प लिया। आज भी जगत सिंह के वंशज बखूबी इस रस्म को निभा रहे हैं। दशहरे में आने वाले देेवी-देवता के आदेश को लोग बड़ी सादरता से स्वीकारते हैं। देवलु भी सात दिन नियमों में रहकर चाकरी करते हैं। भगवान रघुनाथ की पहले दिन होने वाली शोभायात्रा में कुल्लू राजघराने का पूरा परिवार पारंपरिक वेशभूषा में सजधज कर शामिल होगा। इसके बाद भगवान रघुनाथ ढालपुर में रथ में देवविधि के साथ विराजमान होंगे। रघुनाथ के छड़ीबरदार एवं पूर्व विधायक महेश्वर सिंह ने कहा कि आधुनिकता के रंग में सबकुछ बदल गया है। मगर देवी-देवता की मिलन अनूठी देव परंपरा दशहरा में आज भी बखूबी से निभाई जा रही है। सात दिन तक भगवान रघुनाथ अस्थायी शिविर में विराजमान होंगे। इस दौरान भगवान रघुनाथ की विशेष पूजा अर्चना की जाएगी। लंका दहन की परंपरा का निर्वहन करने के बाद भगवान रघुनाथ अपने देवालय सुल्तानपुर के लिए रवाना होंगे।
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चार सौ साल पहले की परंपराओं का अब भी बखूबी हो रहा निर्वहन
देवलु भी सात दिन तक नियमों में रह कर करते हैं चाकरी
अमर उजाला ब्यूरो
कुल्लू/खराहल। भले ही आधुनिकता के दौर में हर क्षेत्र में परिवर्तन आ गया है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव में चार सौ साल पुरानी देव परंपराओं का अटूट आस्था और निष्ठा के साथ निर्वहन हो रहा है। ढालपुर में होने वाला देवी देवताओं का महाकुंभ लोगों की अटूट आस्था का प्रतीक है।
ढालपुर में कुल्लू जिला के सैकड़ों देवी-देवता अपनी हाजिरी देवलुओं के साथ भगवान रघुनाथ के दरबार में भरते हैं। कई किलोमीटर सफर के बाद देवी-देवता आराध्य रघुनाथ के समक्ष देवविधि के अनुसार मिलन करते हैं। सन-1650 ई. में तत्कालीन राजा जगत सिंह ने कुल्लू दशहरे का आगाज किया था। उन्होंने अपना राजपाठ रघुनाथ के चरणों में समर्पित कर दिया था और रघुनाथ के छड़ीबरदार के रूप में सेवा करने का संकल्प लिया। आज भी जगत सिंह के वंशज बखूबी इस रस्म को निभा रहे हैं। दशहरे में आने वाले देेवी-देवता के आदेश को लोग बड़ी सादरता से स्वीकारते हैं। देवलु भी सात दिन नियमों में रहकर चाकरी करते हैं। भगवान रघुनाथ की पहले दिन होने वाली शोभायात्रा में कुल्लू राजघराने का पूरा परिवार पारंपरिक वेशभूषा में सजधज कर शामिल होगा। इसके बाद भगवान रघुनाथ ढालपुर में रथ में देवविधि के साथ विराजमान होंगे। रघुनाथ के छड़ीबरदार एवं पूर्व विधायक महेश्वर सिंह ने कहा कि आधुनिकता के रंग में सबकुछ बदल गया है। मगर देवी-देवता की मिलन अनूठी देव परंपरा दशहरा में आज भी बखूबी से निभाई जा रही है। सात दिन तक भगवान रघुनाथ अस्थायी शिविर में विराजमान होंगे। इस दौरान भगवान रघुनाथ की विशेष पूजा अर्चना की जाएगी। लंका दहन की परंपरा का निर्वहन करने के बाद भगवान रघुनाथ अपने देवालय सुल्तानपुर के लिए रवाना होंगे।
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